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मीडिया बादशाह की जूती हो चुकी है

क्या आम्रपाली और जेपी समूह के सताए फ्लैट ओनर पुलिस की गोली से मारे जा रहे किसानों को लेकर व्यथित हुए होंगे, क्या जंतर मंतर पर होने वाले धरनों से सहानुभूति रखते होंगे? क्या कभी नर्मदा के विस्थापितों के लिए अनशन कर रहीं मेधा पाटकर के लिए कुछ सोचा होगा?

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(प्रतीकात्मक तस्वीर: रॉयटर्स)

राजनीतिक चेतना जब तमाशा बन जाती है तो लोग धरना प्रदर्शन की जगह हवन करने लगते हैं. अख़बारों को मेज़ से उठाकर फेंकते समय आम्रपाली और जेपी ग्रुप के सताये फ्लैट ख़रीदारों के प्रदर्शन की तस्वीर पर नज़र पड़ते ही कुछ असहज सा देर तक लगता रहा. जनता ने नेता को दाता और ख़ुद को भिखारी बना दिया है जबकि लोकतंत्र में उसकी कल्पना भाग्य विधाता के रूप में की गई थी.

कोई दस दिनों से सोच रहा था कि फ्लैट ख़रीदारों की बात को लेकर प्राइम टाइम पर लगातार पांच टीवी कार्यक्रम करता हूं, मगर पता नहीं कोई चीज़ मुझे भीतर से टालने के लिए उकसा रही थी.

इस बीच अख़बारों में आम्रपाली और जेपी समूह के सताए सत्तर हज़ार फ्लैट ओनर की समस्या का काफी विस्तार से कवर होता रहा. कुल सत्तर हज़ार फ्लैट हैं तो इतने ओनर मानकर सत्तर हज़ार लिख रहा हूं.

ये वो अख़बार हैं जिनकी प्रसार संख्या मिला लें तो दिल्ली और आस पास की आबादी का बड़ा हिस्सा कवर हो जाता है. ये अख़बार मंत्री से लेकर तमाम तरह के अधिकारियों की मेज़ पर भी पहुंचते होंगे. इन सताए हुए लोगों में अधिकारी भी शामिल हैं.

अगर मीडिया में ताकत बची है तो दिल्ली के और यूपी के सभी बड़े अख़बारों के पहले से लेकर भीतरी पन्ने पर लगातार कवरेज़ से असर हो जाना चाहिए. प्राइम टाइम की कोई ज़रूरत नहीं है. दो तीन साल से फ्लैट ओनर की पीड़ा, आंदोलन और मुलाकातों का कवरेज़ हो ही रहा है.

बीच में केंद्र का बनाया कानून भी आ गया लेकिन उससे लोगों की तक़लीफ़ कितनी कम हुई, उसका दावा सरकार के किसी विज्ञापन में भी नहीं दिखता. कोई मंत्री ट्वीट भी नहीं करता कि हमारे कानून बनाने के बाद मिडिल क्लास भारत के पीड़ित नागरिकों को इतने फ्लैट मिले हैं.

आम्रपाली और जेपी मामले में न्यूज़ चैनलों ने भी रिपोर्टिंग की होगी. एंकर ने झोंटा पटक-पटक कर राष्ट्र प्रहरी से सवाल पूछा होगा. पत्रकारिता की नैतिकता इस दौर की सबसे फटीचर लोकतांत्रित संपत्ति है.

मीडिया बादशाह की जूती हो चुकी है, फिर भी नागरिक इसे ताज समझ कर सलाम करते हैं. बहरहाल, चैनलों ने जल्दी ही अपना गियर उन्हीं ठिकानों पर शिफ्ट कर लिया होगा जहां उस मिडिल क्लास फ्लैट ओनर की शाम गुज़रती है. जिसे मैं हिंदू-मुस्लिम मुद्दा कहता हूं.

यही पीड़ित टीवी देखते वक्त अपने अहं और पूर्वाग्रहों को लेकर उबलते रहे होंगे. उन्हें लग रहा होगा कि वे उस विराट हिंदू ताकत का हिस्सा बन रहे हैं जिसका सपना टीवी के ज़रिये हर दिन जनता को दिखाया जा रहा है. फिर उन्हें धरना क्यों देना पड़ रहा है? मीडिया की ताकत कम हो गई है या जनता की ताकत?

सत्तर हज़ार फ्लैट ओनर. उनकी तमाम पहचानों में एक पहचान यह भी है. इसके सामने न तो मिश्रा होना काम आता है, न ही अग्रवाल होना, न ही यादव होना काम आता है और न ही शाह या मोदी होना. फ्लैट ओनर रियालिटी सेक्टर के बाईप्रोडक्ट हैं जिन्हें नेताओं, अफसरों और बिल्डरों के शातिर गिरोह ने पैदा किया है.

