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‘औरतों की ज़िंदगी कोख के अंधेरे से क़ब्र के अंधेरे तक का सफ़र है’

‘किसी समाज व शासन की सफलता इस तथ्य से समझी जानी चाहिए कि वहां नारी व प्रकृति कितनी संरक्षित व पोषित है, उन्हें वहां कितना सम्मान मिलता है.’

Indian Women Reuters

(फोटो: रॉयटर्स)

हाल ही में चंडीगढ़ में वर्णिका कुंडू का पीछा कर अपहरण करने की कोशिश की घटना और उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद में स्कूल जा रही रागिनी द्वारा छेड़खानी का विरोध करने के कारण बाइक सवार बदमाशों द्वारा चाकू से गोदकर उसकी हत्या करने की घटना महिला सुरक्षा के सवालों पर न केवल प्रश्न चिह्न लगाती है, बल्कि सभ्य कहे जाने वाले समाज के मुंह पर जोरदार तमाचा भी मारती है.

दोनों ही घटनाओं में घटना को अंजाम देने वाले रसूखदार परिवारों से हैं. यह भी एक तथ्य है कि इस तरह की घटनाओं से प्रतिदिन के समाचारपत्र भरे रहते हैं और संवेदनहीन होते इस समाज में दबे-दबे शब्दों में थोड़ी बहुत आलोचना के अलावा कुछ खास प्रतिक्रिया नहीं होती. और उस पर हम दावा करते हैं कि हम एक सभ्य समाज के नागरिक हैं.

परंतु मुझे लगता है कि संभवत: अभी हम बर्बर समाज, अरण्य समाज और सभ्य समाज के बीच अंतर नहीं कर पाए हैं. हम सामाजिक प्राणी हैं ऐसा तर्क देते हैं, परंतु सामाजिक संबंधों के अर्थ नहीं समझ पाए हैं.

संविधान में तो शामिल कर लिया गया कि लैंगिक आधार पर लड़का–लड़की के बीच कोई अंतर नहीं किया जाएगा परंतु उनके पैदा होते ही हम यह अंतर करना शुरू कर देते हैं.

लड़की के लिए किचन सेट, डॉल सेट, डॉक्टर सेट और लड़के के लिए बाइक, कार, पिस्तौल, सुपरमैन इत्यादि खिलौने खरीदते हैं, लड़की को घर का काम करना सिखाते हैं और लड़के को बाजार का काम करना.

हमारे यहां लड़की को बचपन से ही क्षमा, भय, लज्जा, सहनशीलता, आज्ञाकारिता जैसे गुणों को अपनाने की शिक्षा दी जाती है, जबकि लड़कों को बहादुरी, मजबूती, ताकत, भावनाओं से परे तर्कसंगतता से जोड़ा जाता है, कुल मिलकर अगर देखें तो दोनों के समाजीकरण में बहुत अंतर होता है.

शायद इसलिए अमृता प्रीतम ने यह लिखा कि ‘औरतों की जिंदगी कोख के अंधेरे से कब्र के अंधेरे तक का सफर है’.

आजादी के 70 सालों के बाद आज भी उच्च एवं संपन्न वर्ग सहित लाखों घरों में स्त्रियां शोषण एवं घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं. उनके साथ मार-पीट, शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना, उपेक्षा एवं अपमान के किस्से आए दिन प्रकाश में आते हैं.

आज भी कई स्त्रियां भयंकर तनाव और कुंठा की स्थिति में जी रही हैं. आज के कई सर्वेक्षण, अध्ययन और आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि आज भी बेटों की तुलना में बेटियों को भोजन, शिक्षा, चिकित्सा आदि सुविधाएं व देखभाल कम प्राप्त होती हैं.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2012 से 2015 तक चार सालों में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की संख्या में 34% की वृद्धि हुई है. दुष्कर्म के मामले में मप्र 4391, महाराष्ट्र 4144, राजस्थान 3644, यूपी 3025, ओडिशा 2251, दिल्ली 2199, असम 1733, छत्तीसगढ़ 1560, केरल 1256, प. बंगाल 1129 के आंकड़े चौकाते हैं. निश्चित रूप से यह एक सभ्य समाज की तस्वीर तो नहीं हो सकती.

सदियों पहले महाभारत में यह लिखा गया था कि ‘किसी समाज व शासन की सफलता इस तथ्य से समझी जानी चाहिए कि वहां नारी व प्रकृति कितनी संरक्षित व पोषित है, उन्हें वहां कितना सम्मान मिलता है.’ तो क्या हम केवल लिखने भर के लिए ही आदर्शवादी बातें लिखते हैं? उनका वास्तविक विश्व से कोई सरोकार नहीं होता?

अगर होता तो आज के दौर में नारी और प्रकृति दोनों ही खतरे में नहीं होती. संभवतः हम अपनी कथनी और करनी के अंतराल को अनदेखा करने के आदी हो चुके हैं, इसलिए लैंगिक समानता की बात कहते और लिखते तो हैं, पर अपनाते नहीं हैं.

मेरी वोल्स्टोन क्राफ्ट ने लिखा था कि ‘मनुष्य विवेकशील प्राणी है, उसकी विवेकशील प्रकृति ही स्वतंत्रता और आत्म-निर्णय के अधिकारों का स्रोत है. स्त्रियां भी निस्संदेह मनुष्य हैं. मनुष्य के नाते वे भी विवेकशील प्राणी हैं, और विवेकशील प्राणी के नाते उन्हें भी पुरुषों के समान स्वतंत्रता और आत्म-निर्णय का अधिकार है.’

