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गोरखपुर: बच्चों की मौत पर आई रिपोर्ट में आॅक्सीजन संकट का ज़िक्र तक नहीं

जब मेडिकल कॉलेज में आॅक्सीजन की कमी की ख़बरें छप रही थीं, उसी दौरान मुख्यमंत्री, कमिश्नर, डीएम, चिकित्सा सचिव, स्वास्थ्य सचिव सबका दौरा हुआ. क्या बड़े लोगों को बचाया जा रहा है?

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बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में आॅक्सीजन संकट के कारण बच्चों की मौत पर हंगामा मचने पर 13 अगस्त को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरखपुर आए थे. यहां आकर उन्होंने कहा था कि मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित समिति की रिपोर्ट आने दीजिए, दोषियों के खिलाफ ऐसी कठोर कार्रवाई होगी जो पूरे प्रदेश में मिसाल बनेगा. उन्होंने यह भी कहा था कि समिति इस घटना के कारणों और आॅक्सीजन की सप्लाई के सभी बिंदुओं पर जांच करेगी और इसके लिए जिम्मेदार लोगों का पता लगाएगी.

इसके ठीक दस दिन बाद 23 अगस्त को मुख्य सचिव की जांच रिपोर्ट आई और इस पर जिस कार्रवाई की संस्तुति की गई है वह भविष्य में बेहतरीन मिसाल साबित नहीं होने जा रही, क्योंकि इस रिपोर्ट में आॅक्सीजन संकट, इसके कारणों और जिम्मेदार लोगों को पूरी तरह से छुपा दिया गया है.

रिपोर्ट में आॅक्सीजन संकट पर एक शब्द नहीं है और इसके ज्यादातर पन्ने भविष्य की योजनाओं और नवजात शिशुओं की मौत, इंसेफलाइटिस कम करने के उपायों के बारे में है, जिसमें कुछ भी नया नहीं है. एक तरफ से ‘सारे फसाने में जिसका जिक्र (आॅक्सीजन) था, उसको भुला दिया गया, क्योंकि वही बात सरकार को बहुत नागवार गुजरी है.

मुख्य सचिव की रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री ने कार्रवाई की संस्तुति भी कर दी है. कार्रवाई की जद में बीआरडी मेडिकल कॉलेज के निलम्बित प्राचार्य व उनकी पत्नी, दो चिकित्सक, एक चीफ फार्मासिस्ट और प्राचार्य कार्यालय के तीन बाबू और लिक्विड आॅक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी पुष्पा सेल्स प्राइवेट लिमिटेड आए हैं.

इनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के साथ-साथ भ्रष्टाचार उन्मूलन अधिनियम, कर्मचारी आचारण नियमावली के खिलाफ कार्य करने के आरोप में कार्रवाई होगी. एफआईआर दर्ज करा दी गई है. जिन पर कार्रवाई होगी, उन लोगों में घटना के दौरान काफी चर्चा में आए बाल रोग विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. कफील खान भी हैं जिन पर आपराधिक कार्रवाई की संस्तुति के साथ-साथ तथ्यों को छिपाकार शपथ पत्र दाखिल करने और मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया के नियमों के खिलाफ कार्य करने का आरोपी बताया गया है.

रिपोर्ट में बीआरडी मेडिकल कॉलेज में तीन वर्षों में दवाइयों और रसायनों की आपूर्ति की सीएजी से स्पेशल आॅडिट कराने की संस्तुति की गई थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया है.

मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली इस समिति में सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य आलोक कुमार, सचिव वित्त विभाग मुकेश मित्तल और एसजीपीजीआई के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. हेमचंद्र शामिल थे.

समिति की रिपोर्ट में आॅक्सीजन संकट क्यों हुआ, आॅक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी को भुगतान में देरी क्यों हुई और इसके लिए जिम्मेदार कौन है, इसका जिक्र सिरे से गायब है.

हालांकि समिति कहती है कि उसे पांच बिंदुओं-बच्चों की मौत का घटनाक्रम एवं पृष्ठिभूमि, घटना के कारण एवं कारक, जिम्मेदार अधिकारियों व्यक्तियों के नाम, दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध प्रस्तावित कार्रवाई, ऐसी घटनाएं न हों इसके लिए दीर्घकालीन व तत्कालीन व्यवहारिक सुझाव, पर रिपोर्ट देने को कहा गया था.

हो सकता है कि समिति ने घटना के कारणों और जिम्मेदारों के बारे में रिपोर्ट दी हो, लेकिन सरकार द्वारा मीडिया को जो रिपोर्ट दी गई है, उसमें आॅक्सीजन संकट के कारणों का उल्लेख नहीं है.

इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के पहले अपर मुख्य सचिव चिकित्सा शिक्षा अनीता भटनागर जैन को उनके पद से हटा दिया गया था, लेकिन उनके बारे में रिपोर्ट में कोई जिक्र नहीं है. इससे लगता है कि इस घटना में बड़े अफसरों को बचाने का काम हुआ है.

यह अब ढंकी-छुपी बात नहीं रह गई है कि बीआरडी मेडिकल कॉलेज को दवाइयों, चिकित्सा कर्मियों की सेलरी, लिक्विड आॅक्सीजन का बकाया का धन, जरूरी उपकरणों व दवाइयों का बजट बीआरडी मेडिकल कॉलेज को बहुत देर से यानि अगस्त माह में मिला.

नेशनल हेल्थ मिशन के जीएम और मिशन निदेशक को इस संबंध में मेडिकल कॉलेज की ओर से प्रस्ताव और कई रिमाइंडर दिए गए लेकिन उनकी ओर से कोई प्रस्ताव नहीं मिलने की बात कही गई.

