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ओबीसी आयोग को केंद्र की मंज़ूरी, क्रीमी लेयर की आय सीमा बढ़कर 8 लाख

केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने कहा, ओबीसी श्रेणी में 8 लाख रुपये तक प्रति वर्ष आमदनी वालों को आरक्षण का लाभ मिलेगा.

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केंद्रीय कैबिनेट की बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करते वित्त मंत्री अरुण जेटली. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) की श्रेणी में क्रीमी लेयर की सीमा को प्रति वर्ष 8 लाख रुपये करने को मंजूरी प्रदान कर दी. यह सीमा केंद्रीय सरकारी नौकरियों में वर्तमान में 6 लाख रुपये प्रति वर्ष है. दूसरी ओर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ओबीसी के उप वर्गीकरण के मुद्दे पर विचार के लिए एक आयोग गठित करने को मंजूरी दी है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक के बाद मंत्रिमंडल के फैसले के बारे में संवाददाताओं को बताया कि ओबीसी श्रेणी में 8 लाख रुपये तक प्रति वर्ष आमदनी वालों को आरक्षण का लाभ मिलेगा.

जेटली ने कहा, यह कदम सभी पिछड़ी जातियों तक लाभ पहुंचाया जाना सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है. एक सवाल के जवाब में जेटली ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को इस फैसले के दायरे में लाने के प्रस्ताव पर सरकार विचार कर रही है.

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अन्य पिछड़ा वर्गों के उप वर्गीकरण के मुद्दे पर विचार के लिए एक आयोग गठित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत अन्य पिछड़ा वर्गों के उप वर्गीकरण के मुद्दे पर विचार के लिए एक आयोग गठित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई.

यह आयोग अपने अध्यक्ष की नियुक्ति की तिथि से 12 सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश करेगा. इस आयोग को अन्य पिछड़ा वर्गों के उप वर्गीकरण पर विचार करने वाले आयोग के नाम से जाना जाएगा.

आयोग की सेवा शर्तों में कहा गया है कि यह ओबीसी की व्यापक श्रेणी समेत जातियों और समुदायों के बीच आरक्षण के लाभ के असमान वितरण के बिंदुओं पर विचार करता है जो ओबीसी को केंद्र सूची में शामिल करने के संदर्भ में होगा.

आयोग को ऐसे अन्य पिछड़ा वर्ग के उप वर्गीकरण के लिए वैज्ञानिक तरीके वाला तंत्र, प्रक्रिया, मानदंड और मानक का खाका तैयार करने के साथ केंद्र सूची में दर्ज ओबीसी के समतुल्य संबंधित जातियों, समुदायों, उप जातियों की पहचान करने की पहल करनी है एवं उन्हें संबंधित उप श्रेणियों में वर्गीकृत करना है.

उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने इंदिरा साहनी एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामले में 16 नवंबर 1992 को अपने आदेश में व्यवस्था दी थी कि पिछड़े वर्गों को पिछड़ा या अति पिछड़ा के रूप में श्रेणीबद्ध करने में कोई संवैधानिक या कानूनी रोक नहीं है, अगर कोई सरकार ऐसा करना चाहती है.

देश के नौ राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पुडुचेरी, कर्नाटक, हरियाणा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में पहले ही अन्य पिछड़ा वर्ग का उप वर्गीकरण किया जा चुका है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)