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उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में मस्जिद ढहाए जाने को लेकर रोष, उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रामसनेही घाट तहसील परिसर में स्थित मस्जिद को प्रशासन ने 17 मई की शाम को ढहा दिया है. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड ने एक सदी पुरानी मस्जिद को कथित रूप से ढहाए जाने पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए सरकार से इस वारदात के ज़िम्मेदार अफसरों को निलंबित कर मामले की न्यायिक जांच कराने और मस्जिद के पुनर्निर्माण की मांग की है.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

लखनऊ/बाराबंकी: ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) और उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने बाराबंकी जिले की रामसनेही घाट तहसील में स्थित एक सदी पुरानी मस्जिद को कथित रूप से ढहाए जाने पर सख्त नाराजगी जाहिर करते हुए मंगलवार को सरकार से इस वारदात के जिम्मेदार अफसरों को निलंबित कर मामले की न्यायिक जांच कराने और मस्जिद के पुनर्निर्माण की मांग की.

जानकारी के अनुसार, रामसनेही घाट तहसील के आवासीय परिसर में स्थित मस्जिद और उससे सटे कमरों को तहसील प्रशासन ने 17 मई की शाम को ढहाकर उसका मलबा जगह-जगह फिकवा दिया था.

प्रशासन ने ढहाए गए भवन और मस्जिद को ‘अवैध आवासीय परिसर’ करार देते हुए कहा कि संयुक्त मजिस्ट्रेट की अदालत के आदेश पर यह कार्रवाई की गई है.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कार्यवाहक महासचिव मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने एक बयान जारी कर कहा, ‘बोर्ड ने इस बात पर नाराजगी का इजहार किया है कि रामसनेही घाट तहसील में स्थित गरीब नवाज मस्जिद को प्रशासन ने बिना किसी कानूनी औचित्य के सोमवार रात पुलिस के कड़े पहरे के बीच शहीद कर दिया है.’

उन्होंने कहा, ‘यह मस्जिद 100 साल पुरानी है और उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में इसे सूचीबद्ध भी किया गया है. इस मस्जिद के सिलसिले में किसी किस्म का कोई विवाद भी नहीं है. मार्च के महीने में रामसनेही घाट के उप-जिलाधिकारी ने मस्जिद कमेटी से मस्जिद के कागजात मांगे थे.’

उन्होंने आगे कहा, ‘इस नोटिस के खिलाफ मस्जिद प्रबंधन कमेटी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी और अदालत ने समिति को 18 मार्च से 15 दिन के अंदर जवाब दाखिल करने की मोहलत दी थी, जिसके बाद एक अप्रैल को जवाब दाखिल कर दिया गया, लेकिन इसके बावजूद बगैर किसी सूचना के एकतरफा तौर पर जिला प्रशासन ने मस्जिद शहीद करने का जालिमाना कदम उठाया है.’

मौलाना सैफुल्लाह ने बयान में कहा, ‘हमारी मांग है कि सरकार हाईकोर्ट के किसी सेवारत न्यायाधीश से इस वाकये की जांच कराए और जिन अफसरों ने यह गैरकानूनी हरकत की है उनको निलंबित किया जाए. साथ ही मस्जिद के मलबे को वहां से हटाने की कार्रवाई को रोककर और ज्यों की त्यों हालत बरकरार रखे. मस्जिद की जमीन पर कोई दूसरी तामीर करने की कोशिश न की जाए. यह हुकूमत का फर्ज है कि वह इस जगह पर मस्जिद तामीर कराकर मुसलमानों के हवाले करे.’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 24 अप्रैल को सुनाए गए एक आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था, ‘हाईकोर्ट, जिला न्यायालय या सिविल न्यायालय द्वारा पहले से ही पास बेदखली या विध्वंस का कोई भी आदेश यदि इस आदेश के पारित होने की तारीख तक निष्पादित नहीं किया जाता है तो यह 31/05/2021 तक की अवधि के लिए स्थगित रहेगा.’

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय यादव और जस्टिस प्रकाश पाडिया की पीठ ने एक जनहित याचिका के जवाब में आदेश पारित करते हुए कहा था कि यह आवश्यक है, क्योंकि सभी स्तरों पर अदालतें कम क्षमता के साथ काम कर रही हैं.

हालांकि, जिलाधिकारी आदर्श सिंह ने मस्जिद और उसके परिसर में बने कमरों को ‘अवैध निर्माण’ करार देते हुए एक बयान में कहा कि इस मामले में संबंधित पक्षकारों को पिछली 15 मार्च को नोटिस भेजकर स्वामित्व के संबंध में सुनवाई का मौका दिया गया था, लेकिन परिसर में रह रहे लोग नोटिस मिलने के बाद फरार हो गए, जिसके बाद तहसील प्रशासन ने 18 मार्च को परिसर पर कब्जा हासिल कर लिया.

