कोविड-19

कोविड-19 और उत्तर प्रदेश: साक्षात नरक में वो छह सप्ताह…

कोरोना महामारी की घातक दूसरी लहर के दौरान जहां जनता तमाम संकटों से जूझ रही थी, वहीं योगी आदित्यनाथ की सरकार एक अलग वास्तविकता की तस्वीर पेश कर रही थी.

मई 2021 में बिजनौर के एक सरकारी अस्पताल के कोविड-19 वॉर्ड में मरीजों के साथ स्वास्थ्य कर्मी. (फोटो: रॉयटर्स)

मई 2021 में बिजनौर के एक सरकारी अस्पताल के कोविड-19 वॉर्ड में मरीजों के साथ स्वास्थ्य कर्मी. (फोटो: रॉयटर्स)

अगले साल की शुरुआत में होनेवाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर उत्तर प्रदेश नरेंद्र मोदी सरकार के कोविड-19 महामारी प्रबंधन पर जनता की प्रतिक्रिया को समझने का सबसे महत्वपूर्ण मानक बन गया है. पंचायत चुनावों के नतीजों ने पहले ही यह संकेत दिया है कि मोदी के बाद भाजपा के सबसे ज्यादा परिचित चेहरे आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली यूपी सरकार पर जनता गंभीर सवाल उठा रही है.

महामारी के दौरान आदित्यनाथ द्वारा राज्य के प्रबंधन को लेकर जनता के बीच बढ़ रहे असंतोष के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी हालात का जायजा लेने पर मजबूर होना पड़ा. यह एक तरह से सोशल मीडिया पर रिपोर्टर और नागरिकों द्वारा पिछले छह हफ्तों के दौरान बताई जा रही जमीनी हकीकत को देर से ही सही स्वीकार करने की तरह था.

इस दौरान जब वायरस पूरे उत्तर प्रदेश में कहर बरपा रहा था, मैंने भारत के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य के घटनाक्रमों का रोजनामचा तैयार करना शुरू किया.

इनमें से कुछ कहानियां पहले कही जा चुकी हैं, कुछ नहीं कही गई हैं, लेकिन हफ्ते दर हफ्ते के हिसाब से इनको साथ रखकर देखने पर- और महामारी के सबसे खराब दौर में मुख्यमंत्री द्वारा अपने ट्विटर फीड पर किए जाने वाले दावों के सामने इन्हें रखने पर- ये उत्तर प्रदेश में आई त्रासदी पर पड़ी चादर को उघाड़कर रख देते हैं.

12 अप्रैल से 18 अप्रैल:

जब मौतें बढ़ने लगीं, तब सीएम के ऑफिस ने ट्वीट किया, ‘कोविड से घबराने की कोई जरूरत नहीं है…’

शहरी गरीबों के बीच काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और विज्ञान फाउंडेशन के सचिव संदीप खरे कहते हैं, ‘राज्य काफी पहले ही मुसीबत में घिर चुका था, लेकिन जमीन से रिपोर्ट आने में वक्त लग रहा था. 12 अप्रैल के आते-आते रसातल की तरफ हमारी फिसलन शुरू हो गई और हर नए दिन ने अब तक की सबसे बड़ी उछाल को दर्ज करना शुरू कर दिया.’

14 अप्रैल को आदित्यनाथ के कोरोना संक्रमित होने की पुष्टि हुई. यह पंचायत चुनाव का पहला दिन था और इसका चुनाव प्रचार रुक गया था. लेकिन, इस चुनाव ने राज्य में वायरस के फैलाव में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी. इसी दिन उत्तराखंड के हरिद्वार में चल रहे महाकुंभ का तीसरा शाही स्नान भी था.

इसके ठीक अगले दिन मुख्यमंत्री के आधिकारिक हैंडल से यह ऐलान किया गया, ‘कोविड से घबराने की कोई जरूरत नहीं है, उत्तर प्रदेश सरकार आपके साथ है.’ इस संदेश के साथ एक हेल्पलाइन नंबर भी दिया गया था जिस पर ‘ज्यादा जानकारी पाने के लिए’ फोन किया जा सकता था.

इस ट्वीट ने आने वाले दिनों- जब कथनी और जमीनी हकीकत दोनों एक दूसरे से बिल्कुल अलग थे- की होने वाली एक तस्वीर खींच दी.

ये हेल्पलाइन नंबर राज्य के इंटीग्रेटेड कमांड सेंटरों, जहां कोविड-19 मरीजों के परिवार वाले मदद मांग सकते थे, का हिस्सा थे. इन नंबरों का इस्तेमाल सरकारी अस्पतालों में दाखिल मरीज भी उन्हें उनकी जरूरत की दवाई न मिलने या डाक्टरों द्वारा उन्हें प्राइवेट विक्रेताओं से दवाई खरीदने की सलाह दिए जाने आदि की शिकायत करने के लिए कर सकते थे. अगले दो हफ्तों तक मुख्यमंत्री के आधिकारिक हैंटल से लगातार हेल्पलाइन नंबरों के बारे में ट्वीट किए जाते रहे.

उन नंबरों को मिला पाना नामुकिन था. जिस दिन आदित्यनाथ कोरोना संक्रमित हुए, उसी दिन एक वरिष्ठ पत्रकार विनय श्रीवास्तव की भी तबियत खराब होनी शुरू हो गई. उनके 31 साल के बेटे रचित श्रीवास्तव उनकी मौत से पहले के घटनाक्रम को याद करते हैं. इसका रोजनामचा पत्रकारों के ही नहीं, उनके पिता के अपने ट्विटर फीड पर भी मिलता है.

