कोविड-19

निशुल्क इलाज देने वाले डॉ. प्रदीप बिजलवान का बिना इलाज के गुज़र जाना व्यवस्था पर सवाल है

क्या पैसे, शोहरत और सुरक्षा की परवाह किए बगैर चुपचाप समाज के सबसे वंचित तबके की मदद करने वाले डॉ. प्रदीप बिजलवान के अस्पताल और ऑक्सीजन की जद्दोजहद के बीच गुज़र जाने के कोई मायने हैं? क्या वे भी उस सरकारी रिकॉर्ड में मौत का महज़ एक आंकड़ा बनकर रह जाएंगे, जिसमें आज की तारीख़ में लगभग दो लाख मौतें दर्ज हैं?

डॉ. प्रदीप बिजलवान. (फोटो साभार: theindiaforum.in)

डॉ. प्रदीप बिजलवान. (फोटो साभार: theindiaforum.in)

डॉ. प्रदीप बिजलवान का शव दो दिनों तक उनके घर में ही पड़ा रहा और उनका परिवार और सहयोगी दाह-संस्कार के लिए इधर उधर भटकता रहा.

राजधानी के सभी श्मशानों में इस तरह इंतजार करने वालों की लंबी कतारें लगी हुई थी: श्मशान घाट के आसपास के पार्क, फुटपाथ और पार्किंग क्षेत्र तक पर दिन-रात चिताएं जल रही थीं. आखिरकार उनके परिवार को दिल्ली के सीमावर्ती गाजीपुर के श्मशान घाट में शनिवार 24 अप्रैल को सुबह 9 बजे का समय दिया गया.

उनकी पत्नी और बेटी भी कोविड-19 से संक्रमित थीं, इसलिए वे अंत्येष्टि में शामिल नहीं हो सकीं. मैं दिल्ली में नहीं था लेकिन हमारे कुछ साथी डॉ. प्रदीप के अंत्येष्टि में शामिल हुए. उन्होंने वहां नारकीय अव्यवस्था और शोक के जो दृश्य देखे, वे उनके दिल में लाइलाज जख्म बनकर रह गए.

कुछ शवों के साथ कोई परिजन वहां मौजूद नहीं था, जिनकी चिताओं को वालंटियर्स ने आग दी. कहीं अकेली महिला शव के दाह-संस्कार करने की कोशिश कर रही थीं.

डॉ. प्रदीप की अंत्येष्टि के लिए जिस दौरान वे  इंतजार कर रहे थे, तब उस छोटे-से श्मशान में 35 चिताएं जल रही थीं, 25 शव लाइन में  थे, और एक बड़ी कतार लगातार आ रही थी.

डॉ. प्रदीप बिजलवान से मेरी पहली मुलाकात के करीब एक दशक बीत गए. करीब एक दशक से हमारी छोटी-सी टीम शहरों के बेघर लोगों के लिए काम कर रही थी, जिसकी शुरुआत हमने दिल्ली से की थी. काम करते हुए और महीनों तक पुलिस रिकॉर्ड और श्मशान घाट और कब्रिस्तानों में लावारिस शवों के रजिस्टर के अध्ययन से हमने पाया कि घर-बार वाले व्यक्ति के मुकाबले किसी बेघर व्यक्ति के मरने की संभावना कम से कम पांच गुना अधिक होती है.

हमने यह भी पाया कि हमारे शहरों के बेघर लोगों में से बहुत कम लोगों को किसी भी प्रकार की कोई स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध है. वे उन अप्रशिक्षित निजी प्रैक्टिशनर्स का खर्च भी वहन नहीं कर सकते थे, जिन पर दूसरे ग़रीब लोग टिके होते हैं. वे सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं से भी दूर ही रहते थे क्योंकि फटेहाल दिखने वालों के लिए यह सुविधा डरावनी लगती थी क्योंकि उन्हें अगर वहां प्रवेश मिल भी जाए तो वहां का स्टाफ उनके साथ अपमानजनक बर्ताव करता था.

उनमें से अधिकांश लोगों ने बीमारी के साथ खुद लड़ना, बीमारी से किस तरह जूझना और सहन करना और कई बार चुपचाप दम तोड़ना सीख लिया था.

इसे बदलने के लिए अमेरिका के पिट्सबर्ग में स्ट्रीट मेडिसिन के प्रणेता डॉ. जिम विथर्स के कार्यों से प्रेरित होकर हमने दिल्ली में एक स्ट्रीट मेडिसिन प्रोग्राम लॉन्च किया.

बेघर लोगों के साथ एक दशक तक काम करने के तजुर्बे ने हमें सिखाया था कि बेघर लोगों से उम्मीद न करें कि वे आपके क्लीनिक में आएंगे. इसके बदले आपको उनके ठिकाने पर जाना होगा, उन फुटपाथ, पार्कों और पुलों के नीचे जाना होगा, उनका भरोसा जीतना होगा और पूरे सम्मान और संवेदना के साथ उनकी देखभाल करनी होगी.

यह विचार सिद्धांतत: बहुत आसान है, लेकिन इसे पूरा करना बहुत कठिन है. हमने स्ट्रीट मेडिसिन की शुरुआत कुछ शानदार नर्सों के चयन के साथ की, जो गलियों में लोगों की मदद करने के लिए अस्पताल की सुरक्षित नौकरी छोड़ने को इच्छुक थीं. साथ ही साथ हमने कुछ समर्पित स्वास्थ्यकर्मियों को भी इसके लिए प्रेरित और प्रशिक्षित किया.

लेकिन किसी ऐसे डॉक्टर की खोज करना जो अपनी शाम और रात को बेघर लोगों की सेवा में बिता सके, हमारे लिए एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य था. हम उम्मीद खोने वाले थे तभी हमारी मुलाकात डॉ. प्रदीप बिजलवान से हुई. वे गठीले शरीर के थे और उम्र में मुझसे थोड़े छोटे थे, कम बोलते थे और सादा जीवन जीते थे.

जब उनसे बात हुई तो उन्होंने मुझसे बहुत सादगी से कहा- सबसे जरूरतमंद लोगों की मदद करना मैं हमेशा से चाहता था. इन शब्दों के साथ हमारे यादगार पार्टनरशिप और दोस्ती की शुरुआत हुई जो एक दशक तक चलती रही.

डॉ. प्रदीप के माता-पिता वैचारिक रूप से आदर्शवादी कम्युनिस्ट थे. 1970 के दशक में उन्होंने तत्कालीन सोवियत संघ में डॉक्टर के तौर पर प्रशिक्षित हुए. सोवियत संघ में अपने प्रवास के दौरान वे एक युवा के तौर पर वहां मानव इतिहास में सबसे बराबरी वाले देश के निर्माण का दोषपूर्ण मगर साहसी प्रयोग देख रहे थे, उससे बहुत प्रभावित हुए.

इन वर्षों का जो अनुभव उनके साथ सबसे अधिक रहा, वो सामाजिक नीति का आधार प्रत्येक मानव को बराबरी से बनाने का सिद्धांत था. प्रत्येक मानव की बराबरी के विचार के प्रभाव से डॉ. प्रदीप ने अपने जीवन को जरूरतमंद लोगों के लिए समर्पित करने का फैसला किया.

स्ट्रीट मेडिसिन का कार्यक्षेत्र एक तरह से असुरक्षित और अस्वच्छ रहता है. दिन के समय बेघर लोगों की पहचान करना मुश्किल होता है इसलिए उस क्षेत्र में काम करने की शुरुआत शाम 7 बजे के बाद शुरू होती है जो कई बार आधी रात तक चलती है.

डॉ. प्रदीप एक पुरुष नर्स और स्वास्थ्यकर्मी के साथ वैन में सवार होकर बेघर परिवारों की बस्तियों में जाते. स्वास्थ्य कर्मी उन बेघर लोगों की भीड़ इकट्ठी करता जो अस्वस्थ थे. डॉ. प्रदीप जिस वैन में अपना डेस्क व्यवस्थित करके बैठते, बेघर लोग उसके आसपास भटकते.

