राजनीति

उत्तराखंड में भाजपा ख़ुद के लिए ही क्यों बन गई है​ चुनौती?

उत्तराखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. हर चुनाव जनमानस में व्याप्त अवधारणा से जीता जाता है. चार साल में अराजक तरीके से जिस तरह से उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार चली, उसके चलते कुछ महीने बाद होने वाले चुनावों में भाजपा की डगमगाती नैया को अकेले तीरथ सिंह रावत कैसे पार लगा पाएंगे?

तीरथ सिंह रावत. (फोटो साभार: फेसबुक)

तीरथ सिंह रावत. (फोटो साभार: फेसबुक)

उत्तराखंड में कोरोना वायरस महामारी से बेहिसाब मौतों और संक्रमण के सुदूर पहाड़ी गांवों की बड़ी आबादी को अपनी गिरफ्त में लेने के बाद गहरा ऊहापोह है. राज्य में अगले साल चुनाव होने हैं. डैमेज कंट्रोल में जुटी भाजपा अब प्रचार तंत्र में ताकत झोंककर सत्ता वापसी की तैयारियों में जुट गई है.

उत्तर प्रदेश के साथ अगले साल के शुरू में वहां भी चुनाव होने हैं. राज्य बनने के बाद कांग्रेस और भाजपा ने बारी-बारी से इस प्रदेश में सरकारें तो चलाईं, लेकिन राज्य में हर क्षेत्र में हालात बदहाल हैं. छोटा राज्य होने के नाते समस्याग्रस्त उत्तराखंड में भी यहां के राजनीतिक दल दिशाहीनता के संकट में हैं.

कोविड मौतों के सरकारी रिकॉर्ड पर नजर डालें तो 1 मई से 31 मई के एक माह की संक्षिप्त अवधि में ही उत्तराखंड में 3,777 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 14 माह में कुल मौतें 6,497 के चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुकी हैं.

745 बैकलॉग मौतें सामने आई हैं और कोविड मरीजों की संख्या छिपाने के आरोप सरकारी तथा निजी दोनों तरह के अस्पतालों पर लगे हैं.

कोरोना पर विशेषज्ञों की चेतावनियों की अनदेखी करके लाखों की भीड़ हरिद्वार में जुटाने और बाहरी राज्यों के यात्रियों को कोरोना टेस्ट से कथित तौर पर छूट देना ही उत्तराखंड के शहर और गांवों में इतनी बड़ी तादाद में आम लोगों ने अपने परिजनों को खोया है.

उत्तराखंड में इस बार भाजपा जनता के सीधे निशाने पर है, इसलिए कि प्रचंड बहुमत वाली अपनी सरकार को वह चार साल तक चला नहीं पाई. भ्रष्टाचार, कुशासन और बेलगाम भ्रष्ट नौकरशाही के कारण जमीन खिसकती रही है.

तीन माह पहले भाजपा को लगा कि मुख्यमंत्री नहीं बदला तो अगले साल के चुनाव में लुटिया डूब जाएगी. भाजपा की मुश्किलों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसे चुनाव में उतरने के मात्र एक साल पहले ही अपना मुख्यमंत्री बदलना पड़ा.

न तो त्रिवेंद्र सिंह रावत को बदलने वालों ने जनता को बताया कि उन्होंने दिल्ली दरबार के इस चितेरे की छुट्टी किस आरोप में की और न ही भाजपा ने उनकी नाकामी का हिसाब जनता को दिया. आम लोगों को यहां आज तक नहीं पता कि अपने ही मुख्यमंत्री को इस तरह से हटाने की असली वजह क्या रही होगी?

दूसरी ओर बिखरे हुए विपक्ष को इस सत्ता परिवर्तन से चार साल का हिसाब मांगने का मौका हाथ लग गया.

आगामी चुनाव में भाजपा उत्तराखंड में जब वोट मांगने जाएगी तो जाहिर है कि उसे पिछले पांच साल का हिसाब जनता को देना होगा. भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस के नारे के चलते उसने 4 साल तक कैसे खुद ही भ्रष्टाचार का साम्राज्य खड़ा किया.

पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय की जमीन को बिकने की प्रक्रिया में लगी 1,500 एकड़ जमीन ग्रीन फील्ड के नाम पर एयरपोर्ट अथॉरिटी को ट्रांसफर करना भी विवादों के घेरे में है.