परिवार ने पहले इसे स्पौंडिलाइटिस का अटैक समझा, लेकिन फिर विनय को बुखार चढ़ आया. 16 अप्रैल तक उनका ऑक्सीजन लेवल 90 के ऊपर था, लेकिन उस शाम यह गिरकर 57 पर आ गया. ‘हमें ऑक्सीजन की जरूरत थी. हमने सरकार और सीएम द्वारा प्रचारित किए गए सभी हेल्पलाइन और कमांड सेंटर नंबरों पर फोन किया, लेकिन हमें कुछ नहीं मिला.’

रचित को अपने ससुराल वालों से एक ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर्स मिल गया, लेकिन यह स्पष्ट था कि उनके पिता को ज्यादा तीव्रता वाली ऑक्सीजन सप्लाई और उचित मेडिकल हस्तक्षेप की जरूरत होगी. आरटी-पीसीआर टेस्ट के बगैर किसी अस्पताल में उन्हें दाखिला भी नहीं मिलता.

रचित याद करते हैं, ‘आखिरकार टेस्ट कराने का इंतजाम हो गया, लेकिन पापा का ऑक्सीजन स्तर काफी तेजी से गिर रहा था. हम पापा को लेकर बलरामपुर अस्पताल गए. यह एक बड़ा कोविड अस्पताल था जिसकी घोषणा मुख्यमंत्री ने काफी धूमधाम के साथ की थी. लेकिन गार्ड ने हमें बाहर से ही भगा दिया. उसके बाद हम सीएमओ के ऑफिस गए, वहां हमें लालबाग के कोविड सेंटर में जाने के लिए कहा गया, जहां के अधिकारियों ने हमें बताया कि वे हमारे लिए कुछ नहीं कर सकते हैं. मेरे पिताजी, जिनकी स्थिति तेजी से खराब हो रही थी, को मजबूर होकर यह ट्वीट करना पड़ा कि वे 65 साल के हैं, उन्हें स्पौंडिलाइटिस है और उनका ऑक्सीजन स्तर गिरकर 52 पर आ गया है, लेकिन कोई अस्पताल, कोई लैब या डॉक्टर हमारा फोन नहीं उठा रहा था.’

वे आगे कहते हैं, ‘अपने पिता के लिए ऑक्सीजन बेड का इंतजाम करने में नाकाम रहकर डर और बेबसी के साथ शनिवार की रात को मैं घर लौट गया. घर में इंतजाम किए गए ऑक्सीजन से किसी तरह से सांस लेते हुए मेरे पिता ने हमें साथ बैठकर रात का खाना खाने के लिए कहा. उन्होंने अभी एक रोटी किसी तरह खाई ही थी कि उन्होंने हमारी तरफ देखा और वे निढाल होकर गिर गए. उनकी मृत्यु हो गई थी. उनका आरटी-पीसीआर टेस्ट परिणाम अगले दिन 17 अप्रैल को आया. वे कोविड पॉजिटिव थे.’

परिवार को तोड़कर रख देने वाली उस त्रासदी को याद करते हुए रचित कहते हैं,‘ मेरे पिता के बाकी सभी मेडिकल पैरामीटर नियंत्रण में थे. कोविड-19 ने उनकी जान नहीं ली. अगर उन्हें बुनियादी चिकित्सा मिल गई, अगर प्रशासन ने थोड़ा सा ध्यान दिया होता, तो वे आज जिंदा होते. सरकार ने कभी यह नहीं माना कि कुछ भी गलत है या किसी चीज की कोई कमी है. जहां एक तरफ लोग मरते रहे वहीं मुख्यमंत्री के बयान और भी ज्यादा चुभने वाले और अप्रिय होते गए. ये हम सबका, जो मुसीबत में थे, जो मर रहे थे, जो दुखी थे, एक तरह से मजाक बनानेवाले थे.’

सिर्फ एक दिन पहले ही आदित्यनाथ के ऑफिस ने ट्वीट किया था कि मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि बिस्तरों या ऑक्सीजन की कमी नहीं होनी चाहिए.

यह आने वाले हफ्तों में मुख्यमंत्री के शासन के तौर-तरीके का मॉडल बनने वाला था- जहां उनके दफ्तर की तरफ से ऐसे हवाई निर्देश दिए गए, जिनका जमीनी हकीकत से कोई तालमेल नहीं था. और मुख्यमंत्री के दफ्तर से किए जानेवाले ज्यादातर ट्वीटों में उनके लिए प्रयोग किया जाने वाला संबोधन अपने आप में इस बात का संकेत था कि वे सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं बल्कि ‘जी महाराज’ (आदरणीय राजा) थे.

18 अप्रैल के आते-आते राज्य का सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य सबसे बुरी तरह से प्रभावित राज्य के तौर पर उभर रहा था. अपनी बदहाली के लिए कुख्यात राज्य का स्वास्थ्य ढांचा चरमरा कर गिर गया था.

राज्य के स्वास्थ्य आंकड़ों के लिए अकेले सिर्फ वर्तमान सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, लेकिन वर्तमान संकट का सामना करने में नाकाम रहने के लिए सिर्फ यही अकेले जिम्मेदार है. दो लाख की आबादी वाले शहर बहराइच का केस काफी कुछ बयान करता है.

दो साल पहले बहराइच तब सुर्खियों में आया था जब अगस्त-सितंबर 2018 के बीच यहां के जिला अस्पताल में 70 बच्चों की मौत हो गई थी. एक सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार सलीम सिद्दीकी ने उस संकट को नजदीक से देखा था.

