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किसान आंदोलन के बीच वित्त मंत्रालय ने रखा था कृषि संबंधी योजनाओं के बजट में कटौती का प्रस्ताव

एक्सक्लूसिव: जिस समय किसान आंदोलन शुरू हुआ, तब वित्त मंत्रालय ने कृषि से जुड़ी खाद्य सुरक्षा मिशन, सिंचाई, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना जैसी कई महत्वपूर्ण योजनाओं के बजट घटाने को कहा था. व्यय विभाग ने राज्यों को दालें वितरित करने वाली योजना को कृषि मंत्रालय के बजट में शामिल करने पर सवाल उठाए थे.

The Union Minister for Finance and Corporate Affairs, Smt. Nirmala Sitharaman chairing the Pre-Budget consultations with the leading experts in area of agriculture and agro processing industry, through video conferencing, in New Delhi on December 22, 2020.

वित्त वर्ष 2021-22 के लिए बजट की घोषणा से पहले कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञों के साथ चर्चा करतीं निर्मला सीतारमण. (फोटो साभार: पीआईबी)

नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ जब देश के विभिन्न हिस्सों में किसान प्रदर्शन कर रहे थे, इसी बीच वित्त मंत्रालय ने कृषि से जुड़ी कई महत्वपूर्ण योजनाओं जैसे कि खाद्य सुरक्षा मिशन, सिंचाई, जैविक खेती, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना इत्यादि के बजट में कटौती करने को कहा था.

मंत्रालय ने दावा किया था कि इनमें से अधिकतर योजनाओं से ‘कोई लाभ’ नहीं हो रहा है. इतना ही नहीं, व्यय विभाग के सचिव ने राज्यों को दालें वितरित करने वाली योजना पर ही सवाल उठा दिया और कहा कि कृषि मंत्रालय के बजट में इस तरह की योजना रखने की क्या जरूरत है.

इसके साथ ही किसानों को लाभकारी मूल्य या न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दिलाने वाली योजनाओं के बजट को भी कृषि मंत्रालय के प्रस्ताव की तुलना में काफी कम रखा गया है.

द वायर  द्वारा सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत प्राप्त किए गए दस्तावेजों से ये जानकारी सामने आई है.

वित्त वर्ष 2021-22 के लिए कृषि मंत्रालय का बजट निर्धारित करने के दौरान 10 नवंबर 2020 को व्यय सचिव टीवी सोमानाथान की अध्यक्षता में हुई बैठक में ये फैसला लिया गया था.

दस्तावेजों के मुताबिक, व्यय विभाग ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, बागवानी पर राष्ट्रीय मिशन, परंपरागत कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय बांस मिशन, कृषि प्रबंधन पर एकीकृत योजना और मृदा योजना के बजट को घटाने के लिए था.

इसका असर ये हुआ कि मंत्रालय ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए इन योजनाओं के बजट में भारी कटौती की है.

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कृषि योजनाओं के बजट में कटौती का सुझाव देता व्यय विभाग.

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने आर्थिक कार्य विभाग को भेजे अपने प्रस्ताव में वित्त वर्ष 2021-22 के लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना का बजट 4530 करोड़ रुपये रखने की मांग की थी. हालांकि वित्त मंत्रालय ने इसके लिए 3712.44 करोड़ रुपये ही निर्धारित किया.

इस योजना का उद्देश्य खेती में अधिक उत्पादन, किसानों को अधिक लाभ और खाद्य सुरक्षा, सतत खेती के जरिये समग्र विकास करना है.

इसके अलावा कृषि विभाग ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत 3539 करोड़ रुपये आवंटित करने की मांग की थी, लेकिन वित्त मंत्रालय ने इसका बजट 2096 करोड़ रुपये ही रखा है.

मालूम हो कि कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलनों में किसान एवं कृषि विशेषज्ञों इस बात की चिंता जाहिर की है कि यदि इन कानूनों को खारिज नहीं किया जाता है तो खाद्य सुरक्षा कानून पर ही इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा.

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन का उद्देश्य चावल, गेहूं, दलहन, मोटे अनाज और वाणिज्यिक फसलों के उत्पादन की दिशा में देश को आत्मनिर्भर बनाना है. इस योजना के लिए आवंटित राशि का 60 फीसदी हिस्सा दालों के लिए जाता है. साल 2019-20 से इसमें तिलहन और ताड़ के तेल को भी शामिल कर लिया गया है.

जैविक खेती के लिए मोदी सरकार द्वारा साल 2015 में लाई गई परंपरागत कृषि विकास योजना के लिए इस बार कृषि मंत्रालय ने 500 करोड़ रुपये आवंटित करने की मांग की थी, लेकिन वित्त विभाग ने इसका बजट 450 करोड़ रुपये ही रखा है.

इसके अलावा बागवानी पर राष्ट्रीय मिशन योजना के लिए 3184.25 करोड़ रुपये की मांग की गई थी, लेकिन वित्त मंत्रालय ने इसके लिए 2385 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है.

