कोविड-19

उत्तर प्रदेश: कोविड की दूसरी लहर और स्वास्थ्य सुविधाओं से जूझते पूर्वांचल के अस्पताल

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह ज़िले गोरखपुर और आस-पास के तीन ज़िलों- देवरिया, महराजगंज और कुशीनगर में कोरोना की दूसरी तीव्र लहर के बीच स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के बुरे हाल हैं. प्रदेश सरकार स्थिति नियंत्रण में होने की बात कह रही है, लेकिन ख़ुद सरकारी आंकड़े इसके उलट इशारा कर रहे हैं.

गोरखपुर के कोविड कंट्रोल रूम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ. (फोटो साभार: जिला सूचना कार्यालय गोरखपुर)

गोरखपुर के कोविड कंट्रोल रूम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ. (फोटो साभार: जिला सूचना कार्यालय गोरखपुर)

गोरखपुर: कोरोना की दूसरी तीव्र लहर के 40 दिन बाद भी गोरखपुर जिले का स्वास्थ्य ढांचा अस्पताल बेड, वेंटिलेटर, चिकित्सकों- पैरामेडिकल स्टाफ और ऑक्सीजन की कमी से हांफ रहा है.

सरकार के दावों के विपरीत मई महीने में कोरोना की पॉजिटिविटी रेट बढ़ रही है लेकिन इसको देखते हुए जरूरी इंतजाम अभी भी घोषणाओं तक सीमित हैं. चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी के कारण अस्पताल बेड बढ़ाने में दिक्कतें आ रही हैं.

ऑक्सीजन की आपूर्ति भले बढ़ी हो, लेकिन अभी भी यह जरूरत से काफी कम है. जांच और टीकाकारण की धीमी रफ्तार, कामचलाऊ कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग कोरोना के तेजी से पसरते पांव को रोक नहीं पा रहे हैं.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जिले गोरखपुर और आस-पास के तीन जिलों- देवरिया, महराजगंज और कुशीनगर में यही जमीनी हकीकत है.

मार्च 2020 में कोरोना की पहली लहर अगस्त में चरम पर पहुंची थी. इसके बाद कोरोना के केस मे क्रमशः कमी आती गई और यह सिलसिला मार्च 2021 तक जारी रहा, लेकिन अप्रैल महीने में कोरोना की दूसरी लहर ऐसे उठी कि अभी तक वह बेकाबू ही है.

प्रदेश सरकार कहना है कि थ्री टी (three T) ट्रेस, टेस्ट और ट्रीटमेंट की रणनीति से कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर में भी अब एक्टिव केस घटने लगे हैं लेकिन जमीनी सच्चाई और खुद सरकारी आंकड़े इसके उलट गंभीर हालात की तरफ इशारा कर रहे हैं.

मई में और तेजी से उठ रही है कोविड की दूसरी लहर

गोरखपुर में मार्च 2020 के आखिर में कोविड-19 का पहला केस आया था. इसके बाद के दो महीनों में कोरोना धीमी रफ्तार से आगे बढ़ा लेकिन जुलाई से उसने तेजी पकड़ ली.

अगस्त महीने में गोरखपुर जिले में 2,124 पॉजिटिव केस रिपोर्ट हुए. अगले महीने सितंबर में 1,794 मामले आए. मार्च से लेकर दिसंबर महीने तक गोरखपुर जिले में कुल 20,971 केस रिपोर्ट हुए.

इस वर्ष के जनवरी, फरवरी और मार्च में 811 पॉजिटिव केस आए लेकिन अकेले अप्रैल महीने में 20,348 मामले आ गए. मई महीने के दस दिन में 79,946 के केस आ चुके है. यानी कोरोना की दूसरी लहर अभी और उठती ही जा रही है.

यही हाल देवरिया, महराजगंज और कुशीनगर जिले का है. देवरिया जिले में पिछले वर्ष 6,636, महराजगंज में 5,762 और कुशीनगर में 5,645 पॉजिटिव केस आए थे.