‘(उस समय) अस्पताल में बिस्तरों से लेकर, दवाइयों, स्टाफ, ऑक्सीजन तक- हर चीज की कमी थी जो बच्चों की मौत की वजह बनी. प्रशासन ने इससे इनकार किया, लेकिन सच्चाई हर किसी के आंखों के सामने थी- जिला अस्पताल उस समय संकट से निपटने के लिए जरूरी संसाधनों से लैस नहीं था.’ तब से अब तक कुछ नहीं बदला है.’

सलीम बताते हैं, ‘सभी अस्पतालों में मिलाकर 5 से ज्यादा वेंटिलेटर नहीं हैं. बहराइच के मुख्य जिला अस्पताल में 30 वेंटिलेटर रखे हुए हैं, लेकिन उनमें से सिर्फ 5 काम कर रहे थे. बाकियों को इंस्टॉल नहीं किया गया है.’

बहराइच कोई अपवाद नहीं है. राज्यभर में यही कहानी दुहराई जा रही थी. अगस्त, 2020 में गोंडा में मुख्यमंत्री ने एक 160 बिस्तरों के कोविड अस्पताल का उद्घाटन किया था. इसका निर्माण टाटा ट्रस्ट और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से किया गया था, जिन्होंने 200 करोड़ रुपये का निवेश किया था.

गोंडा का जिला अस्पताल. (फोटो: अनुराग कुमार सिंह)

गोंडा का जिला अस्पताल. (फोटो: अनुराग कुमार सिंह)

2021 में कोविड-19 की दूसरी लहर आई, उस समय तक ज्यादातर मशीनें यहां तक कि वेंटिलेटरों की भी पैकिंग तक नहीं खोली गई थी. इससे अलावा इन जीवन रक्षक मशीनों को चलाने के लिए वहां कोई टेक्निशियन नहीं था. क्योंकि उनकी बहाली ही नहीं हुर्ह थी.

गोंडा के पत्रकार अनुराग कुमार सिंह कहते हैं, ‘अप्रैल के अंत में जाकर टेक्निशियनों की तत्काल बहाली के लिए नोटिस भेजा गया. तब तक कई लोग अपनी जान गंवा चुके थे.’

इन अनगिनत डरावनी कहानियों के बीच, एक कहानी कभी न भुलाई जा सकने वाली थी. बहराइच अस्पताल में एक लड़की ऑक्सीजन के लिए तड़पती अपनी मां को लेकर आई. जब उसने देखा कि ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं है, तब उसने अपनी मां की जान बचाने की आखिरी कोशिश के तहत अपने मुंह से अपनी मां के मुंह में सांस देने की कोशिश की. लेकिन उसकी मां नहीं बची.

ऐसे दृश्यों के बीच, जब राज्यभर में ऑक्सीजन और अस्पताल के बेडों की भीषण कमी थी, मुख्यमंत्री के आधिकारिक हैंडल से घोषणा की गई, ‘कोविड अस्पतालों में नहीं होगी संसाधनों की किल्लत।’

20 अप्रैल से 27 अप्रैल:

जब अस्पतालों में ऑक्सीजन खत्म हो रही थी, मुख्यमंत्री कार्यालय कह रहा था ‘कोई कमी नहीं है’

 

एक तरह से यह उत्तर प्रदेश के लिए सबसे खराब सप्ताह था, लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय से किए गए अंतहीन ट्वीट इस तथ्य से अनजान नजर आए.

23 अप्रैल को मुख्यमंत्री घोषणा कर रहे थे, ‘ऑक्सीजन की कमी नहीं है, सप्लाई चेन को दुरुस्त करें.’

24 अप्रैल को मुख्यमंत्री ने ऐलान किया कि घर पर आइसोलेशन में रह रहे लोगों को भी जरूरत पड़ने पर ऑक्सीजन मुहैया कराया जाएगा.

25 अप्रैल के एक ट्वीट में, जिसने देशभर में आक्रोश को जन्म दिया, मुख्यमंत्री ने ऐलान किया कि राज्य में ऑक्सीजन, हॉस्पिटल बेडों या दवाइयों की कोई कमी नहीं है.

जो लोग वास्तव में ऑक्सीजन की मांग से जूझ रहे थे, वे हालात की एक अलग ही कहानी बयान करते हैं. मैंने राज्य के सबसे बड़े ऑक्सीजन प्लांट के एक कर्मचारी से बात की, जिन्होंने सरकारी गाज गिरने के डर से अपना नाम न उजागर करने की इच्छा जताई है.

उनके मुताबिक, देश को जब इस संकट की गंभीरता का पता लगा, उससे पहले ही प्लांट में लोगों हालात के काफी बिगड़ जाने का अंदाजा हो गया था. 5 अप्रैल से ही ऑक्सीजन सिलेंडर की खोज कर रहे या उसमें गैस भराने वाले लोगों की लाइन प्लांट के बाहर लगने लगी थी. इनमें से ज्यादातर परिवार वाले लोग हुआ करते थे.

इन व्यक्ति ने यह भी बताया, ‘हम में से ज्यादातर को इस संकट से निपटने के लिए ड्यूटी पर लगाया गया. ऑक्सीजन के लिए आने वाले लगभग हर व्यक्ति के घर में संक्रमित सदस्य था. कई कर्मचारी कोरोना संक्रमित हुए. यहां तक कि हमने दो सहकर्मियों को भी गंवा दिया.’

10 अप्रैल के आते-आते अस्पतालों से ऑक्सीजन खत्म होने लगा था. प्राइवेट गैस एजेंसियों में भी गैस समाप्त हो रहा था. ‘हमारे ऑक्सीजन प्लांट के सामने लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी. हमने इससे पहले ऐसा कुछ भी नहीं देखा था.’