इसी तरह पुष्पा सेल्स प्राइवेट लिमिटेड ने बकाया भुगतान के लिए प्राचार्य को लिखे पत्रों की काॅपी प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा, महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा, डीएम गोरखपुर को भी भेजे. मेडिकल कॉलेज के निलम्बित प्राचार्य ने भी बयान दिया है कि भुगतान के संबंध में उन्होंने तीन रिमाइंडर भेजे थे.

सवाल यह उठता है कि पुष्पा सेल्स के बकाया भुगतान के संबंध में प्राचार्य ने शिथिलता दिखाई तो लखनऊ में बैठे मंत्री, स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा विभाग, एनएचएम के अफसरों ने इस संबंध में क्या किया?

मेडिकल कॉलेज में लगातार मीटिंग करने वाले कमिश्नर और डीएम ने इस संबंध में क्या किया जबकि स्थानीय अखबारों में पेमेंट का भुगतान न होने व आॅक्सीजन संकट की आशंका के बारे में खबरें प्रकाशित हो रही थीं?

आॅक्सीजन संकट के डेढ़ महीने के अंदर दो बार मुख्यमंत्री, दो बार अपर मुख्य चिकित्सा सचिव, एक बार स्वास्थ्य सचिव भी मेडिकल कॉलेज आए लेकिन इनकी नजरों में चिकित्सा कर्मियों की सेलरी, आॅक्सीजन बकाये का भुगतान, उपकरणों की कमी की बात कैसे नहीं आई?

यहां यह भी जानने की बात है कि इस घटना के बाद पुराने प्रस्तावों को तुरंत मंजूरी और बजट रिलीज करने का भी काम किया जा रहा है ताकि गलतियों पर पर्दा डाला जा सके.

कई वर्ष से प्रस्तावित एनआईसीयू को अपग्रेड करने के लिए 7.28 करोड़ का बजट दे दिया गया है जबकि पूर्व में केंद्र व प्रदेश सरकार से कई बार मांग के बावजूद इसकी अनदेखी की जा रही थी.

पांच वर्ष पहले गोरखपुर के लिए सैद्धांतिक रूप से स्वीकृत रीजनल वायरोलाॅजी रिसर्च सेंटर को बीआरडी मेडिकल कॉलेज में स्थापित करने के लिए 85 करोड़ देने की घोषणा 13 अगस्त को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्ढा ने उस समय की जब वह आॅक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत के मामले के बाद गोरखपुर आए थे.

जाहिर है कि बीआरडी मेडिकल कॉलेज को उसकी जरूरत का बजट काफी मुश्किलों के बाद रुक-रुक कर किश्तों में दिया जा रहा था. इस कारण चिकित्सा कर्मियों की सेलरी, उपकरणों व दवाइयों की कमी का सामना मेडिकल कॉलेज को करना पड़ रहा था.

ये संकट आखिरकार 10 अगस्त को एक बड़े संकट में बदल गया. पहले से ही जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे बच्चे और वयस्क मरीज आॅक्सीजन की कमी के भी शिकार हुए और उन्हें जान गंवानी पड़ी.

इस बड़ी त्रासदी के लिए अपनी गलती को स्वीकार करने के बजाय सरकार पूरा ठीकरा मेडिकल कॉलेज के निलम्बित प्राचार्य, दो चिकित्सकों, कुछ बाबुओं पर थोप कर फिलहाल भले बच जाए लेकिन सरकारों के यही तरीके आने वाली त्रासदियों की भूमिका तैयार करते रहे हैं.

रिपोर्ट के आखिरी पेज में आंकड़ों के हवाले से जेई और एईएस के केस व मृत्यु दर कम होने के दावे किए गए हैं और कहा गया है कि अब पीएचसी व सीएचसी पर भी मरीज जा रहे हैं और बीआरडी मेडिकल कॉलेज पर मरीजों का भार कम हुआ है. ये आंकड़े नेशनल वेक्टर वार्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम की वेबसाइट से लिए गए हैं.

सभी जानते हैं कि इंसेफलाइटिस के सर्वाधिक कहर वाला माह अगस्त, सितंबर और अक्टूबर का होता है और इन महीनों में मौतें अधिक होती हैं. इसलिए अभी तक के आंकड़ों के आधार पर मृत्यु दर कम होने का दावा करना सच से मुंह छुपाना है.

इंसेफलाइटिस की सच्ची तस्वीर बीआरडी मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पतालों और सीएचसी-पीएचसी के आंकड़ों को अलग-अलग कर विश्लेषित करने से सामने आती है न कि सभी जगह के आंकड़ों को मिलाकर बताने से.

मुख्य सचिव की रिपोर्ट से अलग 22 अगस्त तक के बीआरडी मेडिकल कॉलेज के आंकड़े बताते हैं कि अब तक इंसेफलाइटिस के 598 केस रिपोर्ट हुए जिसमें 157 की मौत हो गई.

यहां मृत्यु दर 26 फीसदी से अधिक है. एक तरफ मेडिकल कॉलेज में इतनी बड़ी संख्या में इंसेफलाइटिस के मरीज भर्ती हुए जबकि गोरखपुर मंडल के चार जिलों-गोरखपुर, कुशीनगर, महराजगंज और देवरिया के सीएचसी-पीएचसी पर भर्ती मरीजों का आंकड़ा 100 तक भी नहीं पहुंच पाया है और यहां जो मरीज आए वह तुरंत मेडिकल कॉलेज रेफर हो गए.

यही हाल जिला अस्पतालों का है. वहां जो मरीज पहुंचे उनमें से अधिकतर बीआरडी मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिए गए. इसलिए सच्चाई का पैमाना मेडिकल कॉलेज का ही आंकड़ा है.