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यूपी: ईडब्ल्यूएस कोटे में नियुक्ति पर विवाद के बाद बेसिक शिक्षा मंत्री के भाई ने इस्तीफ़ा दिया

सिद्धार्थनगर ज़िले की सिद्धार्थ यूनिवर्सिटी में योगी सरकार के बेसिक शिक्षा मंत्री सतीश द्विवेदी के भाई अरुण कुमार द्विवेदी की आर्थिक रूप से कमज़ोर सामान्य वर्ग की श्रेणी में असिस्टेंट प्रोफेसर के बतौर नियुक्ति हुई थी. इसे लेकर हुए विवाद के बाद उन्होंने अपना इस्तीफ़ा दे दिया है.

सिद्धार्थनगर में प्रेस कॉन्फ्रेंस में डाॅ. अरुण कुमार द्विवेदी. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

सिद्धार्थनगर में प्रेस कॉन्फ्रेंस में डाॅ. अरुण कुमार द्विवेदी. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

गोरखपुर: आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के कोटे से सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु में असिस्टेंट प्रोफेसर बने बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. सतीश द्विवेदी के भाई डाॅ. अरुण कुमार द्विवेदी ने बुधवार इस्तीफा दे दिया.

सिद्धार्थनगर जिला मुख्यालय पर पत्रकार वार्ता कर अपने इस्तीफे की जानकारी देते हुए डॉ. अरुण ने कहा कि मंत्री का भाई होना अपराध और ब्राह्मण का बेटा होना अभिशाप हो गया.

सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के कुलपति ने डॉ. अरुण कुमार द्विवेदी के त्यागपत्र को कार्य परिषद के अनुमोदन की प्रत्याशा में तत्काल प्रभाव से बुधवार को ही स्वीकार भी कर लिया.

डॉ. अरुण कुमार द्विवेदी ने इस्तीफा देकर मामले को खत्म करने की कोशिश भले की हो लेकिन लगता नहीं है कि मामला शांत होगा. सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर ने बुधवार को ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर कहा है कि ‘त्यागपत्र देने से ईडब्ल्यूएस सर्टिफिकेट का मामला समाप्त नहीं हो जाता है. कृपया ईडब्ल्यूएस सर्टिफिकेट निर्गत करने के मामले की जांच कराएं.’

उधर, अरुण कुमार ने त्यागपत्र देने की घोषणा करते हुए कहा कि उन्हें 21 मई को सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में योग्यता के आधार पर मनोविज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर पर पर चयनित किया गया था और वे एमए गोल्ड मेडलिस्ट, पीएचडी, डीआईपीआर-डीआरडीओ से जेआरफ एवं एसआरएफ परैत है तथा 17 पुस्तकों-पत्रिकाओं के प्रकाशन व संपादन की उपलब्धि उनके हिस्से में है.

डॉ. अरुण ने कहा, ‘मेरी नियुक्ति योग्यता के आधार पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत हुई लेकिन कार्यभार ग्रहण करने के बाद से ही मेरे बड़े भाई और प्रदेश के बेसिक शिक्षा मंत्री डॉ. सतीश चंद्र द्विवेदी को इस नियुक्ति से जोड़कर उन पर निरर्थक, निराधार और अपमानजनक आरोप लगाकर उनकी छवि को धूमिल किया जा रहा है. यह आरोप मेरे लिए असहनीय है और इससे मैं मानसिक संत्रास की स्थिति से गुजर रहा हूं.’

उन्होंने कहा कि उनके लिए बड़े भाई, परिवार के सामाजिक, राजनीतिक सम्मान से ज्यादा अहमियत और किसी चीज की नहीं है. ऐसे में असिस्टेंट प्रोफेसर पद से इस्तीफा देना ही बेहतर समझा.

गौरतलब है कि ईडब्ल्यूएस कोटे से हुई उनकी नियुक्ति तत्काल विवादों में आ गई थी और इस पर कई तरह के सवाल उठ रहे थे. उनकी नियुक्ति को लेकर राज्यपाल से शिकायत की गई थी और राज्यपाल ने सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सुरेंद्र दुबे से जवाब भी मांगा था.

विपक्षी नेता भी मामले की जांच कर कार्यवाही करने के साथ-साथ बेसिक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे थे. कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी ने भी इस नियुक्ति पर सवाल उठाया था और कहा था कि संकटकाल में यूपी सरकार के मंत्रीगण आम लोगों की मदद करने से तो नदारद दिख रहे हैं लेकिन आपदा में अवसर हड़पने में पीछे नहीं हैं.