इन कर्मचारी ने बताया, ‘19 अप्रैल को सरकार ने हमें प्राइवेट विक्रेताओं या निजी व्यक्तियों को ऑक्सीजन सप्लाई करने से रोक दिया. यह सुनिश्चित करने के लिए प्लांट में सुरक्षाकर्मियों को तैनात कर दिया गया. प्रशासन ने प्लांट को अपने कब्जे में ले लिया था. अगले कुछ दिनों में जो कुछ भी हुआ उसे बस तानाशाही कहा जा सकता है. ऑक्सीजन की खोज में आने वाले मुसीबत में फंसे व्यक्ति को पुलिस मारकर भगा देती थी. यह साफ था कि ऑक्सीजन की तलाश में आने वाले ये लोग कालाबाजारी करने वाले नहीं थे.’

इलाहाबाद के एक प्लांट में ऑक्सीजन की लाइन में लगे मरीजों के परिजन. (फोटो: पीटीआई)

इलाहाबाद के एक प्लांट में ऑक्सीजन की लाइन में लगे मरीजों के परिजन. (फोटो: पीटीआई)

काउंटर पर काम करते हुए इन व्यक्ति ने लोगों को गिड़गिड़ाते हुए देखा, लोग हाथ जोड़कर कहते थे, ‘कृपया एक सिलेंडर भर दीजिए, इससे मेरी मां, मेरी पत्नी, या मेरी बहन या मेरे बच्चे की जान बच जाएगी. हमारे प्लांट ने यह फैसला किया कि हम जिनकी मदद कर सकते हैं, उनकी मदद करते रहेंगे. प्लांट के नजदीक गेस्ट हाउस से हमने लोगों को जब भी भी हमसे हो सका जरूरतमंद लोगों को ऑक्सीजन की आपूर्ति करना जारी रखा.’

इन सबके बीच मुख्यमंत्री पर्याप्त ऑक्सीजन होने का दावा करते रहे और मुसीबत के मारे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की धमकी देते रहे. ऐसा करते हुए उन्होंने मुनाफाखोरी करने वालों और वास्तव में जरूरतमंद लोगों के बीच कोई फर्क नहीं किया.

हालात इतने बिगड़ गए कि अस्पतालों ने ऑक्सीजन न होने का नोटिस बाहर चिपकाकर रिश्तेदारों से अपने मरीज को किसी दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने के लिए कहना शुरू कर दिया. 26 अप्रैल को नयति हेल्थकेयर ने एक मदद मांगने वाला ट्वीट यह करते हुए किया कि नयति मेडिसिटी, मथुरा में 144 कोविड पॉजिटिव मरीजों के जीवन पर खतरा है.’

उस शाम 5:30 बजे के करीब हॉस्पिटल के कॉरपोरेट अफेयर्स के निदेशक एमके सरना ने मुझे बताया, ‘हमारा ऑक्सीजन 8 बजे तक, ज्यादा से ज्यादा 9 रात बजे तक समाप्त हो जाएगा, जबकि हमें कहा गया है कि ऑक्सीजन टैंकर आधी रात के बाद दो बजे तक ही पहुंच पाएगा.’

अस्पताल जहां तक हो सके, ऑक्सीजन का जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन सरना इस बात को लेकर साफ थे कि अगर ऑक्सीजन समय रहते नहीं पहुंचा तो एक बड़ी तबाही आएगी. ‘हमारे पास ऐसे मरीज हैं जो बिना ऑक्सीजन के एक मिनट भी नहीं जिंदा रह पाएंगे. मैंने सीएमओ (चीफ मेडिकल ऑफिसर) से मरीजों को मथुरा के दूसरे अस्पतालों में भेजने का अनुरोध किया है, लेकिन उनका कहना है कि सभी आईसीयू बेड भरे हुए हैं. इसके अलावा किसी के पास भी ऑक्सीजन नहीं है.’

ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया पर मची चीख-पुकार ने प्रशासन पर काफी दबाव डाला जिसने, जैसा कि सरना बताते हैं, टैंकर के आने तक जरूरत को पूरा करने के लिए अस्पताल को 70 ‘सिलेंडरों की मदद पहुंचाई।’

आगरा में शहर के नागरिकों के ऑक्सीजन सहायता समूह के एक प्रमुख सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता नरेश पारस ने ऑक्सीजन की कमी का नोटिस पोस्ट करने वाले अस्पतालों की सूची तैयार की थी. उन सबमें मिला-जुलाकर एक ही बात कही गई थी.

27 अप्रैल को शहर के लोहामंडी इलाके के जीवन ज्योति हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर ने एक नोटिस लगाया जिसमें कहा गया था, ‘संबंधित अधिकारियों से अनुरोध करने के बाद भी ऑक्सीजन की सतत आपूर्ति बहाल रख पाना संभव नहीं है.’ इस नोटिस में आगे ऑक्सीजन सपोर्ट वाले सभी मरीजों के परिजनों को अगले एक घंटे में अपने मरीजों को ट्रांसफर करने का आग्रह किया गया.

उस रात तक आठ अस्पतालों और नर्सिंग होम ने इस तरह के नोटिस लगाए थे. लगभग सबमें ऑक्सीजन प्रभारी की तरफ से ये डरावनी पंक्ति लिखी हुई थी: ‘हमारे पास सिर्फ दो घंटे का बैकअप है.’

संकट की इस घड़ी में मामले के सबके सामने आने पर जहां स्थानीय प्रशासन ने अपने स्तर पर यथासंभव थोड़ी-बहुत मदद की, वहीं इसकी प्रतिक्रिया में राज्य सरकार ने संकट के बारे में सूचनाओं को ही दबाने का फैसला किया.