2014 के लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा ने मोदी के नाम पर पहाड़ी लोगों के वोट लेने का जुगाड़ करने में खूब कामयाबी हासिल कर ली. उत्तराखंड को मोदी के रंग में डुबाए रखने की इस प्रकिया में पहाड़ों में पलायन रोकने, दूरदराज के गांवों में बुनियादी सहूलियतें जुटाने, बेरोजगारी दूर करने, सड़क और संचार सुविधाएं जुटाने के बजाय अथाह भ्रष्टाचार मिटाने में भाजपा और त्रिवेंद्र सरकार ने रत्ती भर भी कदम नहीं बढ़ाए.

दो तिहाई बहुमत से सरकार बनाने के बाद भी भाजपा ने ठीकरा पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर थोपकर हाथ खड़े कर दिए.

भाजपा आलाकमान को यह कसरत झारखंड में दिसंबर 2019 में करारी हार से मिले सबक को देखकर करनी पड़ी. वहां भी चुनाव के पहले रघुबर दास को लेकर पार्टी और संगठन में भारी आक्रोश था, लेकिन भाजपा ने इस विरोध को दरकिनार करके उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और करारी हार झेली.

उत्तराखंड में भाजपा 2017 में कांग्रेस को सत्ता से हटाकर सत्ता में आई थी. उसने ऐसे व्यक्ति त्रिवेंद्र सिंह रावत को इस नाजुक प्रदेश को सत्ता सौंपने की भारी गलती की, जिनका पहले ही राज्य में कैबिनेट मंत्री के तौर पर रिकॉर्ड बेहद दागदार रहा है.

उनके पूरे कार्यकाल में जनता ही नहीं कार्यकर्ता भी आक्रोशित थे. पूर्व मुख्यमंत्री ने पार्टी के भीतर कइयों को तो निजी खुन्नस निकालने के लिए फर्जी और झूठे मुकदमों में फंसाने में भी गुरेज नहीं किया.

मार्च 2021 में भाजपा ने सोच समझकर ही तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी, क्योंकि वे बेदाग हैं. प्रश्न यह है कि क्या ऐन चुनाव के वक्त किसी चेहरे को सामने लाकर चार साल की भाजपा सरकार की नाकामियों को क्या यहां के मतदाता क्षमा कर सकेंगे? इसका जवाब तलाशने के लिए आने वाले दिनों में होने वाली चुनावी हलचलों पर निगाह रखनी होगी.

नए मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को सत्ता संभाले अब करीब 100 दिन पूरे हो रहे हैं. वे बदला लेने और ओछी राजनीति से दूरी बनाए रखने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के लिए मात्र यही गुण प्रर्याप्त नहीं होते.

हर चुनाव जनमानस में व्याप्त अवधारणा से जीता जाता है. चार साल में अराजक तरीके से जिस तरह से उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार चली, उसके चलते कुछ महीने बाद होने वाले चुनावों में भाजपा की डगमगाती नैया को अकेले तीरथ सिंह रावत कैसे पार लगा पाएंगे?

यह बात लोग इतनी जल्दी कैसे भूल सकते हैं कि जिस मुख्यमंत्री को हटाया गया उनकी पीठ पर चार साल तक भाजपा आलाकमान ने हाथ रखे रखा. अब नए मुख्यमंत्री के बनते ही उनके राज में कई विवादित फैसलों को पलट दिया गया.

ऐसा आमतौर पर तभी होता है, जब किसी विरोधी सरकार को सत्ता से हटाकर कोई अन्य सरकार सत्ता में आई हो. तीरथ सिंह रावत ने कई विवादित दर्जनों लोगों को दर्जाधारी मंत्री, विभिन्न बोर्ड के चेयरमैन समेत कइयों को पद से हटा दिया. इसके अलावा तीर्थ स्थलों पर सरकारी नियंत्रण के विवादित कानून को भी निरस्त कर दिया. वजह यह कि पंडों और पुजारियों में गहरा असंतोष था और वे दो साल से आंदोलनरत थे.

पहाड़ के बदलते परिवेश में अब ‘अलग चाल चरित्र की भाजपा’ में अग्र पंक्ति के आधे मंत्री पिछली कांग्रेस सरकार के ही हैं, उनमें से ज्यादातर ने अपने-अपने गुट बना रखे हैं.

इस उठापटक का आलम यह कि इससे भाजपा के नेताओं में पिछले कुछ सालों में गहरी कटुता घर कर गई है. पद पाने के लिए दिल्ली परिक्रमा करने के अभ्यस्त नेताओं की सूची बनाएं तो इनमें से हर किसी को सिर्फ उत्तराखंड के नाम पर कुर्सी चाहिए. सरकार और संगठन स्तर पर भाजपा खुद ही गंभीर नैतिकता के संकटों से जूझ रही है.

