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जजों की नियुक्ति प्रक्रिया के लिए कोर्ट ने केंद्र को दी समयसीमा, कहा- अदालतों की स्थिति ख़राब

सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति प्रक्रिया को पूरा करने के लिए समयसीमा पर ज़ोर देते हुए ऐसे उच्च न्यायालयों को लेकर चिंता व्यक्त की, जहां न्यायाधीशों के 40-50 प्रतिशत पद रिक्त हैं. कोर्ट ने कहा कि अगर कॉलेजियम अपनी सिफ़ारिशों को सर्वसम्मति से दोहराता है तो केंद्र को तीन-चार सप्ताह के भीतर न्यायाधीशों की नियुक्ति कर देनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट. (फोटो: द वायर)

सुप्रीम कोर्ट. (फोटो: द वायर)

नई दिल्ली: सर्वोच्च अदालत ने ऐसे उच्च न्यायालयों में ‘संकटपूर्ण स्थिति’ को लेकर मंगलवार को चिंता व्यक्त की, जहां न्यायाधीशों के 40-50 प्रतिशत पद रिक्त हैं.

नियुक्ति प्रक्रिया को पूरा करने के लिए समयसीमा पर जोर देते हुए प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि केंद्र को उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम द्वारा नामों की सिफारिश किए जाने के तुरंत बाद नियुक्ति करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए.

पीठ में जस्टिस एसके कौल और जस्टिस सूर्यकांत भी शामिल हैं. पीठ ने कहा कि खुफिया ब्यूरो (आईबी) को उच्च न्यायालय कॉलेजियम की सिफारिश की तारीख से चार से छह सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को पेश कर देनी चाहिए.

पीठ ने कहा कि यह वांछनीय होगा कि केंद्र राज्य सरकार की राय और आईबी से रिपोर्ट मिलने की तारीख से आठ से 12 सप्ताह के भीतर सर्वोच्च अदालत को फाइलें व सिफारिशें भेज दे.

पीठ ने कहा कि यदि सरकार को उपयुक्तता या सार्वजनिक हित में कोई आपत्ति है, तो वह इसे आपत्ति के विशिष्ट कारणों के साथ वापस कॉलेजियम को भेज सकता है.

इसके साथ ही न्यायालय ने कहा कि अगर कॉलेजियम अपनी सिफारिशों को सर्वसम्मति से दोहराता है तो केंद्र को तीन-चार सप्ताह के भीतर न्यायाधीशों की नियुक्ति कर देनी चाहिए.

उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के संबंध में कहा था कि 1,080 न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों के बीच 664 न्यायाधीशों की नियुक्ति की गई है और 464 न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं. उन्होंने कहा था कि विभिन्न रिक्तियों के संबंध में सरकार को केवल 196 सिफारिशें मिली हैं.

पीठ ने कहा, ‘उच्च न्यायालय संकट की स्थिति में हैं. उच्च न्यायालयों में करीब 40 प्रतिशत पद रिक्त हैं और कई उच्च न्यायालय 50 प्रतिशत से भी कम क्षमता के साथ काम कर रहे हैं.’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायिक रिक्तियों का मुद्दा तब सामने आया जब अदालत ओडिशा उच्च न्यायालय से वकीलों की हड़ताल के कारण एक मामले को स्थानांतरित करने की याचिका पर सुनवाई कर रही थी.

चिंता जाहिर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘हम और कुछ नहीं लेकिन समय से सिफारिशें देने वाले उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के महत्व पर ध्यान दे सकते हैं. रिक्तियां ज्ञात हैं और मानदंड छह महीने पहले तक सिफारिशें करने की अनुमति देते हैं. हालांकि, 220 मौजूदा रिक्तियों के लिए भी सिफारिशें नहीं की गई हैं, वे रिक्तियों के लिए बहुत कम हैं जो अगले छह महीनों में होने वाली हैं.’

पीठ ने कहा, ‘हमने यह माना है कि पहले की सिफारिशों के परिणाम की प्रतीक्षा किए बिना एक नई प्रक्रिया शुरू करने के लिए ऐसी कोई बाधा नहीं है.’

उसने कहा, ‘दो चरण हैं जिन पर मामला सरकार के पास है. पहला जब मंत्रालय नामों को प्रक्रियागत करता है और दूसरा कॉलेजियम द्वारा अनुमोदित नामों में से ऐसे नामों की सिफारिश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम एक कहता है.’

पीठ ने कहा कि 10 मार्च, 2017 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए समझौता ज्ञापन (एमओपी) के अनुसार, राज्यों को अपने विचार भेजने में छह सप्ताह से अधिक समय नहीं लग सकता है और केंद्र सरकार राज्य सरकार की कोई आपत्ति नहीं मान सकती है, यदि उनके विचार छह सप्ताह के भीतर प्राप्त नहीं होते हैं.

इसने कहा कि सिफारिशों को अग्रेषित करने के लिए केंद्र सरकार के लिए कोई समय निर्धारित नहीं था.

एमओपी का उल्लेख करकते हुए पीठ ने कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश को चार सप्ताह के भीतर कानून मंत्री को सिफारिशें/सलाह भेजनी चाहिए और कानून मंत्री को राष्ट्रपति की सलाह के लिए तीन सप्ताह के भीतर प्रधानमंत्री के सामने प्रस्ताव रखना चाहिए.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)