इस योजना का उद्देश्य भारत में बागवानी क्षेत्र का व्यापक वृद्धि करने के साथ-साथ बागवानी उत्पादन में वृद्धि करना है. इसमें पौधारोपण के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले सामान का प्रयोग करना, किसानों के कौशल में सुधार लाना, सूखे से बचाना, नुकसान को कम करना, सिंचाई के लिए अच्छा प्रबंध जैसी कई चीजें शामिल हैं.

कृषि मंत्रालय ने राष्ट्रीय बांस मिशन के लिए 110 करोड़ रुपये आवंटित करने की मांग की थी, लेकिन इस योजना को 100 करोड़ रुपये ही दिया गया है. इसके तहत बांस पौधरोपण से कृषि उत्पादकता और आय को बढ़ाना है.

मंत्रालय ने इन योजनाओं का बजट कम करने के पीछे दलील दी है कि इनमें से अधिकतर से ‘कोई लाभ’ नहीं हो रहा है. उन्होंने कहा, ‘इन योजनाओं में से अधिकांश के मूल्यांकन परिणाम ‘न अच्छा न बुरा’ हैं.’

एमएसपी दिलाने वाली दो योजनाओं के बजट में भी कटौती

गेहूं, धान और मोटा अनाज (ज्वार, बाजरा और मक्का) के अलावा अन्य कृषि उत्पादों क्रमश: दालें, तिलहन और कोपरा की एमएसपी पर खरीद सुनिश्चित करने और इनके भंडारण के लिए दो प्रमुख योजनाएं- बाजार हस्तक्षेप योजना एवं मूल्य समर्थन प्रणाली (एमआईएस-पीएसएस) और प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण योजना (पीएम-आशा) चल रही हैं.

आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक कृषि मंत्रालय ने वित्त वर्ष 2021-22 के लिए एमआईएस-पीएसएस का बजट 1,700 करोड़ रुपये और पीएम-आशा का बजट 500 करोड़ रुपये घोषित करने की मांग की थी.

लेकिन वित्त मंत्रालय ने इसमें भी कटौती की और एमआईएस-पीएसएस के लिए 1,500.50 करोड़ रुपये और पीएम-आशा के लिए 400 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है. ये राशि पिछले साल के बजट की तुलना में काफी कम है.

वित्त वर्ष 2020-21 के लिए एमआईएस-पीएसएस का बजट 2,000 करोड़ रुपये और पीएम-आशा का बजट 500 करोड़ रुपये रखा गया था. इस तरह इस बार इन दोनों योजनाओं का बजट पिछले साल की तुलना में क्रमश: 500 करोड़ रुपये और 100 करोड़ रुपये कम है.

वहीं, केंद्र द्वारा पीएसएस के तहत खरीदी गई दालों की बिक्री को बढ़ाने के लिए सरकार एक योजना चला रही है, जिसमें 15 रुपये प्रति किलो की छूट पर इसे राज्यों को बेचने का प्रावधान किया गया है, ताकि वे कल्याणकारी योजनाएं जैसे कि मिड-डे मील, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आईसीडीएस इत्यादि में इसका स्तेमाल कर सकें.

हालांकि वित्त मंत्रालय का मानना है कि कृषि मंत्रालय के बजट में इस तरह की योजना की जरूरत नहीं है.

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कृषि मंत्रालय का बजट निर्धारण संबंधी दस्तावेज.

दस्तावेजों के मुताबिक बजट निर्धारण बैठक के दौरान व्यय सचिव टीवी सोमानाथन ने पूछा कि कृषि मंत्रालय के बजट में ‘कल्याणकारी योजनाओं के लिए राज्यों को दाल वितरण’ योजना की क्या जरूरत है और इस संबंध में विचार करने के लिए विभाग को निर्देश दिया गया.

इसके साथ ही वित्त मंत्रालय ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए इस योजना के बजट में भी कटौती कर दी. कृषि मंत्रालय ने इसके लिए 600 करोड़ रुपये आवंटित करने की मांग की थी, लेकिन योजना को 300 करोड़ रुपये ही दिया गया है. पिछले साल इसी योजना का बजट 800 करोड़ रुपये रखा गया था.

मालूम हो कि दालें, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए, प्रोटीन का एक महत्वपूर्ण स्रोत होता है. यही वजह है कि सरकार द्वारा चलाई जा रही पोषण कार्यक्रमों जैसे कि मिड-डे मील योजना में दालों को प्रमुखता देने की सलाह दी जाती है.

कोरोना महामारी के चलते लागू किए गए लॉकडाउन में भी सरकार ने दालें वितरित करने की घोषणा की थी.

दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि कृषि मंत्रालय ने कुल मिलाकर 1.45 लाख करोड़ रुपये का बजट घोषित करने की मांग की थी, लेकिन वित्त मंत्रालय ने इसके बदले में 1.23 लाख करोड़ रुपये का ही आवंटन किया है.

इस साल का बजट पिछले साल की तुलना में आठ फीसदी कम है. पिछले साल का बजट 1.34 लाख करोड़ रुपये का था.

वित्त मंत्रालय का कहना है कि उन्होंने आवंटित राशि को खर्च करने की प्रवत्ति, विभिन्न योजनाओं के तहत बची हुई राशि, व्यय विभाग द्वारा फंड में कटौती को लेकर दिए गए सुझाव इत्यादि को संज्ञान में लेकर बजट का निर्धारण किया गया है.