लेकिन ऐसी बातें सिर्फ लिखी ही रह जाती हैं… नारी से नागरिक बनने के लिए उसे क्या करना होगा, यह एक चर्चा का विषय हो सकता है. आज बाजार का दौर है, बाजार ही समाज के सारे नियम तय करता है और विडंबना देखिए कि बाजार का कोई नियम नहीं होता.

बाजार ने तो अपनी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इस लैगिक भेदभाव की नींव को और ज्यादा गहरा कर दिया है, इसलिए लैंगिक समानता के संदर्भ में बाजार देह की मुक्ति की बात तो करता है पर मन की मुक्ति की नहीं, मन पर निगरानी रखता है ताकि मन मुक्ति का सपना भी न देख सके. तो फिर यह किस प्रकार का नारी सशक्तिकरण है जहां उसे अपने मन और अपनी देह पर भी अधिकार प्राप्त नहीं है?

समानता, स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्य, निर्णय लेने का अधिकार, सम्मानपूर्ण जीवन जीने का अधिकार तो बहुत दूर की बातें हैं. बल्कि यह और सुनने को मिलता है कि जब से महिला शिक्षित और स्वतंत्र हुई है, तब से परिवार में विघटन की स्थितियां और अधिक बढ़ी हैं, समाज विनाश के कगार पर आ खड़ा हुआ है. इसलिए महिला की शिक्षा, समानता, स्वतंत्रता की बातें भी समाज को बेमानी लगती हैं.

परिणामस्वरूप जब महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की घटनाएं सामने आती हैं तो राज्य/प्रशासन यही कहता नजर आता है कि ‘रात 12 बजे लड़की घर से बहार क्या करने गई थी?’ या ‘वे लड़के हैं, लड़कों से गलतियां हो जाती हैं, तो क्या बलात्कार मामले में फांसी दी जाएगी?’ या फिर ‘बलात्कार लड़के और लड़कियों की आपसी सहमति से होते हैं’ इत्यादि.

आत्मसमर्पण की शिक्षा केवल महिला को ही क्यों? क्या केवल पुरुषों को स्त्रियों के बारे में नियम बनाने का अधिकार है तो फिर स्त्री को पुरुष के लिए क्यों नहीं? शायद इसीलिए जॉन स्टुअर्ट मिल प्रश्न करते हैं कि ‘अगर स्त्री वर्ग को पुरुषों की भांति स्वतंत्रता होगी तो क्या मानव समाज एक बेहतर स्थिति में नहीं होगा?’

ऐसे अनेक सवाल अभी अनुत्तरित हैं? और कब तक अनुत्तरित रहेंगे, नहीं कह सकते. मेरी वूलस्टोनक्राफ्ट का यह तर्क कि ‘यदि स्त्री पुरुष को सामान शिक्षा दी जाए तो समाज में भी वे सामान अवसर प्राप्त सकेंगी’ क्या वास्तव में ऐसा हो पाया है?

एंटोनी ग्रामशी ने भी अपनी एक पुस्तक में लिखा था कि ‘राजनीतिक और सामाजिक दासतां से मुक्ति पाने की दिशा में पहला कदम दिमाग को आजाद करना है.’

संभवतः यह सत्य है, जब तक दिमाग आजाद नहीं होगा, ‘महिला स्वतंत्रता’ की बात करना बेमानी है. सही भी है, सभी मनुष्य (पुरुष-स्त्री दोनों) बुद्धिजीवी हैं/तार्किक हैं, पंरतु सभी के दिमाग आजाद नहीं है इसलिए सभी समाज में बुद्धिजीवियों की भूमिका का निर्वाह नहीं कर पाते हैं.

महिलाओं को हमेशा से ही ज्ञान के प्रभावशाली वाद-विवाद से बाहर रखा गया और हाशिए पर डाल दिया गया ताकि उनकी आवाज को असंगत कह कर दबाया जा सके.

परंतु इतिहास की व्याख्या सही मायने में तब शुरू होगी जब उनके विचारों, समझ और दृष्टिकोण को मिलाया जाएगा. उनकी आजादी, निर्णय लेने की क्षमता, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने के लिए उन पर अनैतिक होने का आरोप लगाया जाता है.

यहां एक प्रश्न किया जा सकता है कि क्या नैतिकता के मायने सिर्फ महिलाओं के लिए हैं? पुरुषों के लिए क्यों नहीं हैं? समाज के दोहरे मानदंड को बदलने का समय कब आएगा? कब हम नैतिकता को हथियार बनाकर महिलाओं को हाशिए पर खदेड़ना बंद करेंगे?

सिमोन द बोउवार ने इसी संदर्भ में यह तर्क दिया था कि ‘जीवन क्या है’ को महिला कभी समझ ही नहीं पाती, क्योंकि उसे शुरू से ही स्वतंत्र परिवेश से पृथक रखा जाता है और ‘निर्भरता’ से जीवन में संतुष्टि मिलती है, का विचार उसकी चेतना का हिस्सा बना दिया जाता है.

इसलिए आज 21वीं सदी में भी महिलाएं रसोई, कपड़े, बच्चे, पति का जॉब, इत्यादि पर तो चर्चा कर सकती हैं, परंतु राजनीति, अंतरराष्ट्रीय मुद्दों, वित्तीय मामलों और सेक्स जैसे विषयों पर खुलकर नहीं बोल सकतीं.

महिलाओं को इन सब पक्षों पर चर्चा करने का साहस करना ही होगा, उसे पारिवारिक परिवेश से बाहर की समस्याओं पर सामने आना होगा तभी संभवतः हम एक बराबरी के समाज का निर्माण कर सकें.

(लेखिका कोटा में समाजशास्त्र की शिक्षक हैं.)