उन्होंने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने इस मामले में दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए गत दो अप्रैल को उसे निस्तारित कर दिया. इससे यह साबित हुआ कि वह निर्माण अवैध है. इस आधार पर रामसनेही घाट उप जिला मजिस्ट्रेट की अदालत में न्यायिक प्रक्रिया के तहत वाद दायर किया गया. इस प्रकरण में न्यायालय द्वारा पारित आदेश का 17 मई को अनुपालन करा दिया गया.

हालांकि, 18 मार्च की सुनवाई मस्जिद द्वारा दायर एक याचिका पर हुई थी, जिसमें कहा गया था कि नोटिस दिनांक 3/6/2016 के निर्णय के पैरा 8(iii) में निहित निर्देशों का पालन सुनिश्चित किए बिना मस्जिद को ध्वस्त करने के इरादे से जारी किया गया था.

सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने अदालत को सूचित किया था कि उप-संभागीय मजिस्ट्रेट के निर्देश पर मस्जिद की प्रबंध समिति के सदस्य मोहम्मद नसीम को नोटिस दिया गया था, जिसमें उन्हें मस्जिद पर दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने की आवश्यकता थी और इसका इरादा विध्वंस का नहीं था.

जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और मनीष कुमार की पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि मस्जिद पर नोटिस ‘केवल दस्तावेजी सबूत मांगने के उद्देश्य से दिया गया था, न कि विध्वंस के लिए.’

रामसनेही घाट के उप जिलाधिकारी दिव्यांशु पटेल ने दावा किया कि तहसील परिसर में स्थित उस भवन को हाईकोर्ट के आदेश पर अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 133 के तहत ढहाया गया है.

इस बीच, उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने भी इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा की है.

बोर्ड के अध्यक्ष जफर अहमद फारूकी ने एक बयान में कहा, ‘प्रशासन ने खास तौर पर रामसनेही घाट के उप जिलाधिकारी द्वारा अवैध अतिक्रमण हटाने के नाम पर तहसील परिसर के पास स्थित 100 साल पुरानी एक मस्जिद को ध्वस्त कर दिया है. मैं इस अवैध और मनमानी कार्रवाई की कड़ी निंदा करता हूं.’

उन्होंने कहा, ‘यह कार्रवाई न सिर्फ कानून के खिलाफ है बल्कि शक्तियों का दुरुपयोग भी है. साथ ही हाईकोर्ट द्वारा गत 24 अप्रैल को पारित आदेश का खुला उल्लंघन है. उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड उस मस्जिद की बहाली, घटना की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए हाईकोर्ट में जल्द ही मुकदमा दायर करेगा.’

भाजपा सांसद ने मुख्यमंत्री को पत्र लिख वक्फ बोर्ड के ‘अवैध कब्जों’ पर कार्रवाई की मांग की

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से भाजपा सांसद उपेंद्र रावत ने बुधवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर जिले की रामसनेही घाट तहसील के आवासीय परिसर में बने ‘अवैध भवन’ को प्रशासन द्वारा हटाए जाने की कार्रवाई का समर्थन किया है.

रावत ने सुन्नी वक्फ बोर्ड द्वारा विभिन्न जिलों में सरकारी जमीनों को कथित तौर पर अवैध कब्जा करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की भी मांग की.

सांसद ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में आरोप लगाया कि प्रदेश के कई जिलों में उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड द्वारा अवैध रूप से सरकारी जमीनों पर पंजीकरण कर कब्जा किया गया है.

उन्होंने पत्र में कहा कि बाराबंकी में भी तहसील रामसनेही घाट के अंतर्गत ऐसा ही एक मामला प्रकाश में आया है, जिसमें जांच के बाद कार्रवाई की गई है.

रावत ने पत्र में मांग की, ‘मुख्यमंत्री से अनुरोध है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड द्वारा मस्जिद के नाम से पूर्व में किए गए अवैधानिक कब्जों की जांच कर वक्फ बोर्ड के दोषी अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए.’

भाजपा सांसद ने दावा किया कि सुन्नी वक्फ बोर्ड रामसनेही घाट तहसील के आवासीय परिसर में बनी मस्जिद को 100 साल पुरानी बता रहा है, लेकिन बोर्ड के दस्तावेज के अनुसार वक्फ की संपत्ति के रूप में उसका पंजीयन वर्ष 2018 में किया गया. अगर मस्जिद इतनी पुरानी थी, तो उसका पंजीकरण इतनी देर से क्यों किया गया.

इस सवाल पर कि क्या रामसनेही घाट तहसील के आवासीय परिसर में स्थित मस्जिद का पंजीकरण वर्ष 2018 में किया गया है, सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जफर फारूकी ने बताया कि इस इबादतगाह का पंजीकरण वर्ष 1968 में हुआ था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)