भारत

‘देश ख़तरे में है’ का हौवा स्वतंत्र विचारधारा वालों को प्रताड़ित करने का बहाना है

देश में 2017 से 2019 के बीच राष्ट्र विरुद्ध अपराधों के आरोप में प्रति वर्ष औसतन 8,533 मामले दर्ज किए गए. दुनिया का कोई देश अपने ही नागरिकों पर उसे नुकसान पहुंचाने के इतने केस दर्ज नहीं करता. अगर ये सब केस सच हैं तो दो बातें हो सकती हैं- या तो देश में असल में इतने गद्दार हैं, या देश के निर्माण में ही कोई मूलभूत गड़बड़ी है.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

(फाइल फोटो: पीटीआई)

देश में आजकल हर चीज़ खतरे में दिखती है. चाहे धर्म हो, संस्कृति हो, सांप्रदायिक सद्भाव हो या समाज में शान्ति हो, सब बात-बात पर खतरे में बताए जाते हैं. हमारी स्त्रियां तक खतरे में बताई जाती हैं कि विधर्मी उन्हें बहला-फुसलाकर शादी करके धर्म परिवर्तन करा देते हैं.

कितनी बार तो हमारा भूतकाल, जो बदल नहीं सकता, वो भी खतरे में बताया जाता है क्योंकि बहुसंख्यकवादी लोग ये आरोप लगाते हैं कि लिबरल (उदारवादी) लोग इतिहास को अलग ही नजरिये से देख रहे हैं.

और जब ये सब खतरे में नहीं होता तो देश की एकता और अखंडता, आंतरिक सुरक्षा या विकास ही खतरे में पड़ जाते हैं. तुर्रा यह कि इतने खतरों में निरंतर चरमराते रहने के बावजूद भारत के तथाकथित ‘विश्वगुरु’ होने का दावा पेश किया जाता है.

138 करोड़ की आबादी का ये देश, जिसका रक्षा बजट 4,780 अरब रुपयों का है, महज दो लाइन के ट्वीट, वॉट्सऐप संदेश, ईमेल, फेसबुक पोस्ट, लेख, किताब, गाने, नाटक या फिल्म से खतरे में पड़ जाता है.

क्या ये घोर विरोधाभास नहीं है? तब हम किस बात के और कैसे ‘विश्वगुरु’ हुए?

दुनिया का कोई भी देश अपने ही नागरिकों पर देश को नुकसान पहुंचाने के आरोप में इतने केस दर्ज नहीं करता जितना ये प्राचीन सभ्यता वाला महान ‘विश्वगुरु’ करता है.

अगर वे सारे केस सत्य हैं तब तो दो ही बातें हो सकती हैं. या तो देश में वास्तव में इतने गद्दार लोग भरे पड़े हैं, या फिर इस देश के निर्माण में ही कोई मूलभूत गड़बड़ी है.

अगर इतने सारे लोग गद्दार हैं तो इसका मतलब हुआ कि हमारे सारे तथाकथित संस्कार, धर्म, संस्कृति और शिक्षा बेकार गए हैं जो 73 वर्षों में भी उनका हृदय परिवर्तन न कर सके.

दूसरी तरफ अगर देश के निर्माण और उसकी रचना में ही कोई गड़बड़ी है तो हम एक राष्ट्र को नहीं एक शव को या एक विफल प्रयोग को ढोये चले जा रहे हैं.

दोनों ही परिस्थितियां निराशाजनक हैं और उनसे यही ध्वनि निकलती है कि फिर तो कुछ नहीं किया जा सकता.

अगर इस देश की जनता और उसके कर्णधार इन तर्कों की सत्यता को स्वीकार नहीं करते तब तो मात्र यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ये सारे केस फर्जी हैं और उन लोगों को प्रताड़ित करने के लिए लादे गए हैं जिन्हें सरकार स्वतंत्र विचारधारा वाला और बहुसंख्यकवाद से इत्तेफाक न रखने वाला समझती है और उस नाते उन्हें कुचल देना चाहती है.

