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गर्भवती बलात्कार पीड़िता को क़ानूनी अधिकारों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने 20 सप्ताह से ज्यादा अवधि के अवांछित गर्भ के समापन के मामलों में निर्णय लेने के लिए राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में मेडिकल बोर्ड गठित करने के अनुरोध वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है. गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 की धारा तीन के तहत 20 सप्ताह के बाद गर्भपात कराना प्रतिबंधित है.

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि गर्भवती हुई बलात्कार पीड़िता को उसके कानूनी अधिकारों के बारे में अवश्य जानकारी दी जानी चाहिए.

साथ ही न्यायालय ने 20 सप्ताह से ज्यादा अवधि के अवांछित गर्भ के समापन के मामलों में निर्णय लेने के लिए राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में मेडिकल बोर्ड गठित करने के अनुरोध वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया. केंद्र को चार सप्ताह में नोटिस का जवाब देना है.

गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 की धारा तीन के तहत 20 सप्ताह के बाद गर्भपात कराना प्रतिबंधित है.

प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने कहा, ‘अगर एक महिला का बलात्कार होता है और वह गर्भवती है तो उसे मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम के तहत उसके कानूनी अधिकारों के बारे में अवश्य बताया जाना चाहिए.’

पीठ ने 14 वर्षीय बलात्कार पीड़िता की ओर से पेश वकील वीके बिजु द्वारा सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में मेडिकल बोर्ड गठित करने के अनुरोध का संज्ञान लिया.

विजु ने स्पष्ट चिकित्सकीय सलाह के बाद पीड़िता के 26 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति का अनुरोध नहीं करने का निर्णय लिया.

इससे पहले पीड़िता के गर्भपात की अनुमति दिए जाने के अलावा याचिका में 20 सप्ताह से अधिक समय बाद अनचाहे गर्भ को समाप्त करने के बाबत मेडिकल बोर्ड गठित करने के लिए दिशा-निर्देश तय करने का अनुरोध किया गया था.

संक्षिप्त सुनवाई के दौरान बिजु ने कहा कि वह फिलहाल गर्भपात की अनुमति नहीं मांग रहे हैं, लेकिन राज्यों में मेडिकल बोर्ड गठित करने का अनुरोध कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, ‘जब मैं इस याचिका को तैयार कर रहा था, तब मैंने माता-पिता (लड़की के) का दर्द महसूस किया है.’

पीठ ने इस मामले में पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से कहा कि इस तरह के मामलों को देखने के लिए अगर स्थानीय बोर्ड है तो यह काफी मददगार साबित होगा.

भाटी ने कहा कि वह इस मामले से संबंधित मुद्दों की जानकारी देने वाला एक शपथ-पत्र दायर करेंगी.

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को सूचित किया कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम में संशोधन बिल लोकसभा में पारित हो चुका है और राज्यसभा के पास लंबित है.

एमटीपी अधिनियम के तहत गर्भावस्था को समाप्त करने पर कानूनी रोक है, जो 20 सप्ताह से अधिक है. यह अधिनियम की धारा 3 (2) (बी) के तहत प्रदान किया गया है.

जनवरी 2020 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने चिकित्सा गर्भपात संशोधन विधेयक, 2020 को मंजूरी दे दी थी. जिसमें विशेष तरह की महिलाओं के गर्भपात के लिए गर्भावस्था की सीमा 20 से बढ़ाकर 24 सप्ताह करने का प्रस्ताव है. इनमें बलात्कार पीड़ित, सगे-संबंधियों के साथ यौन संपर्क की पीड़ित और अन्य महिलाएं (दिव्यांग महिलाएं, नाबालिग) भी शामिल होंगी.

हालांकि अतीत में सुप्रीम कोर्ट ने असाधारण मामलों में मेडिकल बोर्ड से परामर्श के बाद 26 सप्ताह तक की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी है.

पीठ एक नाबालिग लड़की की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने कहा है कि एक रिश्तेदार ने उसके साथ बलात्कार किया और वह गर्भवती हो गई.

शीर्ष अदालत ने पूर्व में भी केंद्र और हरियाणा सरकार से इस मामले में जवाब तलब किया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)