इस वर्ष के शुरू के तीने महीनों में यह संख्या क्रमशः 100, 117 और 101 रही लेकिन अप्रैल महीने में महराजगंज में 2,421, देवरिया में 4,834 और कुशीनगर में 2,811 पॉजिटिव केस रिपोर्ट हुए हैं.

इन तीन जिलों में जिलों में पिछले वर्ष के नौ महीने से आधे से अधिक पॉजिटिव केस सिर्फ अप्रैल महीने में रिपोर्ट हुए हैं. मई महीने के दस दिन में महराजगंज में संक्रमण के 1,254, देवरिया में 4,202 और कुशीनगर में 3,394 मामले सामने आए हैं.

यह स्थिति दिखाती है कि मई महीने में ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना बहुत अधिक लोगों को अपने शिकंजे में ले रहा है.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

पॉजिटिविटी दर में तेजी

इन चारों जिलों में पॉजिटिव रेट में मई महीने में जबर्दस्त उछाल आया है. गोरखपुर में अप्रैल महीने में पॉजिटिविटी दर  8.4 थी, जो मई के दस दिनों में बढ़कर 12.7 तक जा पहुंची है.

देवरिया में अप्रैल महीने में पॉजिटिविटी रेट चार था, जो मई के दस दिन में 16.9 तक जा पहुंचा है. कुशीनगर में यह दर 3.2 से बढ़कर 14.5 और महराजगंज में 3.4 से बढ़कर 8.8 हो गई है.

पॉजिटिव केस और पॉजिटिविटी रेट का बढ़ना बताता है कि मई महीना और बड़ी तबाही ला सकता है लेकिन इस तबाही का सामना करने के लिए तैयारी अभी भी सुस्त रफ्तार से ही हो रही है.

गोरखपुर मंडल के चार जिलों की 1.37 करोड़ आबादी के लिए सिर्फ 2,823 कोविड बेड

गोरखपुर मंडल के चार जिलों में लेवल टू और थ्री के अभी भी सिर्फ 2,823 अस्पताल बेड हैं. गोरखपुर में 2,077 अस्पताल बेड हैं जिसमें जिसमें 765 सरकारी अस्पताल में है, बाकी 1,312 निजी अस्पताल के बेड हैं.

गोरखपुर में जिला प्रशासन ने करीब चार दर्जन अस्पतालों को कोविड के इलाज की अनुमति दी हुई है. इन अस्पतालों के पास वेंटिलेटर और बाईपैप वाले 307 बेड, एचएफएनसी के 125 बेड के अलावा 880 ऑक्सीजन सपोर्ट बेड हैं.

देवरिया में कोविड-19 मरीजों के इलाज के लिए 346 बेड, कुशीनगर में 100 और महराजगंज में 300 अस्पताल बेड का इंतजाम है. कुशीनगर में कोई भी प्राइवेट अस्पताल कोविड इलाज के लिए स्वीकृत नहीं है.

इन चार जिलों में लेवल थ्री का सरकारी अस्पताल सिर्फ गोरखपुर का बीआरडी मेडिकल कॉलेज हैं, जहां 500 बेड का इंतजाम है. इसमें 130 बेड वेंटिलेटर और बाईपैप वाले हैं.

उल्लेखनीय है कि बीआरडी मेडिकल कॉलेज अनुमान भी मरीजों से हमेशा भरा रहता है. इस कारण देवरिया के मरीज बस्ती मेडिकल कॉलेज रेफर किए जा रहे हैं.

बीआरडी के कोविड अस्पताल में जगह न मिलने के कारण कई मरीजों की मौत अस्पताल के गेट के बाहर ही हो गई. अब जाकर यहां बेड बढ़ाने की कवायद शुरू हुई है और 50 वेंटिलेटर बेड जोड़े जा रहे हैं.

