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केपी शर्मा ओली ने फ़िर बने नेपाल के प्रधानमंत्री, पुराने मंत्रिमंडल को बरक़रार रखा

नेपाली सदन में बीते 10 मई को केपी शर्मा ओली के विश्वास मत हार जाने के बाद राष्ट्रपति ने विपक्षी पार्टियों को नई सरकार बनाने के लिए दावा पेश करने को कहा था. हालांकि नेपाली कांग्रेस तथा नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएन-मॉएस्ट सेंटर) का विपक्षी गठबंधन बहुमत हासिल करने में नाकाम रहा, जिसके बाद ओली के एक बार फिर नेपाल का प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया था.

केपी शर्मा ओली. (फोटो साभार: फेसबुक)

केपी शर्मा ओली. (फोटो साभार: फेसबुक)

काठमांडू: संसद में विश्वास मत गंवाने के चार दिन बाद केपी शर्मा ओली ने शुक्रवार को तीसरी बार नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली. वह अल्पमत सरकार का नेतृत्व करेंगे.

राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने 69 वर्षीय ओली को काठमांडू स्थित शीतल निवास में एक समारोह में नेपाल के प्रधानमंत्री के तौर पर पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई.

राष्ट्रपति ने नेपाल की प्रतिनिधि सभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता के तौर पर ओली को प्रधानमंत्री नियुक्त किया.

ओली अल्पमत सरकार का प्रतिनिधित्व करेंगे, क्योंकि 10 मई को संसद में विश्वास मत हारने के बाद उनके पास बहुमत नहीं है.

सीपीएन-यूएमएल के अध्यक्ष ओली को 13 मई को इस पद पर फिर से नियुक्त किया गया, जब विपक्षी पार्टियां नई सरकार बनाने के लिए संसद में बहुमत हासिल करने में विफल रहीं.

ओली को अब 30 दिन के भीतर सदन में विश्वास मत हासिल करना होगा, जिसमें विफल रहने पर संविधान के अनुच्छेद 76 (5) के तहत सरकार बनाने का प्रयास शुरू किया जाएगा.

समारोह के दौरान ओली के मंत्रिमंडल के मंत्रियों ने भी शपथ ली. शपथ ग्रहण समारोह के दौरान प्रधानमंत्री ओली और उप प्रधान मंत्री ईश्वर पोखरेल ने ईश्वर शब्द का जिक्र नहीं किया, जबकि राष्ट्रपति भंडारी ने इसका उल्लेख किया.

ओली ने कहा, ‘मैं देश और लोगों के नाम पर शपथ लूंगा.’ जबकि राष्ट्रपति ने ‘ईश्वर, देश और लोगों’ का उल्लेख किया.

पुराने मंत्रिमंडल के सभी मंत्रियों और राज्य मंत्रियों को नए मंत्रिमंडल में जगह दी गई है. प्रदीप ज्ञवाली विदेश मंत्री, जबकि राम बहादुर थापा और बिष्णु पौडयाल क्रमश: गृह और वित्त मंत्री बनाए गए हैं. देश में कोविड-19 संक्रमण के मद्देनजर समारोह में सीमित लोगों की मौजूदगी थी.

समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति नंद बहादुर पुन और उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश सीएस राणा भी उपस्थित थे.

नए मंत्रिमंडल में 22 मंत्री और तीन राज्य मंत्री हैं.

इससे पहले ओली 11 अक्टूबर, 2015 से तीन अगस्त, 2016 तक और फिर 15 फरवरी, 2018 से 13 मई, 2021 तक प्रधानमंत्री रह चुके हैं.

सदन में 10 मई को ओली के विश्वास मत हार जाने के बाद राष्ट्रपति ने विपक्षी पार्टियों को बहुमत के साथ नई सरकार बनाने के लिए दावा पेश करने के लिहाज से 13 मई की रात नौ बजे तक का समय दिया था.

गौरतलब है कि हालांकि नेपाली कांग्रेस तथा नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएन-मॉएस्ट सेंटर) का विपक्षी गठबंधन अगली सरकार बनाने के लिए बहुमत हासिल करने में नाकाम रहा, जिसके बाद ओली के एक बार फिर देश का प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया था.

