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किसान आंदोलन कब तक चलेगा ये नहीं पता, पर किसान अपनी बात मनवाकर ही जाएगा: राकेश टिकैत

साक्षात्कार: कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ चल रहे किसान आंदोलन को सौ दिन पूरे हो चुके हैं. 22 जनवरी को केंद्र से आख़िरी बार हुई बातचीत के बाद से जहां किसान नेता आंदोलन को देशव्यापी बनाने के प्रयास में हैं, वहीं सरकार भी अपने पक्ष में समर्थन जुटाने में लगी है. आंदोलन को लेकर भाकियू नेता राकेश टिकैत से बातचीत.

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत. (फोटो: सिराज अली/द वायर)

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत. (फोटो: सिराज अली/द वायर)

दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन को 100 दिन पूरे हो चुके हैं और पिछले साल नवंबर में शुरू हुआ आंदोलन मार्च में भी जारी है.

इस बीच दिल्ली की सीमाओं पर पहुंचने से रोकने के लिए किसानों पर लाठीचार्च, आंसू गैस, वाटर कैनन का इस्तेमाल किया गया, धरना स्थलों पर बिजली, पानी की सप्लाई काटी गई, 26 जनवरी की हिंसा के बाद धरना स्थलों का खाली कराने का प्रयास किया गया. हालांकि, इन सब के बावजूद आंदोलन व्यापक होता चला जा रहा है.

किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं की सरकार के साथ आखिरी बार बातचीत 22 जनवरी को हुई थी. उसके बाद से जहां सरकार अपने पक्ष में समर्थन जुटाने की कोशिश में लगी है तो किसान नेताओं ने आंदोलन को तेज करते हुए देशव्यापी बनाने में लगे हैं.

बीते 29 जनवरी को भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत के भावुक भाषण के बाद मुजफ्फरनगर के सिसौली में पहली महापंचायत हुई थी.

इसके बाद जहां पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शुरू हुआ महापंचायतों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है, वहीं कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी जैसे विपक्षी दल भी पश्चिमी यूपी के अलग-अलग इलाकों में रैलियां कर रहे हैं.

राकेश टिकैत भी देश के अलग-अलग राज्यों में जाकर रैलियां कर रहे हैं. संयुक्त किसान मोर्चा ने भी पांच चुनावी राज्यों में भी भाजपा के खिलाफ प्रचार का ऐलान कर दिया है.

किसान आंदोलन के 100 दिन पूरे होने और आंदोलन को आगे ले जाने की रणनीति पर राकेश टिकैत से विशाल जायसवाल की बातचीत.

किसान आंदोलन को सौ दिन पूरे हो गए हैं. इतने समय तक आंदोलन के चलने को कैसे देखते हैं? इसे आगे कितने दिन तक ले जाने की रणनीति है?

यह तो शांतिपूर्ण तरीके से और धीरे-धीरे आंदोलन चलता रहेगा. देशभर में बैठकें चलती रहेंगी और बड़ी-बड़ी पंचायतें भी होती रहेंगी. धरना स्थलों पर भी हमारी बैठकें चलती रहेंगी.

जहां तक इसे आगे ले जाने की बात है तो यह आंदोलन एक विचार से उत्पन्न हो रहा है और जो कोई आंदोलन विचार से उत्पन्न होगा वह ऐसे ही खत्म नहीं होगा. न तो वह डंडे से या गोली से खत्म होगा… वह आंदोलन विचार से ही खत्म होगा.

इस आंदोलन की क्या लिमिट होगी… क्या रिजल्ट होगा यह भी नहीं पता लेकिन यह है कि यहां से किसान वैसे नहीं जाएगा. इसे हासिल करके ही किसान यहां से जाएगा.

22 जनवरी के बाद से ही किसान संगठनों और सरकार के बीच बातचीत बंद है. क्या लगता है यह गतिरोध कैसे टूटेगा और बातचीत आगे बढ़ेगी?

जब सरकार को जरूरत होगी बात आगे बढ़ जाएगी. बात तो सरकार को करनी होगी… जब सरकार को जरूरत होगी बात कर लेंगे. हमें तो ज्यादा जरूरत है नहीं और न ही हमारे कहने से सरकार बात करेगी.

हमारा यही है कि जब तीन बिल वापसी हो जाए, (न्यूनतम समर्थन मूल्य) एमएसपी पर कानून बन जाए, सरकार इन चीजों पर तैयार हो तो बात कर ले. नहीं तैयार है तो चलने दे ऐसे ही.

एमएसपी किसानों का एक बड़ा मुद्दा है. जहां सरकार लगातार कह रही है एमएसपी था, है और रहेगा मगर आप कानून की गारंटी चाहते हैं. इसका समाधान कैसे निकलेगा?

हां, एमएसपी था, है, रहेगा… सरकार ने यह कहा. आ जाने दो गेहूं… हम गेहूं लेकर जाएंगे संसद. हमें कैसे पता चलेगा कि मंडी कहां है. हम वहां पार्लियामेंट में लेकर जाएंगे गेहूं. वहां देखेंगे कि बिकता है क्या एमएसपी पर.

हम गेहूं की फसल को लेकर संसद तक जाएंगे, बढ़िया मंडी है वहां पर क्योंकि वहीं व्यापारी बैठते हैं अंदर और बाहर फसल बेचेंगे. देखते हैं कितने रेट पर बिकता है. मंडी ही तो है संसद भवन. भई प्रधानमंत्री ने तो कहा कि अपनी फसल कहीं पर भी बेच लो… मंडी से बाहर भी बेच लो. तो हमें तो वहां ठीक रहेगा… बढ़िया मैदान है वहां और वहां बिकेगा.