पिछले साल भी हमने प्राइम टाइम में लगातार फ्लैट ओनर की व्यथा पर चर्चा की. बाकी चैनलों ने भी ख़ूब चर्चा की. महान भारत के संध्याकालीन राष्ट्र प्रहरी न्यूज़ एंकरों ने अपनी प्रतिबद्धता साबित कर दी क्योंकि उसे बीच-बीच में अपने मिडल क्लास दर्शकों का भी ख़्याल करना पड़ता है.

उसके बाद फिर वही हिंदू-मुस्लिम वाले टॉपिक शुरू हो गया. फ्लैट ओनर कई महीनों से हर रविवार को नोएडा- ग्रेटर नोएडा में बिल्डरों के दफ्तर के बाहर आंदोलन करते रहे. कुछ नहीं बदला.

मिडिल क्लास को होश ही नहीं रहा कि वह जनता होने की अपनी पहचान का हर शाम टीवी के सामने हवन कर रहा है. एंकर राष्ट्रवाद का नया पुरोहित है. वो राष्ट्रवाद के नाम पर सबसे अपनी पहचान होम करने के लिए कहता लोकतंत्र में जनता के पास जितनी ताकत है, लोकतंत्र उतना ही मज़बूत है. जनता होने की पहचान खो देंगे तो आप सिस्टम के विराट शक्ति समूह के सामने अल्पसंख्यक हो जाएंगे.

वही अल्पसंख्यक जिसके मारे जाने पर भी आप हंस रहे थे, ताली बजा रहे थे. भूल गए कि ऐसा करते हुए आप ख़ुद को भी सत्ता के सामने अल्पसंख्यक बना रहे हैं.

मुझे साफ साफ सत्तर हज़ार फ्लैट ओनर, लाखों शिक्षा मित्र, बीएड डिग्री लेकर बेरोज़गार भटक रहे शिक्षक, सूरत के लाखों कपड़ा व्यापारी, करोड़ों किसान, अल्पसंख्यक नज़र आ रहे हैं. ये सब बहुसंख्यक समाज के हैं मगर सत्ता के सामने अल्पसंख्यक हो चुके हैं.

यही कारण है कि तमाम प्रदर्शनों और नारों के बाद भी सुनवाई नहीं हो रही है. आम्रपाली और जेपी समूह के फ्लैट ओनर जब यह कहते हैं कि अब भगवान का ही सहारा है इसलिए हवन-भजन कर रहे हैं तो वह स्वीकार कर रहे हैं कि महान भारत के लोकतंत्र में वे अब जनता नहीं रहे.

जनता होते तो नेता का नाम लेकर नारे लगाते न कि भगवान का. मीडिया बहस चला रहा है कि चुनावे से पहले से चुनावी नतीजा तय है. भक्त बन चुकी जनता भी इस खेल में शामिल है.

उसे होश ही नहीं है कि ऐसा करते हुए वह जनता होने की शक्ति का सत्ता के अग्निकुंड में हवन कर रही है. वह मोलभाव का अधिकार खो रही है. नेता की जगह भगवान को जगाने के लिए हवन भजन करना लोकतंत्र की सबसे शर्मनाक तस्वीर है. क्या उसमें नेता का नाम लेकर प्रदर्शन करने, नारे लगाने की शक्ति नहीं बची है?

जनता ने खुद को नेता में विलय कर दिया है. जब जनता नेता की प्रतिछाया बन जाएगी तो वह नेता का कटआउट बनकर रह जाएगी. मैं इन दिनों इसी दुविधा में रहता हूं. रोज़ अनेक फोन आते हैं. जब सूरत के कपड़ा व्यापारी फोन कर करीब करीब रोने लगते हैं,तो समझ नहीं आता है.

मैं हर आंदोलन या समस्या को कवर करने का अपराध बोध नहीं ढो सकता, न ही मेरे पास संसाधन और क्षमता है. हर दिन ऐसे दस बारह फोन से गुज़रते हुए मुझे लगता है कि ये जनता का फोन नहीं है. चुनाव से पहले राजनीतिक दल को विजेता घोषित कर देंगे तो फिर उसे क्यों इन बातों से फर्क पड़ेगा?

मैं तो ज़ीरो टीआरपी एंकर हूं, अब तो सभी जगह मेरा शो कई कारणों से दिखता भी नहीं है. अगर मेरे पास इतने फोन आते हैं, तो उन चैनलों के एंकरों के पास कितने फोन आते होंगे जिन्हें चालीस से सत्तर फ़ीसदी हिन्दुस्तान देखता है.

झारखंड के चतरा से लेकर गुजरात की आशा वर्कर, भारत भर के कैजुअल रेडियो अनाउंसरों के इतने फोन आते हैं कि कई बार रोने का मन कर जाता है.