तथ्य यह है कि 22 अप्रैल से मुख्यमंत्री उनके हिसाब से अफवाह फैलाने और कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ की गई कार्रवाई को ट्वीट कर रहे थे. इस संदर्भ में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) लगाने और संपत्ति की कुर्की की धमकी का इस्तेमाल किया गया.

जब ऑक्सीजन संकट के नोटिस स्वास्थ्य केंद्रों पर चस्पा होने लगे, मुख्यमंत्री ने उन्हें भी इसी तरह की कार्रवाई का दर दिखाया। 5 मई को लखनऊ के सन हॉस्पिटल के खिलाफ केस दर्ज किया गया. एफआईआर के अनुसार, अस्पताल के ऑक्सीजन की कमी के नोटिस का उद्देश्य अफवाह और डर फैलाना था जिससे कालाबाजारी को बल मिलता।

जहां कई अस्पताल आधिकारिक तौर पर बयान नहीं देना चाहते थे, वहीं आईसीयू में बड़ी संख्या में लोगों पर मौत का खतरा मंडराता देखकर कइयों ने मदद की पुकार वाले (एसओएस) मैसेज पोस्ट करना जारी रखा.

 

निश्चित तौर पर साधारण नागरिकों पर निशाना बनाना ज्यादा आसान था. 25 अप्रैल को 26 वर्षीय शिव सिंह यादव पर सोशल मीडिया में ‘आपत्तिजनक पोस्ट’ करने के लिए एक एफआईआर दायर की गई.

यादव के मुताबिक, 25 अप्रैल की रात को काफी संख्या में पुलिस वाले इलाहाबाद के धनुआ गांव में उनके पैतृक घर पर आ धमके. उन्हें घर पर न पाकर पुलिसवालों ने उनके बड़े भाई धनराज को ही उठाकर ले गए और उन्हें नैनी पुलिस स्टेशन में 15 घंटों तक हिरासत में रखा. धनराज को हिरासत में रखने का कोई कारण नहीं बताया गया. उन्हें अगले दिन चेतावनी देकर छोड़ दिया गया और यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया कि उनका भाई सोशल मीडिया पर अपने पोस्टों को लेकर नियंत्रण रखेगा।

यादव कोविड-19 की प्रलयंकारी आपदा और इस संकट से निपटने में सरकारी नाकामी को लेकर पोस्ट कर रहे थे. यादव पर धार्मिक भावनाओं पर चोट पहुंचाने का भी आरोप लगाया गया.

यादव, जो समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता भी हैं, पूछते हैं, ‘आखिर सच बोलना या वैध सवाल पूछना या जवाबदेही की मांग करना किसी धर्म के खिलाफ कैसे है? अगर ऐसा है तो क्या सरकार मुझे बता सकती है कि किस धर्म की भावनाओं को चोट पहुंची है? हर किसी को पता है कि मुख्यमंत्री विरोधियों के पीछे पड़ जाते हैं, लेकिन वे पूरे राज्य को कैसे चुप कराएंगे? आप आवाजों को दबा सकते हैं, मगर आप मृत शरीरों को नहीं छिपा सकते हैं.’

28 अप्रैल से 11 मई

‘मैंने सभी हेल्पलाइन नंबरों, डीएम के नंबरों पर कोशिश की, लेकिन सब व्यर्थ था.’

28 अप्रैल को आदित्यनाथ के दफ्तर ने ट्वीट किया कि सरकार यह सुनिश्चित करेगी मरीजों को हॉस्पिटल बेड, ऑक्सीजन और दवाइयां दिलाई जाएं.

1 मई को मुख्यमंत्री के दफ्तर ने ट्वीट किया कि भारत सरकार द्वारा 50,000 इंजेक्शनों का आवंटन राज्य में रेमडेसिविर की सुचारू आपूर्ति सुनिश्चित कराएगा.

उसी दिन सीएमओ के हैंडल ने ट्वीट करके एक निर्देश जारी किया कि डिमांड-सप्लाई और वितरण की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से पूरा करके सभी जिलों में उपलब्ध कराया जाना चाहिए.

यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसे किसी निर्देश- जो साफतौर पर जनता के लिए न होकर सरकारी विभागों के लिए जारी किया गया था- को सरकार द्वारा सीधे क्रियान्वित करने की जगह ट्वीट क्यों किया गया. इसके पीछे बस एक तर्क हो सकता है कि सरकार बस यह छवि बनाना चाहती थी कि कोविड-19 के मरीजों की मदद करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं.

लेकिन, सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री के आशावाद के बावजूद जमीन पर हालात में कोई खास सुधार नहीं हुआ था. 30 मई के आसपास नेहा यादव के पिता और उनके दो भाइयों में कोविड-19 संक्रमण के लक्षण दिखाई देने लगे.

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में न्यूट्रिशनल साइंस की छात्रा नेहा इस वक्त बरेली में अपने घर में थी. उसने अपनी मां को एक कमरे में आइसोलेट रहने के लिए कहा और परिवार के लिए मेडिकल सहायता का इंतजाम करने की कोशिश की.

महामारी के दूसरी लहर के दौरान कानपुर का एक अस्पताल. (फोटो: पीटीआई)

महामारी के दूसरी लहर के दौरान कानपुर का एक अस्पताल. (फोटो: पीटीआई)

वह अगले दो हफ्तों के दहशत भरे दौर को याद करती है, ‘कोविड-19 टेस्ट करवाना काफी मुश्किल था. इसमें एक हफ्ते तक का वक्त लग जा रहा था और मेरे जैसे पढ़े-लिखे लोग ही उसके लिए रजिस्टर करवा पा रहे थे. लेकिन टेस्ट से पहले ही मेरे पिता और मेरे एक भाई को सांस लेने में दिक्कत होने लगी. हमने उनका सीटी स्कैन करवाया और उसकी रिपोर्ट से साफ पता चल रहा था कि उन सबको निमोनिया है. डॉक्टर ने कहा कि हमें उन्हें ऑक्सीजन पर रखने की जरूरत है.’

