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जल्द न्याय पाना मौलिक अधिकार भले न हो, पर मानवाधिकार है: सुप्रीम कोर्ट जज

जस्टिस मदन बी लोकुर ने कहा, याचिकाकर्ता को कुछ मामलों में न्याय पाने के लिए दशकों इंतज़ार करना पड़ता है. यह हमारी न्याय व्यवस्था के लिए अच्छा प्रतीत नहीं होता है.

भारतीय सुप्रीम कोर्ट (फोटो: रायटर्स)

भारतीय सुप्रीम कोर्ट (फोटो: रायटर्स)

इलाहाबाद: उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर का मानना है कि त्वरित गति से न्याय पाना भले ही मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन निश्चित तौर पर यह एक मानवाधिकार है.

शनिवार शाम इलाहाबाद उच्च न्यायालय और इसकी लखनऊ पीठ में एक-एक ई-कोर्ट का उद्घाटन करने के बाद न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा, कभी-कभी ऐसा कहा जाता है कि त्वरित गति से न्याय पाना मौलिक अधिकार है, मैं इसे पक्के तौर पर नहीं कह सकता, लेकिन त्वरित गति से न्याय पाना निश्चित तौर पर एक मानवाधिकार है.

उन्होंने कहा, याचिकाकर्ता को कुछ मामलों में न्याय पाने के लिए दशकों इंतजार करना पड़ता है. यह हमारी न्याय व्यवस्था के लिए अच्छा प्रतीत नहीं होता है. इसलिए हमें कहीं अधिक प्रभावी तरीके से कंप्यूटर प्रौद्योगिकी का उपयोग करना है और केस मैनजमेंट की चुनौती को गंभीरता से लेना है ताकि हम आम लोगों को त्वरित गति से न्याय उपलब्ध करा सकें.

उच्चतम न्यायालय में ई-कमेटी के प्रभारी न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा, ई-कमेटी का प्रयास केस मैनेजमेंट और कोर्ट मैनेजमेंट को हकीकत में बदलना है. हम केस मैनेजमेंट पर काफी वर्षों से बात करते आ रहे हैं, लेकिन इन चर्चाओं से कुछ ठोस हासिल नहीं हुआ.

हम इसका कारण मानते हैं कि कंप्यूटरीकरण का दोहन नहीं किया गया. मैं न्यायधीशों से केस मैनेजमेंट को कहीं अधिक गंभीरता से लेने का अनुरोध करता हूं.

उन्होंने कहा, अदालत में कंप्यूटर प्रौद्योगिकी का उपयोग 20-25 वर्षों से होता रहा है, लेकिन इसका जोर जजों पर काम का बोझ हल्का करने पर रहा है. उच्चतम न्यायालय की ई-कमेटी के प्रमुख एजेंडा में से एक यह है कि कंप्यूटर प्रौद्योगिकी का लाभ वकीलों, रजिस्ट्री और सबसे महत्वपूर्ण याचिकाकर्ताओं को उपलब्ध कराना है.

उन्होंने कहा, नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड से अभी तक 14 उच्च न्यायालय जुड़ चुके हैं और अगले कुछ हफ्तों में प्रत्येक उच्च न्यायालय इस पर आ जाएगा. इससे हर वकील और याचिकाकर्ता अपने केस की स्थिति जान सकेगा.

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दिलीप बी भोसले ने कहा, न्यायमूर्त मदन बी लोकुर के ई-कमेटी का प्रभार संभालने के बाद से चीजें काफी तेजी से आगे बढ़ी हैं और न्याय व्यवस्था से जुड़े लोग नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड से सूचनाओं का लाभ उठा रहे हैं.

पिछले एक वर्ष में इस उच्च न्यायालय में कई नई सेवाएं शुरू की गई हैं जिसमें ऐप की लांचिंग भी शामिल है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायधीश और कंप्यूटरीकरण समिति के चेयरमैन न्यायमूर्ति दिलीप गुप्ता ने कहा, कोर्ट नंबर 9 इस अदालत का पहला ई-कोर्ट होगा जिसकी पीठ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अंजनी मिश्रा होंगे. यह कागज रहित कोर्ट होगा. ई-कोर्ट 21 अगस्त से काम करना शुरू कर देंगे.

उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव राजीव कुमार ने कहा, सरकार में भी हम इस दिशा में काम कर रहे हैं कि ई-फाइलों का उपयोग लखनऊ में सचिवालय में किया जाए और यह प्रक्रिया एक जनवरी तक पूरी होने की संभावना है. हम उम्मीद करते हैं कि इस विा वर्ष के पूरा होने से पहले जो लोग भी सचिवालय पधारेंगे, उन्हें एक अलग परिदृश्य देखने को मिलेगा.

उन्होंने कहा, मैं आपको यह भी जानकारी देना चाहूंगा कि भारत सरकार के दूरसंचार विभाग के भारत नेट प्रोग्राम के तहत उत्तर प्रदेश के 35,000 ग्राम समाज मार्च, 2018 तक ई-नेट से जुड़ जाएंगे और सभी ग्राम समाज मार्च, 2019 तक ई-नेट पर होंगे.

उद्घाटन समारोह में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल, महाधिवक्ता राघवेंद्र सिंह, प्रमुख सचिव सूचना अवनीश अवस्थी, हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल तिवारी मौजूद थे.