जाहिर है कि कोरोना के बढ़ते मरीजों के लिए अस्पताल बेड पर्याप्त नहीं है. गोरखपुर मंडल के चार जिलों में पिछले 40 दिन में 47,898 पॉजिटिव केस आए हैं, वहां कोविड मरीजों के लिए सरकारी और निजी सेक्टर में सिर्फ 2,823 बेड का इंतजाम निश्चित रूप से लोगों को मरने के लिए छोड़ देने जैसा है.

(फोटोः पीटीआई)

(फोटोः पीटीआई)

40 दिन बाद 500 बेड बढ़ाने की तैयारी

अब जाकर गोरखपुर के एम्स, बड़हलगंज स्थित राजकीय होमियोपैथिक कॉलेज, स्पोर्टस कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल में कोविड अस्पताल बनाने की कवायद शुरू हुई है. ये अस्पताल भी निजी क्षेत्र के सहयोग से शुरू किए जा रहे है.

स्पोर्टस कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल में 100 बेड का एल-टू अस्पताल बिल एवं मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से शुरू करने की तैयारी है, तो एम्स में 200 बेड का अस्पताल विमानन कंपनी बोइंग के सहयोग से बनाने की घोषणा की गई है.

राजकीय होमियोपैथिक कॉलेज में 100 बेड का अस्पताल बनाने की घोषणा की गई है. ये सभी घोषणाएं अमल में आ जाएं, तो क्षेत्र में कोविड-19 मरीजों के लिए 450 और बेड उपलब्ध हो जाएंगे और कुल बेड की संख्या 3,273 हो जाएगी.

फिर भी बढ़ते कोरोना मरीजों के लिए ये नाकाफी ही हैं. सोचने वाली बात है कि 1.37 करोड़ की आबादी वाले इन चार जिलों में कोविड मरीजों के लिए इलाज में सिर्फ 3,500 बेड कितनी सहायता कर पाएंगे.

ये नए अस्पताल बेड भी तैयार होने में कम से कम दस दिन और लग जाएंगे. स्पोर्ट्स कॉलेज के कोविड अस्पताल के लिए अभी पाइप लगाने का काम हो रहा है. होमियोपैथिक कॉलेज और बीआरडी मेडिकल कॉलेज में तैयार होने वाले नए कोविड वॉर्ड के लिए वेंटिलेटर आ गए हैं. इनको इंस्टाल करने का काम अभी शुरू नहीं हुआ है.

सबसे बड़ी बात यह है कि 500 नए बेड के लिए जरूरी मानव संसाधन कहां से लाएंगें ? वह भी उस हालात में जहां पहले से डॉक्टर और स्टाफ कम हैं.

डॉक्टर और नर्स के 474 पद हैं खाली

मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक में रखी गई रिपोर्ट के अनुसार, गोरखपुर मंडल के चार जिलों में मेडिकल अफसरों के स्वीकृत 1,064 पदों के सापेक्ष 724 ही तैनात है और 340 पद खाली हैं.

स्वीकृत पद के मुकाबले गोरखपुर में 122, देवरिया में 76, कुशीनगर में 61 और महराजगंज में 81 मेडिकल अफसर कम हैं. इसी तरह इन चारों जिलों में स्टाफ नर्स के 424 पद स्वीकृत हैं लेकिन तैनाती सिर्फ 290 की है यानी 134 स्टाफ नर्स की कमी है.

हाल में चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा मेडिकल कॉलेजों में संचालित कोविड अस्पतालों के लिए चिकित्सकों, नर्स, वॉर्ड बॉय आदि के पद विज्ञापित किए गए है.

इन कोविड अस्पतालों में चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ की कमी को पूरा करना कोरोना की दूसरी लहर में एक बड़ी चुनौती इसलिए भी है क्योंकि पिछले 40 दिन में कोविड मरीजों के इलाज के दौरान बड़ी संख्या में चिकित्सक संक्रमित हुए हैं. भले ही सरकारी अस्पतालों में ओपीडी सेवाएं बंद हैं लेकिन इमरजेंसी सेवाओं के जारी रहने से बड़ी संख्या में चिकित्सक संक्रमित हुए हैं.