इस प्रकार के ‘शिकार’ जैसा कि विशेषकर के गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) और राजद्रोह के क़ानून के दुरुपयोग के प्रसंग में देखा गया है, प्रायः मुस्लिम, तथाकथित वामपंथी और ‘शहरी नक्सल’, विचारक, लेखक, कवि, विद्यार्थी, कार्यकर्ता और समाज के अन्य उपेक्षित तबके होते हैं.

दूसरे शब्दों में, ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसके विचार बहुसंख्यकवाद के विचारों से मेल नहीं खाते या जिसकी कोई समस्या या व्यथा सरकार या बहुसंख्यकों को किसी भी कारण से नापसंद होती है, उसे तत्क्षण देशद्रोही या आतंकवादी करार करके शासन की पूरी ताक़त उसे कुचलने के लिए झोंक दी जाती है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड बोर्ड (एनसीआरबी) के ‘क्राइम इन इंडिया-2019’ के अनुसार 2017 से 2019 के बीच देश में राष्ट्र के विरुद्ध किए गए अपराधों के आरोपों में 25,118 यानी प्रति वर्ष औसतन 8,533 मामले दर्ज किए गए. इनमें 27.8% अकेले उत्तर प्रदेश से आते हैं.

राष्ट्र के विरुद्ध किए गए इन अपराधों में 2019 में 93 मामले राजद्रोह (धारा 124 ए आईपीसी), 73 मामले देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने (धारा 121 आईपीसी आदि), 58 मामले राष्ट्र की एकता और अखंडता को खतरा पहुंचाने (धारा 153 बी आईपीसी) और 1,226 मामले यूएपीए के तहत दर्ज किए गए हैं.

पुलिस ने इन केसों में 95 लोगों को राजद्रोह के और 1,900 लोगों को यूएपीए के आरोप में गिरफ्तार किया. और ऐसा तब हुआ जबकि इस दौरान देश में कहीं भी कोई भी वास्तविक आतंकवादी हमला हुआ ही नहीं!

आप खुद ही सोचें, देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने की घटना भला कब हुई? इससे क्या पता चलता है? क्या ये बात गले के नीचे उतारी जा सकती है कि देश में इतने सारे आतंकी होंगे?

क्या इस दौरान किसी ने भी सुप्रीम कोर्ट के केदारनाथ सिंह के फैसले के परिप्रेक्ष्य में ऐसा कहा था कि वह केंद्र सरकार को बलपूर्वक उखाड़कर फेंक देना चाहता है, जिससे वो देशद्रोही साबित हो?

कश्मीर और उत्तरपूर्व के आतंकी देश से अलग होने की बात बेशक करते थे, लेकिन मेरी जानकारी में उन्होंने ऐसा कभी नहीं कहा कि वे दिल्ली सरकार को उखाड़ फेंकना चाहते हैं.

सीपीआई (माओवादी) ने 2004 में अपने एक दस्तावेज़ में क्रांति की बात ज़रूर की थी लेकिन उसके बाद से वे भी समझ गए हैं कि क्रांति होने से रही और अब वे भी क्रांति की बात नहीं करते.

बहस के लिए एक क्षण ये मान भी लिया जाए कि देश में इतने सारे आतंकी मौजूद हैं और ऐसी हालत है कि प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के शोध छात्र और प्रोफेसर भी आतंकी माने जा रहे हैं, तो उसका सीधा मतलब होगा कि देश की सरकार, उसके निज़ाम और जिस प्रकार से ये देश अपना समय गुज़ार रहा है, उसमें कोई भारी गड़बड़ है.

जो चीज़ दुनिया के किसी देश में नहीं होती, वो अगर इस देश में हो रही है तो गड़बड़ देश में होनी चाहिए, देशवासियों में नहीं.