वे सभी बेघर मरीजों को बड़ी तल्लीनता से सुनते, उनकी जांच करते और दवाएं लिखते. नर्स और स्वास्थ्य कर्मी बेघर लोगों के बीच दवाएं बांटते, उन्हें स्वस्थ जीवनशैली की सलाह देते और जहां जरूरत होती वहां उनके घावों की सफाई करते. अगले हफ्ते जब वो वहां जाते, वे उनके मरीज को याद रखते और बाद की मुलाकातों के दौरान उनका हालचाल पूछते.

यदि रोगियों को अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आती तो स्वास्थ्य कर्मी तत्परता के साथ व्यक्तिगत रूप से उन्हें सरकारी अस्पताल लेकर जाते और वहां उन्होंने उन डॉक्टरों के साथ अच्छा संपर्क स्थापित कर लिया था, जो अपने बेघर मरीजों को भर्ती करने को सहमत थे.

मैं कभी-कभी स्ट्रीट मेडिसिन की गाड़ियों के साथ जाया करता था और काम करते हुए डॉ. प्रदीप को चुपचाप देखता. मैं जानता हूं कि ऐसे बहुत ही कम डॉक्टर होंगे जो अपनी शाम बेघर लोगों की बस्तियों के बीच अंधेरे में एक तंग गाड़ी के भीतर गुजारने को इच्छुक होंगे.

डॉ. प्रदीप सभी मरीजों को ध्यान से सुनते, उन्होंने कभी किसी मरीज को छूने से हिचकिचाहट नहीं दिखाई तथा उन बेघर लोगों का इलाज भी उसी सम्मान के साथ किया जैसा इलाज वे मेरा करते अगर मैं उनसे सलाह मांगता . वे उन चिकित्सकों की अंतिम नस्लों में से एक थे, जिन्होंने अपने मरीज के स्वास्थ्य और देखभाल को सर्वोपरि समझा.

नर्स और स्वास्थ्य कर्मी डॉ. प्रदीप के मूल मंत्र को याद करते हैं कि: हर इंसान को हर प्रकार से बराबरी का हकदार है और सबको समान सम्मान और इज्जत मिलनी चाहिए.

वे यह भी याद करते हैं कि डॉ. प्रदीप ने स्वास्थ्य क्षेत्र में चली आ रही परंपरागत पदानुक्रम को बहुत जल्द तोड़ दिया था. उनके सहयोग और संवेदना के इस मुहिम में डॉक्टर, नर्स, स्वास्थ्य कर्मी और वैन चालक- जो दवा बांटने का काम भी करता था, बराबरी के सहभागी और दोस्त थे.

डॉ. प्रदीप उन्हें पढ़ने और सीखने के लिए भी प्रोत्साहित करते. उन्होंने कभी भी डॉ. प्रदीप को किताबों के बगैर नहीं देखा. युवा साथी आसिफ- जो हमारे सबसे संवेदनशील और देखभाल करने वाले स्वास्थ्य कर्मी हैं- वे याद करते हैं कि वे अपने ग्रेजुएशन के दौरान पढ़ाई छोड़कर घर से भाग गए थे, फिर डॉ. प्रदीप ने मुक्त विश्वविद्यालय में उनका दाखिला कराया और अब वे ग्रेजुएट हैं.

अपने खाली समय में डॉ. प्रदीप अपने सहकर्मियों से बराबरी के अपने सपने के बारे में बात करते, वे बताते कि दुनिया में किसी भी बदलाव से अधिक उनके लिए महत्वपूर्ण है हर इंसान की बराबरी और गरिमा की पहचान करना और सबको बराबरी का हक दिलाना.

डॉ. प्रदीप किसी निजी अस्पताल में नौकरी करके या अपना क्लीनिक खोलकर जितना कमाते उसके मुकाबले हम उन्हें बहुत कम ही राशि दे पाते थे. लेकिन उनके लिए पैसे का अधिक मोल नहीं था. उनके भीतर मैंने एक जुनूनी कॉमरेड को देखा है.