प्रांतीय चिकित्सा सेवा संघ ने महानिदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं को पत्र लिखकर इमरजेंसी ड्यूटी कर रहे चिकित्सकों व चिकित्सा कर्मियों के बड़ी संख्या में संक्रमित होने पर चिंता जताई है.

इस पत्र में कहा गया है कि जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर रेस्पिरेटिव डिस्ट्रेस सिंड्रोम वाले मरीज बड़ी संख्या में आ रहे हैं, जिनका इलाज करते समय चिकित्सक व स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित हो रहे हैं.

ऑक्सीजन की ज़रूरत

प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री लगातार यह दावे कर रहे हैं कि गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी नहीं है जबकि सरकारी आंकड़े ही इस सच्चाई को बयान कर रहे हैं.

ऑक्सीजन की कमी की शिकायत करने पर एक अस्पताल के खिलाफ जांच के भी आदेश दे दिए गए थे. अस्पतालों के मुंह जरूर बंद करा दिए गए लेकिन गीडा स्थित ऑक्सीजन प्लांट में ऑक्सीजन सिलेंडर भराने वालों की लग रही भीड़ बता रही है कि स्थिति अब भी गंभीर है.

यदि ऑक्सीजन की कमी नहीं है तो आखिर क्या कारण है कि निजी अस्पताल 90 से कम एसपीओ 2 रहने पर मरीजों को भर्ती करने में आनाकानी करने लगे हैं. कई अस्पतालों से शिकायत आई है कि मरीजों को जरूरत के अनुसार ऑक्सीजन नहीं दी जा रही है.

आंकड़ों के अनुसार, गोरखपुर, देवरिया, महराजगंज और कुशीनगर में बी टाइप के 1,048 और डी टाइप के 1,798 यानी कुल 2,844 सिलेंडर की उपलब्धता है जबकि जरूरत डी टाइप (जंबो) 3,747 सिलेंडर की है. यानी जरूरत और उपलब्ध्ता में अभी भी 903 सिलेंडर का अंतर है.

गोरखपुर जिले में ऑक्सीजन के तीन प्लांट हैं. एक प्लांट हाल ही में शुरू हुआ है. पांच वर्ष से बंद एक प्लांट को कोविड की पहली लहर से शुरू करने की कोशिश हो रही है, जिसके अब शुरू होने की संभावना है.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

मोदी केमिकल के दो प्लांट पहले से कार्यशील है. दोनों प्लांट की उत्पादन क्षमता 1.600 से 2.000 सिलेंडर की है. तीसरे ऑक्सीजन प्लांट आरके ऑक्सीजन की क्षमता एक हजार सिलेंडर रोज की है.

मोदी केमिकल्स ने अभी फैजाबाद में बंद पड़े प्लांट की मशीनरी को गोरखपुर के गीडा स्थित प्लांट में स्थापित कर ऑक्सीजन उत्पादन शुरू किया है. इसकी क्षमता भी एक हजार सिलेंडर की है.

यदि चौथा प्लांट अन्नपूर्णा शुरू हो जाता है तो वह भी 1500 सिलेंडर ऑक्सीजन दे सकेगा. इस तरह कुछ दिन पहले तक तीन प्लांट से कुल 2,600 से 3,000 सिलेंडर ऑक्सीजन का उत्पादन हो रहा था जबकि जरूरत डी-टाइप के 3,747 सिलेंडर की थी.

जाहिर है कि गोरखपुर मंडल के सभी जिले ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे थे.

तीसरे प्लांट के शुरू होने से स्थिति सुधरी जरूर है लेकिन संकट बरकरार है क्योंकि देवरिया और कुशीनगर जिले में ऑक्सीजन का कोई प्लांट नहीं है.

महराजगंज में अभी एक प्लांट शुरू हुआ है. गोरखपुर के पड़ोसी जिले बस्ती और सिद्धार्थनगर में भी कोई ऑक्सीजन प्लांट नहीं है. संतकबीर नगर जिले में जरूर एक प्लांट है लेकिन उसकी उत्पादन क्षमता सिर्फ 400 सिलेंडर रोज की है.

