भारत

केन-बेतवा परियोजना से पन्ना बाघ अभयारण्य को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी: सोनिया गांधी

बीते मार्च में केन और बेतवा नदियों को जोड़ने की परियोजना पर जलशक्ति मंत्रालय, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों के बीच समझौता हुआ है. देश भर के कई पर्यावरणविदों ने इसे रोकने की पैरवी की है. कांग्रेस अध्यक्ष ने भी कहा है कि परियोजना के चलते क़रीब 18 लाख पेड़ों को हटाया जाएगा.

केन नदी. (फोटो साभार: विकीमीडिया/A.J.T. Johnsingh/CC BY SA 4.0)

केन नदी. (फोटो साभार: विकीमीडिया/A.J.T. Johnsingh/CC BY SA 4.0)

नई दिल्ली: कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना को उसके मौजूदा स्वरूप में क्रियान्वित नहीं किया जाए क्योंकि इसका मध्य प्रदेश के पन्ना बाघ अभयारण्य पर भयावह प्रभाव पड़ेगा.

पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को लिखे पत्र में उन्होंने यह भी कहा कि इस परियोजना से बाघ अभयारण्य को इतना नुकसान पहुंचेगा कि उसकी क्षतिपूर्ति कभी नहीं हो सकेगी.

उन्होंने पत्र में कहा, ‘मैं आपसे यह सुनिश्चित करने का आग्रह करती हूं कि इस परियोजना को इसके मौजूदा स्वरूप में क्रियान्वित नहीं किया जाए. इसको लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण और उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिकाएं भी लंबित हैं.’

सोनिया गांधी के अनुसार, मध्य प्रदेश और देश भर के कई पर्यावरणविदों ने इस परियोजना को रोकने की पैरवी की है.

कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि पिछले एक दशक में पन्ना अभयारण्य बहुत मुश्किलों और समर्पित प्रयासों से पुनजीर्वित हुआ है.

उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि इस अभयारण्य में करीब 18 लाख पेड़ हैं, जिन्हें इस परियोजना के तहत हटाया जाएगा.

उल्लेखनीय है कि केन और बेतवा नदियों को जोड़ने की परियोजना पर गत 22 मार्च को जलशक्ति मंत्रालय, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों के बीच हस्ताक्षर किया गया.

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, जल के बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों के बीच असहमति के कारण यह परियोजना 18 सालों से लंबित था. समझौते पर हस्ताक्षर के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि इस परियोजना से कम से कम 10 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई करने में मदद मिलेगी और राज्य के नौ जिलों के लोगों को इससे लाभ होगा.

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के दौधन में केन नदी पर 73.8 मीटर ऊंचा बांध प्रस्तावित है. दोनों ही नदियां वर्षा आधारित हैं और यमुना की सहायक नदियां हैं.

इस परियोजना को पूरा होने में आठ साल लगने का अनुमान है, जिसकी अनुमानित लागत 35,111.24 करोड़ रुपया है.

1980 के दशक में इस परियोजना की अवधारणा की गई थी, लेकिन दोनों राज्यों के बीच जल-बंटवारे का समझौता नहीं हो सका था. परियोजना पर काम मूल रूप से 2015 में शुरू किया गया था, लेकिन पिछले साल ही सरकार ने दोनों राज्यों के साथ संशोधित समझौता को आगे बढ़ाया था.

(समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ)