दुनिया

मिज़ोरम जातीय समूह ने केंद्र से म्यांमार से आने वालों को शरणार्थी का दर्जा देने की मांग की

भारत, म्यांमार और बांग्लादेश में मौजूद जातीय समूह का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन ने गृह मंत्रालय से यह भी आग्रह किया कि वह म्यांमार की सीमा से लगे चार पूर्वोत्तर राज्यों- मिज़ोरम, मणिपुर, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश को उस देश से आने वाले लोगों को रोकने का अपना आदेश वापस ले.

म्यांमार से भागकर भारत आने वाला वहां का एक पुलिसकर्मी. (फोटो: रॉयटर्स)

आईजोल: भारत, म्यांमार और बांग्लादेश में मौजूद जातीय समूह का प्रतिनिधित्व करने वाले एक संगठन ने मंगलवार को यह मांग करते हुए प्रदर्शन किया कि पिछले महीने म्यांमार में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद भागकर म्यांमार आने वाले लोगों को केंद्र शरणार्थी का दर्जा दे.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, द जो रियूनिफिकेशन ऑर्गनाइजेशन (जोरो) ने गृह मंत्रालय से यह भी आग्रह किया कि वह म्यांमार की सीमा से लगे चार पूर्वोत्तर राज्यों- मिजोरम, मणिपुर, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश को उस देश से आने वाले लोगों को रोकने का अपना आदेश वापस ले.

बता दें कि पिछले महीने म्यांमार में सेना द्वारा सत्ता पर कब्जा करने के बाद से सैकड़ों शरणार्थी मिजोरम पहुंच रहे हैं.

मिजोरम म्यांमार के चिन राज्य के साथ 510 किमी लंबी सीमा साझा करता है और राज्य में शरण लेने वाले म्यांमार के अधिकांश नागरिक चिन से हैं, जिन्हें जो समुदाय के रूप में भी जाना जाता है. वे मिजोरम के मिजोज के समान वंश और संस्कृति साझा करते हैं.

जोरो के अध्यक्ष आर. सांकविया ने प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए कहा, ‘अतीत में बांग्लादेश और अन्य देशों के हजारों लोग अवैध रूप से भारत आ गए हैं. केंद्र सरकार ने उन्हें शरणार्थी के रूप में स्वीकार किया और उन्हें आश्रय प्रदान किया, लेकिन अब उसने चार सीमावर्ती राज्यों को म्यांमार के उन नागरिकों की पहचान करने और निर्वासित करने का निर्देश दिया है, जिन्होंने देश में शरण ली है.’

उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र जो समुदाय के लोगों के साथ भेदभाव कर रहा है.

सांकविया ने दावा किया कि म्यांमार के लगभग 750 लोग अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर मिजोरम में शरण लेने के लिए दाखिल हुए हैं.

इससे पहले जोरो ने केंद्र से म्यांमार की सैन्य जुंटा के नेतृत्व वाली सरकार पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया था.

पिछले हफ्ते मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरमथंगा ने म्यांमार से अवैध माइग्रेशन पर रोक लगाने और शरणार्थियों का तेजी से प्रत्यर्पण सुनिश्चित करने के केंद्र सरकार के आदेश को ‘अस्वीकार्य’ बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उन्हें मानवीय आधार पर शरण देने का अनुरोध किया था.

बता दें कि भारत शरणार्थियों पर संयुक्त राष्ट्र कंवेंशन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है.

गौरतलब है कि म्यांमार में सेना ने बीते एक फरवरी को तख्तापलट कर आंग सान सू ची और अन्य नेताओं को नजरबंद करते हुए देश की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी.

म्यांमार की सेना ने एक साल के लिए देश का नियंत्रण अपने हाथ में लेते हुए कहा था कि उसने देश में नवंबर में हुए चुनावों में धोखाधड़ी की वजह से सत्ता कमांडर इन चीफ मिन आंग ह्लाइंग को सौंप दी है.

सेना का कहना है कि सू ची की निर्वाचित असैन्य सरकार को हटाने का एक कारण यह है कि वह व्यापक चुनावी अनियमितताओं के आरोपों की ठीक से जांच करने में विफल रहीं.

पिछले साल नवंबर में हुए चुनावों में सू ची की पार्टी ने संसद के निचले और ऊपरी सदन की कुल 476 सीटों में से 396 पर जीत दर्ज की थी, जो बहुमत के आंकड़े 322 से कहीं अधिक था, लेकिन 2008 में सेना द्वारा तैयार किए गए संविधान के तहत कुल सीटों में 25 प्रतिशत सीटें सेना को दी गई थीं.

इसके बाद से वहां बड़े स्तर पर विरोध-प्रदर्शन और हिंसा होने की खबरें आई हैं. 14 मार्च सबसे हिंसक दिनों में से एक रहा था. इस दिन प्रदर्शनों के खिलाफ कार्रवाई में कम से कम 38 लोगों की मौत हुई.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)