वर्ष 2019 में सिद्धार्थ विश्वविद्यालय द्वारा प्रोफेसर के 22, एसोसिएट प्रोफेसर के 21 और असिस्टेंट प्रोफेसर के 40 पदों पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया गया था, जहां मनोविज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के दो पद विज्ञापित किए गए थे जिसमें एक ओबीसी कोटे में और एक ईडब्ल्यूएस कोटे में था.

कुलपति प्रो. सुरेंद्र दुबे ने बताया था कि डॉ. अरुण कुमार द्विवेदी की नियुक्ति मेरिट पर हुई है और वे नहीं जानते कि वे मंत्री डॉ. सतीश द्विवेदी के भाई हैं. सोशल मीडिया के जरिये ही उन्हें पता चला है.

उन्होंने कहा, ‘आर्थिक रूप से कमजोर का प्रमाण पत्र यदि फर्जी होगा तो जरूर कार्यवाही होगी. यदि ईडब्ल्यूएस सर्टिफिकेट फर्जी होगा तो वे दंड के भागी होंगे.’

उन्होंने बताया कि मनोविज्ञान विभाग के सहायक प्रवक्ता के लिए 150 आवेदन आए थे, जिसमें से मेरिट के आधार पर दस अभ्यर्थी शॉर्टलिस्ट किए गए. इनमें से दो पदों पर नियुक्ति हुई. ओबीसी कोटे में डॉ. हरेंद्र शर्मा और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग सामान्य के कोटे में अरुण कुमार साक्षात्कार में सबसे योग्य पाए गए और उनका चयन किया गया.

इस बात को लेकर भी सवाल किए गए थे कि आखिर जब कुलपति का कार्यकाल 21 मई तक ही था तब 20 मई को उनका कार्यकाल अगले कुलपति की नियुक्ति होने तक क्यों बढ़ा दिया गया।

भाई की नियुक्ति पर सवाल उठने पर बेसिक शिक्षा मंत्री ने कहा था कि ‘उनके भाई की नियुक्ति को लेकर लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं और वह किसी भी जांच के लिए तैयार हैं.

डॉ. अरुण ने बुधवार को बताया कि नवंबर 2019 में आवेदन के समय उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का प्रमाण पत्र बनवा कर आवेदन किया था. बाद में उच्च शिक्षा में सेवारत लड़की से विवाह का प्रस्ताव आने पर अपने जीवन की बेहतरी के लिए प्रयास किया, जिसका अधिकार भारत का संविधान भी देता है लेकिन इस पर भी आहत करने वाले आरोप लगाए गए.

सबसे अधिक सवाल इसी प्रमाण पत्र पर उठे थे. नवंबर 2019 का यह प्रमाण पत्र 2020 में स्वतः निरस्त हो गया क्योंकि प्रमाण पत्र एक वित्तीय वर्ष के लिए ही जारी होता है.

इसके अलावा यह सवाल भी उठाया गया था कि सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में नियुक्ति के पहले डॉ. अरुण कुमार द्विवेदी ने राजस्थान के बनस्थली विद्यापीठ में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्य किया था. उनका विवाह दिसंबर 2020 में हुआ और उनकी पत्नी बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के एक कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. इस आधार पर वे कहीं से ईडब्ल्यूएस कोटे में नहीं आते, तो फिर कैसे उन्हें सर्टिफिकेट जारी हुआ.

ईडब्ल्यूएस कोटे के लिए अभ्यर्थी की अर्हता सरकार द्वारा निर्धारित की गई है. इसके अनुसार अभ्यर्थी के परिवार की आय आठ लाख रुपये सालाना से कम होनी चाहिए। साथ ही उसके पास 100 वर्ग फीट का आवासीय भवन, नोटिफाइड म्युनिसिपाल्टी में 100 वर्ग यार्ड या नोटिफाइड म्युनिसिपाल्टी से दूसरी जगह 200 वर्ग यार्ड भूमि नहीं होनी चाहिए.

यह विवाद सामने आने के बाद से बीते दो वर्ष में बेसिक शिक्षा मंत्री और उनकी मां द्वारा खरीदी गई कृषि और आवासीय भूमि के बैनामे के कागजात सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं. इसमें मंत्री और उनके परिजनों द्वारा दो करोड़ से अधिक मूल्य की जमीन को खरीदा जाना बताया गया है.

(लेखक गोरखपुर न्यूज़लाइन वेबसाइट के संपादक हैं.)

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)