उसने उन अस्पताल बेडों की खोज शुरू की, जिसका वादा मुख्यमंत्री ने लोगों से किया था. ‘चूंकि हम आरटी-पीसीआर टेस्ट नहीं करवा पाए थे, इसलिए कोविड-19 अस्पताल में दाखिला नहीं मिला. मैं उन्हें एक प्राइवेट अस्पताल में बेड दिलवा पाई. उन्होंने कहा कि उनके पास ऑक्सीजन नहीं है- यह उस समय की बात है, जब यह मान लिया गया था कि अब ऑक्सीजन संकट समाप्त हो गया है क्योंकि मुख्यमंत्री यह घोषणा कर रहे थे कि ऑक्सीजन एक्सप्रेस या दूसरे उपायों से राज्य में ऑक्सीजन इफरात मात्रा में उपलब्ध हो गया है.’

जिस ऑक्सीजन का वादा आदित्यनाथ ने किया था, उसका इंतजाम कर पाना भी आसान नहीं था,‘ मेरे पास अस्पताल की चिट्ठी थी, जिसे लेकर मैं नोडल ऑफिसर इंचार्ज के पास गई, जिन्होंने मुझे डीएम के ऑफिस भेज दिया, जहां दो डॉक्टरों और कुछ अधिकारियों वाला एक कोविड सेंटर था. उनमें से एक ने कहा कि वे अपने परिवार के सदस्यों के लिए भी ऑक्सीजन का इंतजाम नहीं करवा पाए. उन्होंने मुझे कोविड-19 अस्पताल में जाने की सलाह दी. मैं जिला अस्पताल के मुख्य कोविड सेंटर गई, लेकिन आरटी-पीसीआर टेस्ट नहीं होने के कारण हमें वहां से वापस भेज दिया गया. उन्होंने सीटी स्कैन की रिपोर्ट को स्वीकार करने से इनकार कर दिया जिनमें स्पष्ट तौर पर फेफड़े में नुकसान दिखाई दे रहा था. संयोग से मेरा संपर्क एक स्थानीय कंपनी में था जहां से आखिर में हमारे लिए ऑक्सीजन सिलेंडरों का इंतजाम हो सका.’

डॉक्टरों द्वारा लिखे गए रेमडेसिविर की खोज करना भी इससे आसान नहीं था. ‘मैं पर्चे के साथ ड्रग इंस्पेक्टर के पास गई जिसने मुझे सीएमओ के पास जाने के लिए कहा, जिन्होंने मुझे कमिश्नर के पास भेज दिया. ड्यूटी पर तैनात कोविड अधिकारियों ने मुझे कभी भीतर नहीं घुसने दिया.’

उन्होंने बताया, ‘मेरे इस मुश्किल समय में फंसने से हफ्ते भर पहले मुख्यमंत्री ने ट्वीट किया था कि कि प्रशासन को होम आइसोलेशन और अस्पतालों में रह रहे लोगों से सीएम हेल्पलाइन के जरिये नियमित संपर्क में रहना चाहिए.’

इस ट्वीट के अनुसार मुख्यमंत्री ने इसकी निगरानी की जिम्मेदारी स्वास्थ्य मंत्री को दी थी.

‘मैंने हर एक हेल्पलाइन नंबर पर, डीएम के नंबरों को मिलाने की कोशिश की, लेकिन सब बेकार. जरूरतमंद लोगों की देखरेख कहां हो रही थी? उन नंबरों से सिर्फ यह पूछने के लिए फोन किया गया क्या हम होम आइसोलेशन में हैं और यह बताया गया कि हमें मास्क पहनना चाहिए.’ क्या इसे ही संवाद कहते हैं? मेरे पिताजी ने कहा कि हमें रेमडेसिविर की जरूरत है, लेकिन उन्होंने कभी दोबारा फोन नहीं किया. हमारी मदद लोगों ने की और ट्रामा और नरक से गुजरने के अनुभव के बावजूद, मुझे लगता है कि मैं खुशकिस्मत हूं कि मेरे भाई और पिता सब आज जिंदा हैं.’

दूसरे लोग इतने खुशकिस्मत नहीं थे. शुरू में मौतें महामारी के प्रसार से पीछे चल रही थीं, मगर उसके बाद चारों तरफ शवों का अंबार लग गया. फुटपाथों पर दाह-संस्कार से लेकर श्मशान घाटों के बाहर लंबी कतारों की खबरें उत्तर प्रदेश के हर शहर और कस्बे से आने लगीं.

जैसा कि वाराणसी के डोम समुदाय की परंपरा है, राजू के परिवार ने पीढ़ियों से दाह-संस्कार का काम किया है. ‘यह वह जगह है जहां परिवार वाले अपने प्रियजनों को दूसरी दुनिया की यात्रा के लिए विदा करने के लिए आते हैं. लेकिन काशी में मृत लोगों के लिए जगह कम पड़ गई. अप्रैल की शुरुआत से हम हर दिन 100 से 200 लोगों को जला रहे हैं. आज दाह-संस्कार करने के लिए कोई जगह बची नहीं रह गई है.’

हर जगह मृत लोग नजर आने लगे. पहले कोविड मृतकों का दाह-संस्कार और दफनाने के संघर्ष की तस्वीरों में और उसके बाद नदी में तैरते शवों की सिहरा देने वाली तस्वीरों में.

