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मुजफ़्फ़रनगर में 30 लोगों की मौत के बाद रेल मंत्रालय ने कहा, ट्रेन दुर्घटनाओं में कमी आई है

मंत्रालय ने कहा है कि यूपीए सरकार के पहले तीन वर्षों के कार्यकाल में 759 मौतें हुईं, दूसरे कार्यकाल में यह संख्या 938 हो गई. मौजूदा सरकार के पहले तीन वर्षों में यह संख्या 652 है.

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मुजफ्फरनगर में रविवार को उत्कल एक्सप्रेस के 13 कोच एक दूसरे पर चढ़ गए थे. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली/मुंबई: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक भीषण रेल हादसे में करीब 30 लोगों के मरने और 400 लोगों के घायल होने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि रेल मंत्री नैतिकता के आधार पर जिम्मेदारी लेंगे और अपने पद से इस्तीफा देंगे. लेकिन लोकतंत्र में जवाबदेही अब गुजरे जमाने की बात है. रेल मंत्रालय ने उल्टे अपनी पीठ थपथपाई है जैसे कि उसने कोई महान उपलब्धि हासिल की हो.

1956 में जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे. रेल मंत्रालय लालबहादुर शास्त्री के पास था. महबूबनगर एक भीषण रेल हादसा हो गया. लालबहादुर शास्त्री ने इसे अपने मंत्रालय की चूक मानकर हादसे की जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा दे दिया. प्रधानमंत्री नेहरू ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया.

लेकिन तीन महीने बाद अरियालूर में फिर से एक रेल हादसा हुआ, इस दुर्घटना में भी 114 लोग मारे गए. शास्त्री ने फिर जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया. इस बार नेहरू ने इस्तीफा स्वीकार कर लिया. इस्तीफा स्वीकार करते हुए उन्होंने संसद में बताया कि इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया जा रहा है कि शास्त्री की कोई गलती है, बल्कि यह इस्तीफा इसलिए स्वीकार किया जा रहा है ताकि जवाबदेही की एक नजीर बने.

उत्कल एक्सप्रेस के पटरी से उतरने के बाद निशाने पर आए रेल मंत्रालय ने सोमवार को कहा कि सुरक्षा के कई कदम उठाए जाने के बाद पिछले तीन वर्षों में ट्रेन दुर्घटनाओं में कमी आई है.

मंत्रालय ने कहा कि वर्ष 2014-15 में 135 दुर्घटनाएं हुई थी जो 2015-16 में घटकर 107 हो गई, जबकि 2016-17 में यह संख्या कुछ और कम 104 थी.

उत्तर प्रदेश में खतौली के निकट बीते शनिवार को उत्कल एक्प्रेस के 13 डिब्बे पटरी से उतरने के बाद रेल सुरक्षा का मुद्दा सामने आया है. इस हादसे में 30 लोगों की मौत हो गई थी और करीब 400 लोग घायल हुए थे. इनमें से कई घायलों की स्थिति गंभीर बनी हुई है.

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मुजफ्फरनगर में रविवार को उत्कल एक्सप्रेस के 13 कोच एक दूसरे पर चढ़ गए थे. (फोटो: पीटीआई)

मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि चालू वर्ष में अप्रैल-जून की अवधि के दौरान 2016 की इसी अवधि की तुलना में ट्रेन दुर्घटनाओं की संख्या 29 से घटकर 15 हो गई.

बयान में कहा गया हालांकि हर जीवन अमूल्य है और हादसे में किसी की भी मौत हमारे लिए अपूर्णीय क्षति है. हताहतों की संख्या में भी कमी देखी गई है.

इसके मुताबिक, पूर्व की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन संप्रग एक सरकार के पहले तीन वर्षों के कार्यकाल में मृतकों की संख्या 759 थी और संप्रग के दूसरे कार्यकाल के दौरान यह संख्या बढ़कर 938 हो गई. मौजूदा सरकार के पहले तीन वर्षों में यह संख्या घटकर 652 है.

बयान में कहा गया है कि तीव्र ट्रैक नवीनीकरण,रेल आगमन से संबंधित अल्ट्रासोनिक प्रणाली, प्राथमिकता के आधार पर कई मानवरहित फाटकों को हटाना, एक विशेष सुरक्षा निधि के साथ साथ आधुनिक डिब्बे एलएचबी को लाए जाने के लिए कदम उठाए गए हैं ताकि रेल यात्रा को सुरक्षित बनाया जा सकें.

रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अति सुरक्षा से संबंधित कार्यों के लिए राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष 2017-18 के बजट में स्थापित किया गया था.

उन्होंने मुंबई में कहा कि इस निधि की स्थापना पांच वर्षों से अधिक समय के लिए एक लाख करोड़ रुपये की धनराशि से की गई थी.

एक भयानक हादसे के बाद जवाबदेही स्वीकार करने की जगह अपनी पीठ ठोंकना असंवेदनशीलता नहीं है? क्या जो नजीर नेहरू और शास्त्री ने रखी थी, अब देश को उसकी जरूरत नहीं है? क्या अब लोकतंत्र में जवाबदेही जैसी कोई चीज वजूद में नहीं है?

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)