इस तरह पड़ोसी जिले ऑक्सीजन के लिए गोरखपुर पर ही निर्भर है. बड़ी संख्या में होम आइसोलेशन वाले मरीज भी ऑक्सीजन सिलेंडर की जरूरत महसूस कर रहे हैं. आगे के दिनों में यदि 450 अस्पताल बेड बढ़ते हैं तो ऑक्सीजन की जरूरत और बढ़ेगी.

इस स्थिति में गोरखपुर के चार प्लांटों से मिलने वाले करीब पांच हजार ऑक्सीजन सिलेंडर भी पर्याप्त साबित नहीं होंगे.

टीकाकारण और जांच की धीमी रफ़्तार और कामचलाऊ कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग

गोरखपुर मंडल के चार जिलों में अब तक 7,19,118 व्यक्तियों ने कोविड टीके की पहली डोज ली है. टीके की दूसरी डोज लेने वालों की संख्या 1,75,442 है.

इनमें से भी टीका लेने वाले 1,14,075 हेल्थ केयर वर्कर और फ्रंटलाइन वर्कर हैं. यानी पूरी आबादी का करीब छह फीसदी से भी काम लोगों को टीके का पहला डोज लग पाया है.

यह टीकाकरण शहरी आबादी में ज्यादा हुआ हे. ग्रामीण आबादी का बड़ा भाग टीकाकारण से बचा हुआ है.

यही हाल कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग का है. गोरखपुर में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की दर 9.3 है तो कुशीनगर में 14, देवरिया में 10.7 और महराजगंज में 6.6 है.

चारों जिलों में एक अप्रैल से नौ मई तक पॉजिटिव पाए गए 47,898 के सापेक्ष 4.80,015 लोगों की कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की गई है.

मुख्यमंत्री शत प्रतिशत कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की बात कह रहे हैं जबकि सरकारी दावे का ही सच मान लिया जाय तो यह अभी दस फीसदी तक ही पहुंचा है.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

नेशनल सेंटर आफ डिजीज कंट्रोल ने कांटैक्ट ट्रेसिंग की एसओपी बनाई है. इसमें कहा गया है कि कोरोना संक्रमित के घर के सभी सदस्यों, घर आने वाले रिश्तेदारों-दोस्तों, घर मे काम करने वाले कामगारों, देखभाल करने वाले लोगों, काम करने वाले जगह के साथ-साथ सामुदायिक गतिविधि और यात्रा के दौरान संपर्क में आने वालें लोगों की जांच करनी चाहिए.

गोरखपुर में कोविड-19 नियंत्रण से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि एक पॉजिटिव के संपर्क में आने वाले कम से कम 15 लोग हो सकते हैं. शत-प्रतिशत कांटैक्ट ट्रेसिंग के लिए कम से कम 15 व्यक्तियों तक पहुंचना जरूरी है जबकि अभी गोरखपुर मंडल के इन चार जिलों में कुशीनगर छोड़कर अन्य जिलों में काफी कम है.

कोरोना का नया वैरियंट चूंकि एक परिवार के कई लोगों को संक्रमित कर रहा है, ऐसे में कांटैक्ट ट्रेसिंग का दायरा और व्यापक होना चाहिए.

लेकिन हालात यह है कि जिन गांवों में एक सप्ताह या एक पखवाड़े में 10 से 20 लोगों की मौत हो रही है वहां भी स्वास्थ्य विभाग की टीम मीडिया में खबर छपने के बाद जा रही है. इससे कांटैक्ट ट्रेसिंग के आंकड़ों की सच्चाई बेहतर तरीके से समझी जा सकती है.

कोविड जांच की रफ्तार में तेजी नहीं

गोरखपुर मंडल के चार जिलों में कोविड नमूनों के आरटी-पीसीआर जांच की दो व्यवस्था बनाई गई है.