अगर देशवासियों में ही गड़बड़ है तो जाने दीजिये, फिर देश किसके लिए बनाए रखना है? अन्यथा, हमें यह मानना होगा कि ये सारे मुकदमे फर्जी हैं और बदनीयती से लगाये गए हैं.

अगर गड़बड़ देश में है तो हमें गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए कि हमारे राष्ट्र निर्माण के प्रयोग में कहां और क्या चूक हुई?

हम इस सत्य से तो नहीं भाग सकते न कि आजादी के 73 वर्ष बाद भी इस देश में हर प्रकार के नेतागण रोज़ ही देश की एकता और अखंडता बनाए रखने की अपील किया करते हैं.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

दुनिया के किसी देश में ऐसा नहीं होता. हम लोग पाकिस्तान को एक ‘फ़ेल्ड स्टेट’ या असफल राष्ट्र कहते नहीं थकते. सच तो यह है कि वहां भी देश की एकता और अखंडता बनाए रखने की यूं दुहाई नहीं दी जाती.

हमें पूछना चाहिए कि देश की एकता और अखंडता को खतरा है किससे? किसी बाहरी शत्रु से तो नहीं है.

लगभग चौदह लाख की हमारी थल सेना दुनिया की सबसे बड़ी फौज है—चीन से भी बड़ी. अब ये तो कोई कह नहीं रहा कि फौज किसी काम की नहीं है. इसलिए हम उधर से निश्चिंत हैं.

इसका मतलब हुआ कि खतरा आंतरिक ही हो सकता है. लेकिन उसके लिए शासन को ये बताना होगा कि क्या बात है कि प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के शोध छात्र और प्रोफेसर भी देश से ग़द्दारी कर रहे हैं?

हमारी घुट्टी में क्या कमी है? और कुछ कमी है तो इतने वर्षों में उसे दूर क्यों नहीं किया गया? किसने रोका था?

चूंकि आज तक कोई भी इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया है, लिहाजा हम ये मानने को बाध्य हैं कि ऐसे सभी लोगों को निहित राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मात्र सैद्धांतिक मतभेद रखने पर भी फर्जी मामलों में फंसाया गया है.

सत्ता की स्वाभाविक गति निरंकुशता की ओर होती है. विशेषकर ऐसी सत्ता जिसकी नींव ही मतदाताओं को मूर्ख बनाने से पड़ी हो, वैचारिक मतभेद को लेकर बड़ी असुरक्षा की भावना से पीड़ित होती है.

उन्हें यही भय सताए रहता है कि कहीं उनकी पोल और जनता की आंखें न खुल जाएं. इसलिए वे दमन का सहारा लेते हैं.

प्रख्यात चीनी विचारक सुन ज़ू ने कहा था, ‘एक को मारो, दस हज़ार को भयभीत कर दो.’ आधुनिक सत्ताओं ने इसे थोड़ा बदल दिया है, ‘एक को फर्जी केस में फंसा दो, दस हज़ार को भयभीत कर दो.’

2017-19 के दौरान 6,250 मुकदमे विभिन्न समुदायों में वैमनस्य बढ़ने के आरोप में दर्ज किए गए. इनमें से ज़्यादातर धार्मिक या अन्य भावनाओं को आहत करने से संबंधित हैं.

आप इस पर विचार करें. तथाकथित ‘विश्वगुरु’ कहे जाने वाले देश में क्या लोग 21 वीं सदी के तीसरे दशक में भी वास्तव में इतने तुनकमिज़ाज, इतने छुईमुई हैं कि बात-बात पर उनकी धार्मिक भावनाएं इस क़दर आहत हो जाती हैं कि क़ानून व्यवस्था बिगड़ जाए और लोग दंगों पर उतारू हो जाएं?

क्या देश में लोगों के पास धर्म को लेकर उत्तेजित हो जाने के अलावा और कोई काम नहीं है?

