दुनिया

यूएन ने म्यांमार तख़्तापलट के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पारित किया, भारत मतदान में शामिल नहीं हुआ

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश मसौदा प्रस्ताव पड़ोसी एवं क्षेत्रीय देशों से सलाह किए बगैर जल्दबादी में लाया गया. यह न सिर्फ़ ग़ैर-मददगार है, बल्कि म्यांमार में मौजूदा स्थिति का समाधान तलाशने के लिए आसियान के प्रयासों के प्रतिकूल भी साबित हो सकता है.

यंगून में तख्तापलट के खिलाफ नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी का झंडा लेकर प्रदर्शन करते हुए एक प्रदर्शनकारी. (फोटो: रॉयटर्स)

यंगून में तख्तापलट के खिलाफ नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी का झंडा लेकर प्रदर्शन करते हुए एक प्रदर्शनकारी. (फोटो: रॉयटर्स)

संयुक्त राष्ट्र: संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक दुर्लभ कदम उठाते हुए म्यांमार की सैन्य सरकार के खिलाफ व्यापक वैश्विक विरोध प्रकट करते हुए एक प्रस्ताव पारित कर देश में सैन्य तख्तापलट की निंदा की है, उसके खिलाफ शस्त्र प्रतिबंध का आह्वान किया है तथा लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को बहाल करने की मांग की है.

हालांकि भारत समेत 35 देशों ने इन प्रस्ताव पर मतदान में हिस्सा नहीं लिया. भारत का कहना है कि मसौदा प्रस्ताव उसके विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करता.

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने शुक्रवार को ‘म्यांमार में स्थिति’ मसौदा प्रस्ताव को स्वीकृत किया. इसके पक्ष में 119 देशों ने मतदान किया, जबकि म्यांमार के पड़ोसी देश भारत, बांग्लादेश, भूटान, चीन, नेपाल, थाईलैंड और लाओस समेत 35 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. बेलारूस एकमात्र ऐसा देश था, जिसने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया.

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने बताया, ‘संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश आज का मसौदा प्रस्ताव पड़ोसी एवं क्षेत्रीय देशों से सलाह किए बगैर जल्दबादी में लाया गया. यह न सिर्फ गैर-मददगार है, बल्कि म्यांमार में मौजूदा स्थिति का समाधान तलाशने के लिए आसियान के प्रयासों के प्रतिकूल भी साबित हो सकता है.’

महासभा कक्ष में मतदान प्रक्रिया में शामिल नहीं होने के फैसले की व्याख्या करते हुए तिरुमूर्ति ने कहा कि म्यांमार का निकट पड़ोसी देश होने और वहां के लोगों का करीबी मित्र होने के नाते भारत वहां राजनीतिक अस्थिरता के गंभीर प्रभाव और म्यांमार की सीमाओं से परे इसके फैलने की संभावना से अवगत है. भारत सभी मुद्दों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए व्यापक स्तर पर देशों की भागीदारी का आह्वान करता है.

तिरुमूर्ति ने कहा, ‘दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान) के तत्वावधान में हम पहले ही ऐसी पहल कर चुके हैं. ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम आसियान के प्रयासों को समर्थन दें.’

उन्होंने कहा, ‘मसौदा प्रस्ताव में हमारे विचार प्रतिबिंबित होते प्रतीत नहीं हो रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान पर जोर देता रहा है और ऐसे में हम इस बात को दोहराना चाहते हैं कि इस प्रस्ताव में म्यांमार के पड़ोसी देशों एवं क्षेत्र को शामिल करते हुए एक सलाहकार एवं रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाना महत्वपूर्ण है.’

तिरुमूर्ति ने जोर देकर कहा, ‘पड़ोसी देशों और क्षेत्र के कई देशों से इसे समर्थन नहीं मिला है. आशा है कि यह तथ्य उनके लिए आंख खोलने वाला होगा, जिन्होंने जल्दबाजी में कार्रवाई करने का विकल्प चुना.’

उसने कहा कि उसका मानना है कि इस प्रस्ताव को इस समय स्वीकृत करना म्यांमार में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में हमारे संयुक्त प्रयासों के लिए अनुकूल नहीं है, इसलिए हम इस प्रक्रिया में शामिल नहीं हो रहे.

प्रस्ताव के समर्थकों को उम्मीद थी कि 193 सदस्यीय विश्व संस्था सर्वसम्मति से इसे स्वीकृत कर देगी, लेकिन बेलारूस ने मतदान कराने का आह्वान किया. प्रस्ताव के पक्ष में 119 देशों ने वोट किया, बेलारूस ने इसका विरोध किया, जबकि भारत, चीन और रूस समेत 36 देशों ने इसमें हिस्सा नहीं लिया.

यह प्रस्ताव यूरोपीय संघ और कई पश्चिमी देशों एवं दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों के 10 सदस्यीय संघ (आसियान), जिसमें म्यांमार भी शामिल है, सहित तथाकथित ‘कोर ग्रुप’ की लंबी बातचीत का परिणाम था.

संयुक्त राष्ट्र के एक राजनयिक ने कहा कि प्रस्ताव पर सर्वसम्मति के लिए आसियान के साथ एक समझौता किया गया था, लेकिन वोट के दौरान इसके सदस्य देश एकमत नहीं दिखे. आसियान के सदस्यों इंडोनेशिया और वियतनाम सहित कुछ देशों ने पक्ष में वोट किया तथा थाईलैंड और लाओस सहित अन्य ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया.

उन्होंने कहा कि प्रस्ताव को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला, लेकिन महासभा की यह कार्रवाई एक फरवरी को हुए सैन्य तख्तापलट की निंदा करती है, जिसके तहत आंग सान सू ची की पार्टी को सत्ता से हटा दिया गया था. तख्तापलट के बाद से सू ची और सरकार के कई अन्य नेता एवं अधिकारी नजरबंद हैं, जिसके विरोध में देश में प्रदर्शन चल रहा है. हालांकि यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है.

गौरतलब है कि म्यांमार में सेना ने बीते एक फरवरी को तख्तापलट कर नोबेल विजेता आंग सान सू ची की निर्वाचित सरकार को बेदखल करते हुए और उन्हें तथा उनकी पार्टी के अन्य नेताओं को नजरबंद करते हुए देश की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी.

म्यांमार की सेना ने एक साल के लिए देश का नियंत्रण अपने हाथ में लेते हुए कहा था कि उसने देश में नवंबर में हुए चुनावों में धोखाधड़ी की वजह से सत्ता कमांडर इन चीफ मिन आंग ह्लाइंग को सौंप दी है.

सेना का कहना है कि सू ची की निर्वाचित असैन्य सरकार को हटाने का एक कारण यह है कि वह व्यापक चुनावी अनियमितताओं के आरोपों की ठीक से जांच करने में विफल रहीं.

पिछले साल नवंबर में हुए चुनावों में सू ची की पार्टी ने संसद के निचले और ऊपरी सदन की कुल 476 सीटों में से 396 पर जीत दर्ज की थी, जो बहुमत के आंकड़े 322 से कहीं अधिक था, लेकिन 2008 में सेना द्वारा तैयार किए गए संविधान के तहत कुल सीटों में 25 प्रतिशत सीटें सेना को दी गई थीं.

सैन्य तख्तापलट के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों में 800 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)