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भारत ने ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ दर्जे पर कहा- फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट ‘भ्रामक, गलत, अनुचित’

लोकतंत्र निगरानी संस्था ‘फ्रीडम हाउस’ की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता में गिरावट 2019 में नरेंद्र मोदी के दोबारा चुने जाने के बाद ही तेज़ हो गई थी और न्यायिक स्वतंत्रता भी दबाव में आ गई थी. इस पर विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत को ‘उपदेशों’ की जरूरत नहीं है.

पंजाब के तरन तारन में किसान आंदोलन में शामिल महिलाएं. (फोटो: पीटीआई)

पंजाब के तरन तारन में किसान आंदोलन में शामिल महिलाएं. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सरकार ने शुक्रवार को लोकतंत्र निगरानी संस्था ‘फ्रीडम हाउस’ की उस रिपोर्ट को ‘भ्रामक, गलत और अनुचित’ करार दिया, जिसमें भारत के दर्जे को घटाकर ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ कर दिया गया है. सरकार की ओर से कहा गया है कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं अच्छी तरह से स्थापित हैं.

साथ ही भारत सरकार ने कहा कि उसे ‘उपदेशों’ की जरूरत नहीं है.

सूचना प्रसारण मंत्रालय ने कहा कि देश में सभी नागरिकों के साथ बिना भेदभाव समान व्यवहार होता है तथा जोर दिया कि चर्चा, बहस और असहमति भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा हैं, वहीं विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत में संस्थान मजबूत हैं.

विदेश मंत्रालय ने लोकतंत्र निगरानीकर्ता पर निशाना साधते हुए कहा कि भारत को ‘उपदेशों’ की जरूरत नहीं है, खासतौर पर उनसे जो अपनी मूलभूत चीजों को भी सही नहीं कर सकते.

अमेरिकी सरकार द्वारा वित्तपोषित गैर सरकारी संगठन फ्रीडम हाउस की बुधवार को जारी रिपोर्ट में यह दावा भी किया गया कि भारत में नागरिक स्वतंत्रताओं का लगातार क्षरण हुआ है.

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक बयान में कहा, ‘फ्रीडम हाउस की ‘डेमोक्रेसी अंडर सीज’ शीर्षक वाली रिपोर्ट, जिसमें दावा किया गया है कि एक स्वतंत्र देश के रूप में भारत का दर्जा घटकर ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ रह गया है, पूरी तरह भ्रामक, गलत और अनुचित है.’

एक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान रिपोर्ट के बारे में पूछे जाने पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा, ‘फ्रीडम हाउस के राजनीतिक फैसले उतने ही गलत व विकृत हैं, जितने उनके नक्शे.’

रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी नक्शे का मुद्दा उठाया और एक बातचीत के दौरान कहा, ‘मुझे इस समूह की चिंता है जो भारतीय मानचित्र को सही नहीं दिखाते हैं. उनकी वेबसाइट पर भारतीय नक्शा गलत है. उन्हें पहले हमारा नक्शा सही दिखाना चाहिए.’

श्रीवास्तव और सीतारमन ने फ्रीडम हाउस द्वारा भारत का गलत नक्शा दिखाए जाने के संदर्भ में यह बात कही, जिसमें केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू कश्मीर और लद्दाख को शामिल नहीं किया गया था.

उन्होंने कहा, ‘उदाहरण के लिए कोविड-19 की स्थिति पर, दुनिया भर में हमारी प्रतिक्रिया, हमारी उच्च स्वास्थ्य दर और निम्न मृत्यु दर को व्यापक सराहना मिली.’

उन्होंने कहा, ‘भारत में संस्थान मजबूत हैं और यहां लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं अच्छे से स्थापित हैं. हमें उनसे उपदेश की आवश्यकता नहीं हैं जो मूलभूत चीजें भी सहीं नहीं कर सकते.’

