समाज

वेद प्रकाश शर्मा ने न साहित्य के सामंतों के लिए लिखा, न उनके प्रमाण पत्र की ज़रूरत समझी

लाखों प्रतियों में बिकने वाले वेद प्रकाश ही तो हमारे रोल मॉडल हैं जो यकीं दिलाते हैं कि हिंदी में लिख के भी पेट और पॉकेट दोनों भरा जा सकता है.

ved shrma

वेद प्रकाश शर्मा चले गये, उतना अकेले लिख के चले गये जितना कई उपन्यासकारों का सामूहिक संघ मिल-जुल के भी अपनी-अपनी लिखे और उसे जोड़े तो संख्या उन्नीस ही पड़ जायेगी. ज्ञात रूप में 173 उपन्यास लिखे, वो भी तब जब हिंदी साहित्य के किसी भी पवित्र मंदिर में उन उपन्यास को छुआना मना था.

पर धरती किरिया कहता हूं,ये था लेखन का विश्वास, जिसके लिए लिखा बस उसकी फ़िक्र की और खूब लिखा. साहित्याधिपतियों के लिए न लिखा न उनके प्रमाण पत्र की जरूरत समझी.

वेद प्रकाश शर्मा हिंदी साहित्य से खारिज़ हुए,उन्होंने देखा कि कैसे साहित्याचार्यों द्वारा उनकी करिश्माई कल्पनाशील रचनात्मकता को लुग्दी का कफ़न ओढ़ा दिया गया पर उन्होंने अपने पैदा किये पात्रों को न मरने दिया और उन पात्रों की परवरिश के लिए अपने बूते लाखों पाठक बनाये.

उनके निधन के बाद देख रहा हूं पूरा सोशल मिडिया ‘ऑनर किलिंग’ और ‘शाकाहारी खंजर’ के रूमानी किस्सों से भरा पड़ा है. हर ज्ञात-अज्ञात हिंदी के लेखक अपने ज़माने में पढ़े वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास के संस्मरण लिख रहे हैं.

हर कोई यही से बात शुरू कर रहा कि वेद के उपन्यास उसने फलना कमरे में छुप के पढ़ा तो कोई रजाई में घुस के पढ़ता था तो किसी ने पुआल के ढेरी में छुपा रखा था वेद प्रकाश वाले उपन्यास को.

उनके निधन के बाद भी उन्हें श्रद्धांजलि देने के बाबत उनके संस्मरण से जुड़ा ये जो छुपा-छुपाई की रोमांचक पठन वृतांत का किस्सा आ रहा है न ये असल में बता रहा है कि हम आज साहित्य के जनवाद का मर्म पकड़ने में कहीं चूक रहे हैं. जन-जन के द्वारा जाना गया नाम आपके लिए कुछ भी नहीं?

इधर आप हिंदी के कम पठनीयता पर पिज़्ज़ा खा-खा के रोईयेगा, इधर खेत-खलिहान से लेकर रेल-बस और सुतने वाले बिछौने के नीचे तक पहुंच चुके उपन्यास के रोमांच को लुग्दी कह गढ़हा में ठेल दीजियेगा तो ऐसे में कैसे ईमानदारी से बात हो पायेगी हिंदी की पठनीयता पर?

आज जब परिस्थितिवश बिक्री यानी बेस्ट सेलर का आकर्षण सारे व्याकरण पर भारी पढ़ने लगा है वैसे में वेद प्रकाश जैसे लाखों करोड़ों की प्रतियां बेच देने वाले लेखक को हम नज़रंदाज़ तो नहीं कर पा रहे पर उस पर लोकप्रिय के साथ सस्ता का मुहर मार उसकी चर्चा भर कर देते हैं और कुछ भी हो जाय पर वेद प्रकाश शर्मा को घर और साहित्य वाले मेज़ पर पढ़ा जाने वाला लेखक नहीं मान रहे.

एक तो भैया हम उन्हें पढ़ने के आकर्षण से कतई न बच पाये पर उन्हें खेत-खलिहान,स्लीपर बोगी और गर्मी के दिनों में अंधेरे कमरे के कोने वाला लेखक ही कहेंगे. ये कैसी अकड़ है हमारे साहित्यिक रूचि की?

असल बात तो ये है कि हम साहित्य के क्लासिकनुमा सामंतवाद के अहं से मुक्त होने में इज़्ज़त का जाना समझ बैठे हैं. लाखों-करोड़ों प्रतियों की अकल्पनीय बिक्री को पचाने लायक लिवर अभी भी हिंदी जगत का बना नहीं है.

हम बड़ी आसानी से बिकाऊ और बिकने लायक साहित्य का घालमेल कर हर बिकने वाले को साहित्यकार को मस्तराम की श्रेणी में खड़ा कर देते हैं. हंसी आती है खास कर जब आज का कोई लेखक कहता है कि मैंने वेद को छुप के पढ़ा.

अगर आज आप हिंदी के नये लेखन की धारा पर गौर करें और छुपने-छुपाने की कसौटी वेद प्रकाश जैसी रचना को ही मान लें तो आपको इन रचनाओं को पढ़ने के लिए अलग से झाड़-जंगल लगाने चाहिए जहां आप नए दौर के नए उपन्यास पढ़ सकें.

खैर बदले दौर में जिस तरह वेद को चाहे जैसे भी याद कर नये ज़माने वाले कुल हिंदी लेखकों ने उनके आकर्षण को स्वीकारा है ये साफ बताता है कि हिंदी साहित्य अब केवल लिखना नहीं बिकना भी चाहता है. वेद प्रकाश शर्मा को हिंदी साहित्य के साधु-संतों ने भले उपन्यासकार न माना हो पर वक़्त ने आज खुद उनको एक महान कथाकार का दर्ज़ा दे ही दिया है.

सैंकड़ो पात्रों को पन्ने पर ज़िंदा करना और उसे निभा कर ज़ेहन में घुसा अमर कर देना,ये मज़ाक है क्या महराज. वेद प्रकाश शर्मा ने हम जैसे लिखने वाले कई नए लोगों को ये सबक दिया कि लिखो,लिखो,लिखो और अपने पाठक के लिए लिखो.

लाखों प्रतियों में बिकने वाले वेद प्रकाश ही तो हमारे रोल मॉडल हैं जो यकीं दिलाते हैं कि हिंदी में लिख के भी पेट और पॉकेट दोनों भरा जा सकता है. हम क्या लिखें ये हमारे दौर को तय करना है पर लिखो तो बिकने की कूवत पैदा कर लिखो ये वेद सीखा गए हैं हमें.

हमें ये भी उम्मीद है कि वेद प्रकाश की लोकप्रियता साहित्य की कसौटी को भी कोई नया रूप देगी जहां नए ज़माने का लेखन खुल के सांस ले सके. वे लोग भी लेखक कहा सकेंगे जो लेखक थे भी. अंत में एक बात जिसके लिये वेद प्रकाश शर्मा को बचपन में जाना मैंने और खुल्लमखुल्ला जाना वो था ‘वर्दी वाला गुंडा’.

क़सम से शुक्रिया वेद साहब उस कच्ची उम्र में ही ये पक्का सबक दे सावधान कर देने के लिए कि वर्दी में भी गुंडा हो सकता है…..बेटा सावधान. वर्ना हम तो खाकी, खादी सब को बस पवित्र ही मानते रह जाते. जय हो.