लेकिन मुख्यमंत्री के आधिकारिक ट्विटर हैंडल ने खुद को 23 अप्रैल जैसे एकाध ट्वीट तक सीमित रखा, जिसमें कहा गया था कि ‘मृतकों का अंतिम संस्कार गरिमा और धार्मिक नियमों के हिसाब से सुनिश्चित किया जाना चाहिए.’

10 मई से 18 मई:

जब गंगा में सैकड़ों लाशें बह रही थीं, उस समय मुख्यमंत्री का कार्यालय #योगीजी_का_यूपी_मॉडल के लिए अपनी पींठ ठोंक रहा था

11 मई को, मुख्यमंत्री के कार्यालय ने यह ट्वीट किया कि मुख्यमंत्री ने जगत के कल्याण के लिए रुद्राभिषेक कराया  है. इसकी व्यापक रिपोर्टिंग भारत को कोविड-19 से मुक्ति दिलाने की कोशिश के तौर पर की गई.

मुख्यमंत्री का आधिकारिक ट्विटर हैंडल भी उत्तर प्रदेश के कोविड प्रबंधन के तारीफों के पुल बांधने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहा था. यह काम आनेवाले कुछ हफ्तों तक जारी रहा.

विश्व स्वास्थ्य संगठन और नीति आयोग का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री के दफ्तर ने ट्वीट किया कि ‘योगी आदित्यनाथ जी महाराज के सक्षम नेतृत्व में दवाई, कड़ाई, संयम और परिस्थिति के अनुसार लिए गए निर्णयों से पर हम जल्दी ही कोरोना महामारी को हराने में कामयाब होंगे. हैशटैग योगीजी का यूपी मॉडल.

इस ट्वीट में मुख्यमंत्री ने यह दावा किया था कि गांवों को संक्रमण से बचाने के लिए वर्तमान में बड़े पैमाने पर घर-घर जांच की जा रही है. इस अभियान का सकारात्मक नतीजा निकल रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन और नीति आयोग ने भी इस अभियान की तारीफ की है.

इस दावे का परीक्षण करते हुए फैक्टचेकरडॉटइन ने यह निष्कर्ष निकाला कि यह यह तारीफ मुख्यमंत्री के लिए नहीं थी; विश्व स्वास्थ्य संगठन बस अपने काम की नुमाइश कर रहा था.

लखनऊ के राजनीतिक टिप्पणीकार सागर यादव कहते हैं कि एक ऐसे समय में जब राज्य हर दिन मौत के तांडव को देख रहा था, इस तरह से अपनी पीठ ठोंकना काफी अश्लील और भद्दा था.

पंचायत ड्यूटी पर लगाए गए शिक्षकों की मौत हुई थी. कुंभ मेले से लौटने वालों की मौत हुई थी. जो लोग मेडिकल मदद मिल जाने से बच सकते थे, उनकी मौत हो गई थी. कुछ गांवों में तो 60 से 100 लोग तक मर रहे थे. मृत्यु का तांडव हर जगह देखा जा सकता था. मृतकों को शव गंगा में तैर रहे थे. उन्हें बालू में दफना दिया गया था. और इन सबके बीच में मुख्यमंत्री हर संभव तरीके से अपनी पीठ थपथपा रहे थे.’

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान मई 2021 में इलाहाबाद के श्रृंगवेरपुर में गंगा घाट पर दफ़न शव. (फोटो: पीटीआई)

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान मई 2021 में इलाहाबाद के श्रृंगवेरपुर में गंगा घाट पर दफ़न शव. (फोटो: पीटीआई)

शिक्षक एस. तिवारी के कई सहकर्मी कोविड का शिकार हुए. वे सब पंचायत चुनाव की ड्यूटी पर लगाए गए थे. तिवारी कहते हैं, ‘चुनाव से पहले या चुनाव के दिन सोशल डिस्टेंसिंग नाम की चीज नहीं थी, न ही किसी दिशानिर्देश का पालन हो रहा था. ये मौतें होनी ही थीं. यहां तक कि कोर्ट ने भी इसको दर्ज किया है.’ 11 मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को कम से कम 1 करोड़ रुपये का मुआवजा देने के लिए कहा.

उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ. दिनेश चंद्र शर्मा कहते हैं, ‘सरकार ने कुल मिलाकर सिर्फ 30 लाख रुपये के मुआवजे की स्वीकृति दी है. हमने सरकार और कोर्ट को अपनी सूची सौंप दी है. 1,621 शिक्षकों की मौत हुई है. 30 लाख से कुछ नहीं होने वाला है. मुआवजा के लिए आवेदन भरने की आखिरी तारीख 15 जून है. देखते हैं प्रशासन कितने आवेदनों को स्वीकार करता है. हम अपने शिक्षकों के लिए अदालत में लड़ाई जारी रखेंगे.’

यह कोर्ट द्वारा किया गया पहला हस्तक्षेप नहीं था. पूरी दूसरी लहर के दौरान इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कई मौकों पर हस्तक्षेप किया. 17 मई को अपने संभवतः सबसे कठोर आलोचना में इसने एक आदेश पारित किया जिसमें कहा गया कि गांवों में मेडिकल सुविधा ‘राम भरोसे’ थी.
हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस आदेश को स्थगित कर दिया, लेकिन स्वास्थ्य ढांचे का चरमराना प्रलयंकारी था, खासकर ग्रामीण उत्तर प्रदेश में. आशंका के मुताबिक ग्रामीण इलाके सबसे बुरी तरह से प्रभावित थे.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के महाराजगंज के पत्रकार अखंड प्रताप सिंह ने अपने इलाके में कई गांवों की यात्रा करके वहां की विभीषिका को दर्ज किया. इसकी शुरुआत उन्होंने अपने गांव पनियारा से की.