बीआरडी मेडिकल कॉलेज का माइक्रोबायोलॉजी विभाग गोरखपुर और देवरिया के नमूनों की आरटी-पीसीआर जांच करता है जबकि आईसीएमआर का रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर (आरएमआरसी) महराजगंज और कुशीनगर के नमूनों की जांच करता है. दोनों जांच केंद्रोंं की क्षमता रोज 5-5 हजार नमूनों की है.

बीआरडी मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. अमरेन्द्र सिंह ने बताया, ‘हमारे यहां 70 फीसदी कर्मचारी संक्रमित हो गए थे जिससे जांच क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई थी. जांच केंद्र में कर्मचारी तीन शिफ्टों में काम कर रहे हैं. देवरिया और गोरखपुर के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले नमूने देर से पहुंचते हैं जिससे कई बार नमूने खराब हो जाते हैं.’

उन्होंने आगे बताया, ‘नमूने लिए जाने के बाद जिला मुख्यालय आते हैं और फिर उसकी पोर्टल पर दर्ज किया जाता है. इसके बाद संबंधित कर्मचारी लेकर गोरखपुर आते हैं. नमूने मिलने के 24 घंटे में हम परिणाम दे देते हैं लेकिन नमूने लेने से लेकर जांच और परिणाम को पोर्टल पर अपडेट करने की प्रक्रिया में अमूमन तीन दिन तक लग ही जाता है.’

गोरखपुर मंडल के चार जिलों में एक से नौ मई के बीच कुल 1,22,476 नमूने लिए गए. इसमें 63,042 नमूने एंटीजन और 54,633 आरटी-पीसीआर जांच के लिए नमूने थे. यानी चार जिलों में एक दिन में औसतन 13,608 नमूने लिए गए.

इन नौ दिनों में गोरखपुर में 58,957, देवरिया में 25,604, कुशीनगर में 23,961 और महराजगंज में 13,954 नमूनों की जांच हुई है. यदि औसत निकालें, तो गोरखपुर में 6,550, देवरिया में 2,844, कुशीनगर में 2,662 और महराजगंज में 1,550 नमूने लिए गए.

कोरोना की दूसरी लहर का मुकाबला करने के लिए यह जांच संख्या बिल्कुल भी पर्याप्त नहीं है. कम जांच होने से लोगों में कोरोना संक्रमण की सही स्थिति का पता नहीं चल पाता है और उनके इलाज में देरी होती है जिससे मृत्यु दर बढ़ती है.

गांवों में बड़ी संख्या में मौत की खबरें आने के बाद भी देवरिया, महराजगंज और कुशीनगर में सैंपलिंग 1,00 से 3,000 हजार के बीच रहना आखिर क्या दर्शाता है?

पिछले वर्ष अगस्त महीने में प्रदेश सरकार ने गोरखपुर में रोज दो हजार और महराजगंज, कुशीनगर, देवरिया में 1,000-1,500 एंटीजन जांच करने का निर्देश दिया था. कोरोना की दूसरी घातक लहर में भी एंटीजन जांच में मामूली वृद्धि ही हुई है.

यह स्थितियां बताती हैं कि गोरखपुर मंडल के चार जिलों में कोविड-19 मरीजों के इलाज के लिए अस्पताल बेड, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन, चिकित्सक और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी कोरोना की दूसरी लहर के 40 दिन बाद भी बनी हुई है.

कोरोना से बचाव के लिए जांच, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, टीकाकरण की रफ्तार बहुत धीमी है लेकिन सरकार यह मानने को तैयार नहीं है. वह अस्वीकारवादी मुद्रा में है. वह लगातार दावे कर रही है कि कोरोना संक्रमण कम हो रहा है, किसी चीज की कमी नहीं है और सब ठीक है. जाहिर है कि सरकार में धरातल की सच्चाई को स्वीकारने के साहस में भी कमी बनी हुई है.

(लेखक गोरखपुर न्यूज़लाइन वेबसाइट के संपादक हैं.)