त्रिवेंद्र सरकार में सबसे बदनाम रहे मुख्य सचिव ओम प्रकाश को अभी तक पद से नहीं हटाया गया है. उनको त्रिवेंद्र सिंह का असली राजदार माना जाता है. करीब 12 साल तक वे राज्य में कृषि सचिव रहते उन पर कई घोटालों में लिप्त रहने के आरोप हैं.

त्रिवेंद्र और ओम प्रकाश पर करोड़ों के घोटाले के आरोप हैं. नैनीताल हाईकोर्ट में लंबित मामला दोनों को बचाने के लिए है. त्रिवेंद्र सिंह रावत पर झारखंड में भाजपा के एक करीबी उद्यमी से 25 लाख रिश्वत लेने के आरोप सबूतों के साथ आए तो उन पर सीबीआई जांच का हाईकोर्ट का आदेश दबा दिया गया हैं. मामला सुप्रीम कोर्ट में है लेकिन भाजपा आलाकमान ने अंतिम क्षणों में त्रिवेंद्र सिंह को तभी कुर्सी से हटाया जब पानी सिर से गुजर गया.

विवादित मुख्य सचिव ओम प्रकाश पर लगाम कसने के लिए तीरथ सिंह रावत ने पूर्व मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह को अपना मुख्य सलाहकार नियुक्त किया है, लेकिन इससे हालात काबू हो सकेंगे, इस पर संदेह है. भाजपा व सरकार में कइयों को लगता है कि सरकार में आते ही उन्हें सबसे पहले ओम प्रकाश की जगह किसी बेदाग छवि के अधिकारी को इस पद पर बिठाना चाहिए था.

भाजपा नेतृत्व उत्तराखंड के कई संवेदनशील मामलों में आंखें मूंदता रहा है कि गैरसैण में स्थायी राजधानी घोषित करने के मामले में भी उसका यही सलूक अब तक रहा है.

राज्य बनते वक्त देहरादून को अस्थायी राजधानी घोषित करके भाजपा ने सबसे पहले गलती की और आज तक उसी गलती को ढोए जा रही है. भाजपा की राजनीति अब तीन मैदानी जिलों- देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर तक सिमटकर रह गई है.

यही वजह है इस बार सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों के सरोकारों और कार्यकर्ताओं से एकदम कटे हुए हरिद्वार के विधायक मदन कौशिक को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बना दिया गया. नीचे से उच्च स्तर तक पार्टी का एक मजबूत धड़ा इस फैसले से नाखुश है. भाजपा के एक वर्ग को वे नित्यानंद स्वामी की तरह खटक रहे हैं.

भाजपा ने 2014 और 2019 में प्रदेश की सभी पांचों लोकसभा सीटें जीती हैं. लोगों से दो-दो बार मोदी के नाम पर वोट मांगे. राज्य के विकास के सवाल विधानसभा चुनावों यहां तक कि उपचुनावों तक में दफन कर दिया गया.

इसका मूल कारण है कि भाजपा आम चुनावों से लेकर विधानसभा चुनावों में कभी भी पहाड़ों की बदहाली दूर करने के सवालों पर चुनाव नहीं लड़ती. मोदी, मंदिर और धर्म तीनों मुद्दों पर भाजपा ने आठ साल तक परिक्रमा कर ली.

अब नया शिगूफा प्रयोग में है कि कोरोना से निपटने में मोदी से जनता में गुस्सा है, इसलिए आगामी चुनावों में मोदी के बजाय उत्तराखंड में भाजपा अपने बूते पर वोट मांगेगी.

भाजपा जिस ढर्रे पर चली है, उससे कहीं नहीं लगता कि कांग्रेस गलत नीतियों से अलग हटकर प्रदेश को वाकई में बुनियादी क्षेत्रों में विकास के ऐसे आदर्श रास्ते पर ले जाएगी, जिससे इस प्रदेश की स्थापना का उद्देश्य पूरा हो सके.

राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि 20 साल बाद भी स्थायी राजधानी पर मौन, दो बार मुख्यमंत्री बदलने, पर्वतीय जिलों में बुनियादी सुविधाओं, बेरोजगारी व पलायन रोकने में नाकामी जैसे सवालों पर इस बार भाजपा और कांग्रेस दोनों की घेराबंदी होगी.

सवाल फिर वही कि क्षेत्रीय राजनीतिक विकल्प नहीं है और पर्वतीय जनता 20 साल से नाकाम सरकारों को झेलने को विवश है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)