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दिल्ली पुलिस ने आधार डेटा की बिक्री संबंधी रिपोर्ट पर ‘द ट्रिब्यून’ के ख़िलाफ़ केस बंद किया

तीन जनवरी 2018 को द ट्रिब्यून अख़बार में प्रकाशित पत्रकार रचना खेड़ा की रिपोर्ट में बताया गया था कि पेटीएम के ज़रिये सिर्फ़ 500 रुपये का भुगतान करने पर दस मिनट के भीतर एक एजेंट ने उन्हें लॉग-इन आईडी और पासवर्ड दिया, जिससे फोटो, फोन नंबर और ईमेल सहित किसी भी आधार नंबर की पूरी जानकारी ली जा सकती थी.

(फोटो साभार: विकिपीडिया)

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नई दिल्लीः अज्ञात विक्रेताओं द्वारा कथित तौर पर आधार डेटा वॉट्सऐप पर बेचे जाने संबंधी द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के बाद अखबार और इसकी रिपोर्टर रचना खेड़ा के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के तीन साल बाद दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने अब यह मामला बंद कर दिया है.

दिल्ली पुलिस कहना है कि इस मामले में आगे की जांच के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं, इसलिए पुलिस ने इस मामले को बंद करने के लिए दिल्ली की एक अदालत के समक्ष आवेदन दिया था.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, तीन जनवरी 2018 प्रकाशित की द ट्रिब्यून की रिपोर्ट में कहा गया था, ‘पेटीएम के जरिये सिर्फ 500 रुपये का भुगतान करने पर दस मिनट के भीतर यह रैकेट चलाने वाले समूह के एजेंट ने रिपोर्टर के लिए गेटवे तैयार किया और उन्हें लॉग इन आईडी और पासवर्ड दिया. हैरानी की बात यह रही कि पोर्टल पर नाम, पता, पोस्टल कोड, फोटो, फोन नंबर और ईमेल सहित किसी भी आधार नंबर की पूरी जानकारी ली जा सकती थी.’

पांच जनवरी 2018 को दर्ज एफआईआर में शिकायतकर्ता बीएम पटनायक ने कहा था, ‘द ट्रिब्यून के जरिये तीन जनवरी 2018 को जानकारी मिली थी कि वॉट्सऐप पर अज्ञात विक्रेता से द ट्रिब्यून को कोई सेवा पेश की गई, जिसके जरिये उन्होंने भारत में एक अरब से अधिक आधार डेटा तक असीमित पहुंच बनाई.’

बीएम पटनायक यूआईडीएआई के लॉजिस्टिक्स और शिकायत निवारण विभाग में काम करते हैं.

इस एफआईआर में द ट्रिब्यून की रिपोर्ट में शामिल अनिल कुमार, सुनील कुमार और राज के नाम भी दर्ज हैं, जिनसे रिपोर्टर खेड़ा ने संपर्क किया था.

एफआईआर में कहा गया, ‘ऊपर उल्लेखित लोगों ने आपराधिक षड्यंत्र कर अवैध तरीके से आधार के ईकोसिस्टम तक सेंध लगाई. इन लोगों का कृत्य आईपीसी की कई धाराओं का उल्लंघन है, इसलिए इस उल्लंघन के लिए साइबर सेल में एफआईआर दर्ज किए जाने की जरूरत है.’

पुलिस ने आईपीसी की धारा 419 (फर्जी पहचान के जरिये धोखाधड़ी), 420 (धोखाधड़ी), 468 (जालसाजी), 471 (जाली दस्तावेज को असली दस्तावेज के रूप में इस्तेमाल करना), आईटी एक्ट की धारा 66 और आधार एक्ट की धारा 36/37 के तहत अपराध शाखा की साइबर सेल में एफआईआर दर्ज होने के बाद अपनी जांच शुरू कर दी.

अधिकारी ने कहा, ‘पुलिस को पता चला कि डेटा तक पहुंच बनाने के लिए गुजरात में सूरत कलेक्टर ऑफिस की लॉग इन आईडी का इस्तेमाल किया गया. उनके ऑफिस के भीतर एक आधार केंद्र चलाया जा रहा था. वहां का स्टाफ उनका लॉग इन आईडी इस्तेमाल कर रहा था, लेकिन किसी तरह की अवैध पहुंच नहीं थी. आमतौर पर आधार कार्ड बनाए जाते हैं और इनमें बदलाव के लिए इस तरह के सेवा केंद्रों से संपर्क किया जाता है.’

पुलिस को आगे पता चला कि आउटसोर्स स्टाफ ने राजस्थान में किसी शख्स से आधार पोर्टल पेज को साझा किया था, जो इस पेज तक पहुंच बना रहा था, लेकिन इस मामले के प्रशासन के संज्ञान में आने के बाद उन्होंने सिस्टम ही बदल दिया.

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया, ‘कानूनी राय लेने के बाद पुलिस को पता चला कि शेयर किया गया पेज लिंक अवैध नहीं था. उन्होंने आधार अधिकारियों से भी चर्चा की. पुलिस को आखिरकार पता चला कि कोई अवैध पहुंच नहीं थी और उन्होंने दिल्ली की एक अदालत के समक्ष मामले को रद्द करने की रिपोर्ट दायर की.’