वे सरकार के साथ मेरे संघर्षों, मेरी लेखनी और मेरी राजनीति को देखा करते थे और खुले दिल से इनका समर्थन करते. उन्हें मेरी सुरक्षा की चिंता होती, लेकिन फिर भी वे अन्यायपूर्ण शक्ति के विरुद्ध मेरे कहे को समर्थन दिया करते थे.

बीते साल लॉकडाउन के बाद दूसरे दिन से ही हम उन बेघर लोगों को भोजन उपलब्ध कराने में लगे थे, जिन्हें रातोंरात भूख और बेरोजगारी में धकेल दिया गया था. कोविड-19 संक्रमण के बेघर लोगों की बस्तियों में पहुंचने की रफ़्तार धीमी थी. लेकिन लॉकडाउन में ढील के बाद पिछले साल सितंबर के आसपास हमें बेघर आबादी में बुखार और लोगों की मौत की ख़बरें मिलने लगी.

निराश्रितों और बेघर लोगों के बीच जांच न के बराबर थी और उनके लिए क्वारंटीन और आइसोलेशन की भी कोई सुविधा नहीं थी. इसलिए हमने बेघर लोगों के लिए अपना स्वयं का कोविड-क्लीनिक शुरू करने का फैसला किया. डॉ. प्रदीप इस क्लीनिक के कर्ताधर्ता थे और उन्होंने संक्रमण की पहचान करने, उपचार करने और सैकड़ों संक्रमित बेघर लोगों को अस्पताल में भर्ती कराकर बहुत सारी जानें बचाईं.

शायद डॉ. प्रदीप का कोरोना से संक्रमित होना अवश्यंभावी था. तार्किक रूप से कहा जा सकता है कि वे अपने स्वयं के स्वास्थ्य और बचाव के बारे में अधिक सावधान हो सकते थे. जब मैं उनसे ये बात कहता तब वे जवाब देते कि जब सरकार ने बेघर लोगों को साफ तौर पर छोड़ दिया है, तब वे इस आपदा के समय में उन बेघर लोगों की देखभाल में ही- बिना दूरी और अवरोध के साथ- रहना चाहते हैं.

ऐसा करते हुए वे शायद अपने स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान नहीं दे सके. जब वायरस ने उन्हें संक्रमित किया, तो उनका ऑक्सीजन लेवल ख़तरनाक रूप से घटता गया. एक डॉक्टर के तौर पर वे इसके ख़तरे को जानते थे.

खुद उन्होंने और उनके परिवार ने ऑक्सीजन सप्लाई वाले अस्पताल में दाखिले की लाख कोशिशें की, पर ऐसा नहीं हो सका. अंत में, परिवार के लोग घर पर ही ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर आए और उन्हें घर पर ही अपना उपचार करने की कोशिश की. मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी. उनके फेफड़े बुरी तरह से संक्रमित हो गया था और उन्हें बचाया नहीं जा सका.

क्या पैसे, शोहरत और अपनी सुरक्षा को किनारे रखकर नि:स्वार्थ भाव से समाज के सबसे वंचित लोगों की चुपचाप मदद करने वाले डॉ. प्रदीप का अस्पताल में बेड और ऑक्सीजन नहीं मिलने के कारण दम तोड़ देना किसी के लिए भी कोई मायने रखता है?

क्या कॉमरेड प्रदीप बिजलवान उस सरकारी रिकॉर्ड में मौत का सिर्फ एक आंकड़ा बन कर रह जाएंगे, जिसमें आज की तारीख में लगभग दो लाख मौतें दर्ज हैं? क्या कॉमरेड प्रदीप के जीवन, संघर्ष और मौत को सिर्फ एक आंकड़े में दर्ज करने से हम उनके साथ न्याय कर पाएंगे?

(लेखक पूर्व आईएएस अधिकारी और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.)