‘मुझे यह दोहराने की जरूरत नहीं है कि अस्पतालों में क्या स्थिति है? सरकारी दावे हवा-हवाई हैं और वे जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते हैं. मुख्यमंत्री समूह पर समूह बनाते रहे. कोविड से निपटने के लिए पहले टीम 11, फिर टीम 9 बनाया गया, लेकिन राज्य की जनता को इन कदमों से क्या मिला?’

‘मुख्यमंत्री ने कहा कि हर जिला अस्पताल के पास ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर्स हैं. यह सच नहीं था. वे कहते हैं कि घर पर रह रहे लोगों को ऑक्सीजन और दवाइयां मुहैया कराई जा रही हैं. कहां हैं ये? सिर्फ 10-20 प्रतिशत लोगों का टीकाकरण हुआ है, वह भी सिर्फ पहली खुराक. अब वे भी उपलब्ध नहीं हैं. गांवों में लोगों को पता भी नहीं है कि यह यह क्या है और जिन्हें थोड़ा-बहुत पता है, वे बहुत घबराए हुए हैं. कोई घर-घर जाकर अभियान नहीं चलाया जा रहा है.’

20 मई से 31 मई:

क्या किसी को पता है कि मुख्यमंत्री की बातों वाले उत्तर प्रदेश का अस्तित्व कहां है?

जब महामारी की कहानी ने अपना रुख यूपी के गांवों की तरफ कर लिया, तब सरकार की आला दर्जे की बदइंतजामी साफ दिखाई देने लगी. मरीजों के लिए मेडिकल देखभाल की बात छोड़ दीजिए, टेस्ट कराने की सुविधा भी नसीब होना मुश्किल था.

5 मई से 31 मई तक, नागरिक सवालों और मानवाधिकारों को लेकर काम करनेवाले कार्यकर्ताओं और संगठनों का एक समूह बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच (बीएडीएम) ने गांवों पर पड़ने वाले कोविड-19 के प्रभावों का आकलन करने के लिए एक अध्ययन किया.

मंच के संयोजक कुलदीप सिंह बौद्ध कहते हैं, ‘हमारे पास कोई चारा नहीं था, क्योंकि सरकारी आंकड़ों का कोई अर्थ नहीं रह गया था. जिला प्रशासन की मानें तो कोई भी कोविड संबंधी मौत नहीं हई है और अगर कोई मौत हुई भी है, तो वह निश्चित तौर पर मेडिकल देखभाल न होने के कारण नहीं हुई है.’

बीएडीएम ने 50 पंचायतों और 4 प्रखंडों के 105 गांवों का सर्वे किया. ‘हमने पाया कि 3,500 लोग संक्रमित हुए थे. ज्यादातर मौतों को कोविड संबंधी मौत के तौर पर दर्ज नहीं किया गया है. इसका एक कारण यह था कि लोगों की जांच नहीं हुई थी, दूसरा कारण यह था कि पॉजिटिव आने के बावजूद उनका नाम कोविड-19 मरीजों वाली सूची में दर्ज नहीं किया गया था. हमारे जिले में या पास के जिलों में ऑक्सीजन एक भी कॉन्सेंट्रेटर उपलब्ध नहीं हैं.’

महामारी के बीच में मुख्यमंत्री ने आयुष केंद्रों (वैकल्पिक चिकित्सा उपलब्ध कराने के लिए स्थापित केंद्रों) को सक्रिय करने और उन्हें लोगों को सांस लेने की विधि (ब्रीदिंग टेक्नीक) के बारे में जागरूक करने के लिए उनका इस्तेमाल करने को लेकर ट्वीट किया.

कुलदीप कहते हैं, ‘मुख्यमंत्री आयुष को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन जनता के बीच इसका कोई ठोस फायदा नजर नहीं आता. मैं आपको आयुष अस्पताल की तस्वीर भेजूंगा. यह बस एक खाली घर है.’

जालौन का आयुष केंद्र. (फोटो: बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच)

जालौन का आयुष केंद्र. (फोटो: बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच)

उन्होंने आगे यह भी कहा, ‘कोविड-19 मरीजों की देख-रेख या निगरानी करने की कोई व्यवस्था नहीं है. मुख्यमंत्री होम आइसोलेशन में रह रहे लोगों को दवाइयों की किट पहुंचने की बात कर रहे हैं. 26 मई को उन्होंने फिर यह बात दोहराई, लेकिन तथ्य यह है कि होम आइसोलेशन में रह रहे लोगों का कोई आंकड़ा सरकार के पास नहीं है. लोगों ने जांच नहीं कराई है क्योंकि एक तो यह कठिन है या उन्हें यह पता नहीं कि टेस्ट कहां और कैसे कराया जाए, लेकिन वे बीमार हैं. ज्यादातर लोगों को इन मेडिकल किट के बारे में कोई जानकारी नहीं है. हमें सिर्फ कुछ गांवों में महज 2-3 किटें मिलीं.’

साथ ही वे कहते हैं, ‘दूसरी समस्या यह है कि सरकार ने मुफ्त राशन का जो वादा किया है, वह लोगों को नहीं मिल रहा है. हमारे इलाके में कभी भी मजबूत स्वास्थ्य ढांचा नहीं था. लेकिन महामारी से निपटने के लिए जो कुछ बुनियादी तैयारी की जानी चाहिए थी, उनकी ओर भी ध्यान नहीं दिया गया. निश्चित ही हमारे मुख्यमंत्री का समानांतर नैरेटिव गढ़ने का अपना तरीका है. क्या किसी को पता है उनकी बातों वाले उत्तर प्रदेश का अस्तित्व कहां है?’

राधिका बोरदिया स्वतंत्र पत्रकार हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)