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आरोपी की निजी जानकारियां तीसरे पक्ष को लीक करने वाले जांच अधिकारी के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो: कोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने माना कि एक अभियुक्त के स्मार्टफोन, लैपटॉप या ईमेल खाते की जांच के लिए एक सर्च वारंट आवश्यक है. जांच में सहयोग के लिए केवल एक ट्रायल कोर्ट के आदेश के माध्यम से एक अभियुक्त को उसके गैजेट्स या खातों के पासवर्ड/पासकोड का खुलासा करने के लिए विवश नहीं किया जा सकता है.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

बेंगलुरु: एक महत्वपूर्ण फैसले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने तय किया कि एक जांच अधिकारी के पास एक आरोपी के स्मार्टफोंस या इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से जब्त डेटा को बिना संबंधित अदालत की लिखित अनुमति के किसी तीसरे पक्ष से साझा करने का कोई अधिकार नहीं है.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने आगे कहा कि एक जांच अधिकारी जो ऐसे निजी डेटा को तीसरे पक्ष को लीक करता है तो कर्तव्य का त्याग या अपराध के लिए कार्रवाई की जानी चाहिए.

अदालत ने कहा कि जांच के दौरान पुनर्प्राप्त किए गए ऐसे डेटा का उपयोग गोपनीयता के अधिकार के उल्लंघन के लिए नहीं होगा क्योंकि यह केएस पुट्टस्वामी के फैसले में दिए गए अपवादों (जिसमें निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया गया) के तहत आता है.

हालांकि, किसी भी मामले में जांच अधिकारी द्वारा किसी भी तीसरे पक्ष को अदालत के लिखित अनुमति के बिना इस तरह का विवरण या डेटा प्रदान नहीं किया जा सकता है, जो मामले के दौरान जब्त किया गया है.

उस सूचना या डेटा को सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी- जो व्यक्ति की निजता पर प्रभाव डाल सकता है, हमेशा जांच अधिकारी की होगी. यदि उसे किसी तीसरे पक्ष के साथ ऐसा करते हुए पाया गया हो तो जांच अधिकारी पर कर्तव्य का त्याग या निर्धारित अपराध के आधार पर कार्यवाही की जाएगी.

जस्टिस सूरज गोविंदराज कुख्यात चंदन ड्रग मामले में आरोपी वीरेंद्र खन्ना की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे. खन्ना ने 14-09-2020 के विशेष एनडीपीएस कोर्ट द्वारा पारित आदेश को अवैध और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए चुनौती दी है.

एनडीपीएस कोर्ट ने अपने आदेश में याचिकाकर्ता को पुलिस द्वारा जब्त उनके मोबाइल फोन को अनलॉक करने के लिए सहयोग करने का निर्देश दिया था.

महत्वपूर्ण रूप से, अदालत ने माना कि एक अभियुक्त के स्मार्टफोन, लैपटॉप या ईमेल खाते की जांच के लिए एक सर्च वारंट आवश्यक है. जांच में सहयोग करने के लिए केवल एक ट्रायल कोर्ट के आदेश के माध्यम से एक अभियुक्त को उसके गैजेट्स या खातों के पासवर्ड/पासकोड का खुलासा करने के लिए विवश नहीं किया जा सकता है.

कोर्ट ने स्मार्टफोन या ईमेल खातों की जांच के लिए प्रक्रिया निर्धारित की:

  1. यह आवश्यक होगा कि अभियोजन पक्ष को स्मार्टफोन और ईमेल खाते की तलाशी के लिए सर्च वारंट लेने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़े. एक बार सर्च वारंट जारी होने के बाद यह पासवर्ड, पासकोड आदि प्रदान करना अभियुक्त पर निर्भर करेगा.
  2. जांच एजेंसी यह दर्शाते हुए आरोपी को नोटिस भेज सकती है कि अभियुक्त उक्त पासवर्ड, पासकोड, बायोमीट्रिक्स आदि प्रस्तुत नहीं कर रहा है और उक्त नोटिस में अधिसूचित पहलुओं के संबंध में अभियुक्त के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जाएगा. ऐसे में प्रतिकूल परिस्थितियों से बचने के लिए अभियुक्त अधिकारियों को पासवर्ड, पासकोड या बायोमीट्रिक्स प्रस्तुत कर सकता है.
  3. अभियोजन पक्ष द्वारा किए गए आवेदन पर अभियुक्त या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा पासवर्ड, पासकोड या बायोमीट्रिक्स प्रदान न करने की स्थिति में अदालत, स्मार्टफोन और/या ईमेल सेवा प्रदाता के सेवा प्रदाता को निर्देश दे सकती है कि वह उक्त स्मार्टफोन और/ ईमेल खाते तक पहुंच को सक्षम करने के लिए स्मार्टफोन और या ईमेल को खोलें.
  4. निर्माता और सेवा प्रदाता द्वारा स्मार्टफोन, ईमेल एकाउंट या कंप्यूटर उपकरण न खोलने की स्थिति में उस संबंध में दायर किए गए एक आवेदन पर न्यायालय जांच अधिकारी को स्मार्टफोन और/या ईमेल खाते को हैक करने की अनुमति दे सकता है.
  5. जांच एजेंसी को ऐसे व्यक्तियों की सेवाओं लेने के लिए सशक्त किया जाएगा, जो स्मार्टफोन और ईमेल खाते में हैक करने और उसमें उपलब्ध डेटा का उपयोग करने के लिए आवश्यक हो सकते हैं जो आरोपी द्वारा जांच अधिकारियों का सहयोग करने या बंद परिसर के दरवाजे खोलने से इनकार करने पर परिसर का एक ताला या दरवाजा खोलने के समान होगा.
  6. इस दौरान यदि जांच एजेंसी स्मार्टफोन और/या ईमेल एकाउंट को हैक कर पाने में असफल रहती है और यदि इस प्रक्रिया के दौरान स्मार्टफोन और/या ईमेल एकाउंट का डेटा खत्म कर दिया जाता है तब जांच एजेंसी/अभियोजन उस नोटिस पर भरोसा करने के लिए स्वतंत्र होगा जिसके द्वारा आरोपी को प्रतिकूल प्रभाव की चेतावनी दी गई थी.

इस मामले में अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया जिसमें आरोपी को जांच में सहयोग करने का निर्देश देते हुए पासवर्ड प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था.

न्यायालय ने कहा कि जांच अधिकारी को स्मार्टफोन/ईमेल खातों की जांच करने के लिए उपरोक्त प्रक्रिया के अनुसार तलाशी वारंट लेना होगा.

अदालत ने कहा कि आज स्मार्टफोन विभिन्न सोशल मीडिया ऐप चलाने, ऑनलाइन ट्रांजैक्शन और खरीददारी करने, क्लाउड या रिमोट सर्वर पर तस्वीरें, दस्तावेज रखने जैसी अनगिनत चीजों के लिए इस्तेमाल की जाती हैं.

इस तरह से अगर किसी जांच अधिकारी को उस तक पहुंच दी जाती है तो वह उस उपकरण के डेटा ही नहीं बल्कि क्लाउड या रिमोट सर्वर के डेटा तक भी पहुंच सकता है जिसमें निजी जानकारियां, वित्तीय लेन-देन, खास बातचीत और बहुत-सी चीजें शामिल हो सकती हैं.

इसके साथ ही अदालत ने 23 सितंबर 2020 के आरोपी का पॉलीग्राफ टेस्ट कराने का आदेश भी निरस्त कर दिया और कहा कि प्रशासन को ऐसा आदेश देने से पहले संबंधित व्यक्ति से इसकी अनुमति लेना अनिवार्य है.

बता दें कि इससे पहले बेंगलुरु की पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अनुरोध किया था कि पुलिस को उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी से जुड़ी जांच की कोई भी सामग्री मीडिया में लीक करने से रोका जाए.

इसके बाद दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाईकोर्ट से कहा था कि उसने किसानों के प्रदर्शन से जुड़ी ‘टूलकिट’ साझा करने के मामले में गिरफ्तार जलवायु कार्यकर्ता दिशा रवि के मामले की जांच से जुड़ी कोई भी जानकारी मीडिया में लीक नहीं की है.

हालांकि, अदालत ने पुलिस को यह हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा था कि उसने मीडिया को जांच से संबंधित कोई भी सामग्री लीक नहीं की है.