हमारे देश में ईशनिंदा का कोई अलग से क़ानून नहीं है लेकिन धारा 153 ए आईपीसी और धारा 295 ए आईपीसी का जिस तरह से व्यापक दुरुपयोग हो रहा है, वो भयावह है.

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने रामजी लाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (1957) के फैसले में कहा था कि लापरवाही से या मूर्खतावश कोई किसी धर्म या उसके अनुयायियों का अपमान कर देता है तो वो दंडनीय नहीं है; दंड तब बनता है जब ऐसा अपमान जानबूझकर बदनीयती से किया गया हो. लेकिन आज देख रहे हैं कि चुटकुलों पर भी धारा 295 लगा दी जा रही है.

सुप्रिटेंडेंट सेंट्रल जेल, फतेहगढ़ बनाम राम मनोहर लोहिया (1960) के मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने व्यवस्था दी थी कि आरोपित बात और क़ानून व्यवस्था के बीच का संबंध आसन्न होना चाहिए, कोई दूर की कौड़ी नहीं. लेकिन आज उन ट्वीट्स और लेखों पर भी धारा 295ए /153ए के तहत मामला दर्ज पाते हैं जिन्हें गिनती के लोगों ने पढ़ा हो.

रमेश बनाम भारत सरकार (1988) और प्रवासी भलाई संगठन बनाम भारत सरकार और अन्य (2014) के केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरोपित शब्दों के प्रभाव को एक संयत (रीज़नेबल), दृढ़ दिमाग वाले और साहसी व्यक्ति के मापदंडों पर जांचा जाना चाहिए न कि कमज़ोर और ढुलमुल या हिचकिचाने (वैसिलेटिंग) वाले दिमाग के लोगों या उनके मापदंडों पर, जिन्हें हर मतभेद में खतरा दिखाई देने लगता है.

जिस फुर्ती के साथ अब पुलिस भावनाएं आहत होने के मामले दर्ज करती है उससे तो लगता है कि देश में संयत (रीज़नेबल), दृढ़ दिमाग़ वाले और साहसी व्यक्ति बचे ही नहीं हैं.

गोया ये हमारा 138 करोड़ का देश न हुआ, बारूद का ढेर हो गया जो बहुसंख्यकवाद के मत से भिन्न कोई बात होते ही फट पड़ेगा.

आंतरिक कारणों से खतरे शायद कम लगे तो अब अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्रों की बात भी होने लगी है जो देश को बदनाम करना चाहते हैं.

एक वक़्त था जब जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने उत्तर प्रदेश सरकार बनाम ललाई सिंह यादव (1976) के फैसले में प्रख्यात ब्रिटिश राजनीति विज्ञानी हैरॉल्ड लास्की को उद्धृत करते हुए कहा था, ‘सरकार अपने समर्थकों की प्रशंसा के मुकाबले अपने विरोधियों की आलोचना से कहीं ज़्यादा सीख सकती है. आलोचना का दबाया जाना अंततोगत्वा पतन का कारण बनता है.’

अब तो हालत ये है कि मज़ाक़ पर भी केस हो जाता है.

अमेरिका में डेमोक्रेट प्रतिनिधि अलेक्सैंड्रिया ओकैसियो कोर्टेज़ ने तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना करते हुए कहा था, ‘आप क्रोधित हैं क्योंकि आप ऐसे अमेरिका की कल्पना नहीं कर सकते जिसमें हम शामिल हों. आप अपनी लूट के लिए एक भयभीत अमेरिका पर निर्भर हैं.’

आज के भारत की स्थिति डरावने रूप से इससे मिलती है. या तो हम ‘भयभीत भारत’ बन चुके हैं या अगर आप इसे मानने से इनकार कर दें, तो इसका मतलब होगा कि सरकारें शासन चलाने के लिए भय को एकमात्र साधन के रूप में प्रयोग कर रही हैं.

(लेखक रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं और केरल के पुलिस महानिदेशक और बीएसएफ व सीआरपीएफ में अतिरिक्त महानिदेशक रहे हैं.)

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