रिपोर्ट के नतीजों का विस्तार से खंडन करते हुए मंत्रालय ने कहा, ‘भारत सरकार अपने सभी नागरिकों के साथ समानता का व्यवहार करती है, जैसा देश के संविधान में निहित है और बिना किसी भेदभाव के सभी कानून लागू हैं. भड़काने वाले व्यक्ति की पहचान को ध्यान में रखे बिना, कानून व्यवस्था के मामलों में कानून की प्रक्रिया का पालन किया जाता है.’

मंत्रालय ने कहा, ‘जनवरी, 2019 में उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के खास तौर पर उल्लेख के मद्देनजर, कानून प्रवर्तन तंत्र ने निष्पक्ष और उचित तरीके से तत्परता के साथ काम किया. हालात को नियंत्रित करने के लिए उचित कदम उठाए गए थे. प्राप्त हुईं सभी शिकायतों/कॉल्स पर कानून प्रवर्तन मशीनरी ने कानून और प्रक्रियाओं के तहत आवश्यक विधिक और निरोधात्मक कार्रवाई की थी.’

सरकार ने रिपोर्ट में लगाए गए उस आरोप को भी खारिज किया कि कोविड-19 की वजह से लागू लॉकडाउन में ‘शहरों में लाखों प्रवासी मजदूरों को बिना काम व मूलभूत संसाधनों के छोड़ दिया गया’ और ‘इसकी वजह से लाखों घरेलू कामगारों का खतरनाक व अनियोजित विस्थापन हुआ.’

सरकार ने कहा कि कोरोना वायरस संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए लॉकडाउन की घोषणा की गई थी और इस अवधि ने ‘सरकार को मास्क, वेंटिलेटर, पीपीई किट आदि की उत्पादन क्षमता बढ़ाने का मौका दिया तथा इस तरह महामारी के प्रसार को प्रभावी तरीके से रोका गया. प्रति व्यक्ति आधार पर भारत में कोविड-19 के सक्रिय मामलों की संख्या और कोविड-19 से जुड़ी मौतों की दर वैश्विक स्तर पर सबसे कम दर में से एक रही.’

रिपोर्ट में किए गए शिक्षाविदों और पत्रकारों को धमकाने के दावों पर सरकार ने कहा, ‘चर्चा, बहस और असंतोष भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा है. भारत सरकार पत्रकारों सहित देश के सभी नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च अहमियत देती है.’

सरकार ने पत्रकारों की सुरक्षा पर राज्यों और संघ शासित क्षेत्रों को विशेष परामर्श जारी करके उनसे मीडियाकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त कानून लागू करने का अनुरोध किया है.

रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया था कि बड़ी संख्या में एनजीओ संचालित हो रहे हैं लेकिन खासकर मानवाधिकार दुरुपयोगों की जांच में शामिल एनजीओ को लगातार धमकियों, कानूनी प्रताड़ना, अत्यधिक पुलिस बल और कभी-कभी घातक हिंसा का सामना करना पड़ता है.

इसको खारिज करते हुए सरकार ने कहा कि भारतीय संविधान में विभिन्न कानूनों के तहत पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की गई है, जिसमें मानव अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 शामिल है.

रिपोर्ट के इस दावे पर कि अधिकारियों ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए दिसंबर 2019 और मार्च 2020 के बीच सभाओं पर प्रतिबंध लगाने, इंटरनेट बंद करने और जिंदा गोला बारूद का इस्तेमाल किया और देश भर में नागरिकों के पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव किया, इस पर सरकार ने कहा, ‘दूरसंचार/इंटरनेट सेवाओं का अस्थायी निलंबन सख्त सुरक्षा उपायों के तहत कानून और व्यवस्था बनाए रखने के अतिव्यापी उद्देश्य के साथ लिया जाता है.’

सबसे अंत में सरकार ने इस दावे का खंडन किया कि विदेशी योगदान नियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन के कारण एनजीओ एमनेस्टी इंटरनेशनल की संपत्तियां जब्त हो गईं और कहा कि एनजीओ ने एफसीआरए अधिनियम के तहत केवल एक बार अनुमति प्राप्त की थी और वह भी 20 साल पहले 19 दिसंबर 2000 को.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)