एमएसपी पर कानून बने जो भारत सरकार ने रेट तय कर रखा है… उससे कम पर खरीद न हो. यह कानून बनाना पड़ेगा इनको, तभी किसानों को लाभ होगा. सरकार खरीदे या कोई व्यापारी खरीदे… उससे कम पर न खरीदे.

29 जनवरी के आपके भावुक भाषण के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट नेता और किसान नेता इकट्ठे होने लगे. विभिन्न विपक्षी पार्टियां भी समर्थन में खुलकर आ गई हैं. कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी ने रैलियां की हैं और पंचायतें हो रही हैं. क्या इससे सरकार पर दबाव बनाने में सफल होंगे?

क्या अखिलेश यादव ने जाट रैली की या प्रियंका गांधी ने जाट रैली की? हमारे समर्थन में किसान आया है. यह तो सरकार की भाषा है जो जातियों में बांटने का काम कर रही है. यहां किसी एक समुदाय की नहीं, किसान की बात हो रही है.

जो विपक्ष काम कर रहा है, उसे करने दो. विपक्ष को भी अपना काम करना चाहिए.

आप महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान जैसे राज्यों में रैलियां कर रहे हैं और पश्चिम बंगाल जैसे चुनावी राज्यों में भी जाने की योजना है. संयुक्त किसान मोर्चा ने भी पांचों चुनावी राज्यों में भाजपा के खिलाफ प्रचार की बात कही है. क्या यह सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति है?

हम अपनी बात करेंगे जो नुकसान हो रहा है. एमएसपी पर खरीद नहीं हो रही है, देश में नुकसान बहुत हो रहा है. सबको जाकर बात बताएंगे. सिलेंडर की बात बताएंगे, महंगाई की बात बताएंगे, शिक्षा की बात बताएंगे, फसलों के रेट की बात बताएंगे. किसानों के बीच में जाकर सारी बात बताएंगे. बैठकें करेंगे… रैली करेंगे.

अपनी बात बताएंगे. तीन बिलों के बारे में बताएंगे कि ये बिल आ रहे हैं. बिजली अमेंडमेंट बिल के बारे में बताएंगे. किसानों के बीच में जाएंगे तो सबके बारे में बताएंगे. हम तो ओडिशा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान यूपी, हरियाणा जा रहे हैं जहां के लिए पांच तारीख तक कार्यक्रम लगे हुए हैं.

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत. (फोटो: सिराज अली/द वायर)

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत. (फोटो: सिराज अली/द वायर)

यह मार्च की शुरुआत है और आगे गर्मी बढ़ेगी ऐसे में निश्चित तौर पर यहां किसानों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा होगा. कैसे मुकाबला करेंगे इसका?

गांव में जाने पर क्या मौसम कुछ ठीक हो जाएगा? गर्मी तो गांव में भी रहेगी और यहां पर भी रहेगी. जैसे आदमी गांव में रहेगा, वैसे ही यहां पर भी रहेगा.

जब गर्मी लगेगी तो उसके साधन अपने आप बना लेगा वो. सरकार को चिंता करने की जरूरत नहीं है.

22 जनवरी के बाद से क्या आपकी सरकार से कोई अनौपचारिक बातचीत हुई या किसी खास नेता ने आपसे संपर्क किया?

हमारे से तो किसी ने बात नहीं की. सरकार मिली ही नहीं… पता नहीं कहां गई 22 जनवरी के बाद से. यह पता चला कि गांवों में गई सरकार. गांव में से तो वापसी नहीं आई. आ जाएगी… एक आध महीने में आ जाएगी. हम अपनी मांगें मनवाकर रहेंगे. 2024 तक मान जाएगी.

अगले साल 2022 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. क्या लगता है कि किसान भाजपा के खिलाफ वोट करेंगे?

वोटों का हमें क्या पता. हमें क्या पता किसे कहां वोट देंगे. हमें तो अपनी बात बतानी है. तीन बिलों के बारे में बताएंगे. धरने के बारे में बताएंगे. मंहगाई के बारे में बताएंगे.

वोट का हमें क्या पता कौन कहां देगा. हम तो वोट से बहुत दूर हैं. वोट तो आदमी कहीं न कहीं देता है.

ऐसा देखने में आ रहा है कि गाजीपुर सहित अन्य धरना स्थलों पर भी किसानों की संख्या में कमी आई है. क्या ऐसा है?

किसानों की संख्या कम कहां है. जब अन्ना हजारे ने आंदोलन चलाया तब 48 लोग थे और रात को ही पार्लियामेंट खुली थी. यहां इतने लोग हैं तीन महीने से… सौ दिन हो गए. पार्लियामेंट कोई संज्ञान नहीं ले रहा. सिर्फ इसी पर ध्यान लगा रहे हैं कि भीड़ कम है, ज्यादा है.

कितनी चाहिए भीड़. क्या करना है भीड़ का. दो घंटे की दूरी पर हैं सब लोग, आ जाएंगे. यहां किसान क्या करेंगे, जब जरूरत होगी तब आ जाएगा. अपने खेत का काम करो, यहां पर भी निगाह रखो.

यहां जितनी भी भीड़ है, पर्याप्त भीड़ है यह. भीड़ आती रहती है, जाती रहती है.