बार बार व्हाट्स अप पर मेसेज आ रहा है कि पिछले आठ दिनों से राजस्थान के साठ हज़ार कर्मचारी हड़ताल पर हैं, आप ही आवाज़ हैं, कवरेज कीजिए. कई बार झुंझला कर मना भी कर देता हूं लेकिन उसके बाद अफसोस से घिर जाता हूं.

मैं न्यूज़ चैनल नहीं देखता मगर हो सकता है उन चैनलों पर भी सारे मसले उठाए जाते हों लेकिन समाधान क्यों नहीं होता? क्या मैं सही हूं कि सरकारों के सामने जनता, जनता नहीं रही. वह सिर्फ हिंदू झुंड है या मुस्लिम झुंड है. हिन्दू झुंड के भीतर अगड़ा झुंड है, पिछड़ा झुंड है या दलित झुंड है. मुस्लिम झुंड के भीतर शिया झुंड है, सुन्नी झुंड है.

क्या वजह यह भी है कि जनता ही जनता के प्रति उदासीन है? क्या आम्रपाली और जेपी समूह के सताए फ्लैट ओनर पुलिस की गोली से मारे जा रहे किसानों को लेकर व्यथित हुए होंगे, क्या आत्महत्या करते किसानों को लेकर बेचैन रहे होंगे, क्या बेरोज़गारी या जंतर मंतर पर होने वाले धरनों से सहानुभूति रखते होंगे?

क्या इस तबके ने नर्मदा के विस्थापितों के लिए अनशन कर रहीं मेधा पाटकर के लिए कुछ सोचा होगा? इन सवालों के जवाब बताएगा कि जंतर-मंतर पर जाकर हवन करने का कोई मतलब है या नहीं.

डाउन टू अर्थ का जुलाई अंक पढ़ रहा था. यह पत्रिका हिंदी में आने लगी है. इसके पेज नंबर 19 पर नवगांधीवादी पीवी राजगोपाल का इंटरव्यू पढ़ रहा था. अनिल अश्विनी शर्मा राजगोपाल से पूछते हैं कि पिछले एक दशक में आपने कई बार आदिवासियों के साथ दिल्ली कूच किया. क्या इन आंदोलन के ज़रिए सत्ता को संदेश देने में कामयाब रहे?

इसके जवाब में राजगोपाल कहते हैं कि सत्याग्रह में एक सत्य होता है. 2006 में चेतावनी यात्रा हुई. 2007 में हमारे साथ 25,000 आदिवासी-किसान आए. इस यात्रा का एक लाभ हुआ कि फोरेस्ट एक्ट लागू हुआ और हम यह कह सकते हैं कि इसके लागू होने से साठ लाख लोगों को ज़मीन मिली है.

इसके बाद अगले पांच साल तक कुछ नहीं हुआ तो हमने एक लाख लोगों की यात्रा की तैयारी की. जयराम रमेश को मालूम था कि दिल्ली में एक लाख लोगों का आना उनकी सरकार के लिए बुरा संदेश होगा. इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री से सलाह ली और यात्रा जब आगरा पहुंची तो वे खुद वहां आए.

दस सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किया. सत्याग्रहियों के साथ यह समझौता ऐतिहासिक था. इसके पहले केंद्र सरकार ने कभी एक लाख लोगों के सामने किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए थे.

अब आम्रपाली, जेपी ग्रुप के सताए सत्तर हज़ार फ्लैट ओनर, सूरत के लाखों कपड़ा व्यापारी, हज़ारों रेलवे अप्रेंटिस, आशा वर्कर, बेरोज़गार शिक्षक अपने आंदोलनों की समीक्षा करें.

क्या उनके आंदोलन में सत्याग्रह का सत्य नहीं है, जब आदिवासी अपनी लड़ाई से जीत हासिल कर सकते हैं तो ताकतवर मिडिल क्लास क्यों हार रहा है? उनका आंदोलन मीडिया कवरेज़ के साथ ही समाप्त या बेअसर क्यों हो जाता है?

आम्रपाली और जेपी समूह के सताए हज़ारों लोगों को जब तक इसका जवाब नहीं मिलता तब तक एक राय देता हूं. नंगे पांव सत्तर हज़ार की संख्या में नोएडा से चलकर जंतर मंतर आइये. एक बार नहीं हज़ार बार आइये.

अपनी मांगों के लिए नहीं, वापस जनता बनने के लिए आइये. अपने आंदोलन में सत्याग्रह का सत्य लाइये. जिस मीडिया से आप उम्मीद करते हैं, उसे ख़त्म करने में आपने भी साथ दिया है. इसलिए अब बादशाह की यह जूती आपके लिए बेकार हो चुकी है. आप इस जूती को उतार फेंक नंगे पांव चलिए.

(यह लेख मूलत: रवीश कुमार के ब्लॉग कस्बा पर प्रकाशित हुआ है)

  • Bhogendra Thakur

    Ravish Kumar is not only a journalist, he is a torchbearer for the society and also showing mirror to it.