13 मई तक नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी दावेदारी रखने के लिए सदन में पर्याप्त मत मिलने की उम्मीद थी. उन्हें सीपीएन- मॉएस्ट सेंटर के अध्यक्ष पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ का समर्थन प्राप्त था, लेकिन वह जनता समाजवादी पार्टी (जेएसपी) का समर्थन हासिल करने में नाकाम रहे.

जेएसपी के अध्यक्ष उपेंद्र यादव ने देउबा को समर्थन का आश्वासन दिया था, लेकिन पार्टी के एक और अध्यक्ष महंत ठाकुर ने इस विचार को खारिज कर दिया.

निचले सदन में नेपाली कांग्रेस के पास 61 और सीपीएन-मॉएस्ट सेंटर के पास 49 सीटें हैं. इस प्रकार उनके पास 110 सीटें हैं, लेकिन बहुमत के आंकड़े से कम हैं.

फिलहाल सरकार गठन के लिए 136 मतों की जरूरत होती है. सदन में जेएसपी की 32 सीटें हैं. यदि जेएसपी समर्थन दे देती तो देउबा को प्रधानमंत्री पद के लिए दावा पेश करने का अवसर मिल जाता.

हालांकि ओली के साथ अंतिम वक्त में बैठक करने के बाद माधव कुमार नेपाल के रुख बदलने पर देउबा का अगला प्रधानमंत्री बनने का सपना टूट गया.

ओली की अध्यक्षता वाली सीपीएन-यूएमएल 121 सीटों के साथ 271 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में सबसे बड़ी पार्टी है. वर्तमान में सरकार बनाने के लिए 136 सीटों की जरूरत है.

माधव कुमार नेपाल के धड़े वाले 28 सांसदों ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और माधव के बीच 13 मई को समझौता होने के बाद अपनी सदस्यता से इस्तीफा नहीं देने का निर्णय लिया.

ओली ने माधव समेत यूएमएल के चार नेताओं के खिलाफ कार्रवाई का फैसला वापस लेते हुए उन्हें उनकी मांगें माने जाने का आश्वासन दिया था. यदि यूएमएल के सांसद इस्तीफा दे देते तो प्रतिनिधि सभा में सदस्यों की संख्या घटकर 243 रह जाती, जो फिलहाल 271 है. ऐसे में सरकार गठन के लिये केवल 122 मतों की दरकार होती.

इसके बाद राष्ट्रपति कार्यालय ने 13 मई की शाम एक बयान में कहा कि राष्ट्रपति देवी भंडारी ने नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 78 (3) के अनुसार प्रतिनिधि सभा में सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के नेता के रूप में ओली को प्रधानमंत्री के रूप में फिर से नियुक्त किया है.

नेपाल में राजनीतिक संकट पिछले साल 20 दिसंबर को तब शुरू हुआ, जब राष्ट्रपति भंडारी ने प्रधानमंत्री ओली की अनुशंसा पर संसद को भंग कर नए सिरे से चुनाव कराने का निर्देश दिया था.

इसके बाद इस साल फरवरी में नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने तय समय से पहले चुनाव की तैयारियों में जुटे प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को झटका देते हुए संसद की भंग की गई प्रतिनिधि सभा को बहाल करने का आदेश दे दिया था.

ओली ने संसद भंग करने की अनुशंसा सत्तारूढ़ सीपीएन-यूएमएल में सत्ता को लेकर चल रही खींचतान के बीच की थी. उस बीच ओली ने माधव कुमार नेपाल और अन्य विद्रोहियों को छह महीने के लिए पार्टी की सदस्यता से निलंबित कर दिया था. सुलह वार्ता का मार्ग प्रशस्त करते हुए 13 मई की सुबह इस निलंबन को वापस ले लिया गया था. 

नेपाल में रोज कोविड-19 के लगातार 9,000 से ज्यादा मामले आने के कारण संकट बढ़ गया है. मरीजों की संख्या बढ़ने से चिकित्सकीय सामानों की किल्लत हो गई है और अस्पतालों पर दबाव बढ़ गया है.

महामारी की दूसरी लहर के कारण देश में काठमांडू घाटी के तीन जिलों समेत 40 जिलों में दो सप्ताह के लिए निषेधाज्ञा लागू है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)