भारत

कश्मीरः किशोर न्याय बोर्ड ने यूएपीए के तहत आरोपी नाबालिग को ज़मानत दी, कहा- अपराध जघन्य नहीं

28 मई को बुम्हामा के एक युवक की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. पुलिस का कहना है कि उनके जनाज़े में राष्ट्रविरोधी नारे लगाए गए थे, जिसके बाद पुलिस ने किशोर सहित आठ लोगों के ख़िलाफ़ यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया था.

(फोटोः विकीमीडिया कॉमन्स)

(फोटोः विकीमीडिया कॉमन्स)

श्रीनगरः किशोर न्याय बोर्ड ने गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोपी कश्मीर के एक नाबालिग को यह कहते हुए जमानत दे दी कि उसके कथित अपराधों को जघन्य नहीं कहा जा सकता.

जम्मू एवं कश्मीर पुलिस ने किशोर पर एक युवक के जनाजे के दौरान कथित तौर पर राष्ट्रविरोधी नारेबाजी के लिए मामला दर्ज किया था. इस युवक की 28 मई को कुपवाड़ा जिले में सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी.

कुपवाड़ा किशोर न्याय बोर्ड ने अपने आदेश में कहा कि जिन अपराधों के लिए किशोर पर मामला दर्ज किया गया था, भले ही वे कथित तौर पर गंभीर हो लेकिन जघन्य नहीं हैं.

किशोर न्याय बोर्ड ने अपने आदेश में कहा, ‘निर्दोषता के अनुमान के सिद्धांत के अनुसार किसी भी बच्चे को 18 साल की उम्र तक किसी भी तरह की दुर्भावना या आपराधिक मंशा से निर्दोष माना जाएगा. किशोर द्वारा कथित तौर किए गए अपराधों के लिए अधिकतम सात साल की सजा है इसलिए अपराधों को जघन्य अपराध नहीं कहा जा सकता.’

किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के नियम आठ का हवाला देते हुए किशोर न्याय बोर्ड के सदस्य मुहम्मद रफी शाह और रुकिया हसन ने कहा कि नाबालिग को केवल जघन्य अपराधों के मामले में ही गिरफ्तार किया जाना चाहिए.

बोर्ड ने कहा, ‘मौजूदा मामले में आरोपी नाबालिग ने कथित तौर पर गंभीर अपराध किया है लेकिन कानून के अनुरूप नाबालिग को तब तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता जब तक कि विशेष कारण मौजूद न हों.’

बोर्ड के मुताबिक, ‘गंभीर प्रकृति के मामलों में भी किसी आरोपी किशोर के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती सिर्फ जघन्य अपराधों में ही एफआईआर दर्ज की जा सकती है. जघन्य अपराधों के अलावा अन्य मामलों में सिर्फ जनरल डायरी में रिपोर्ट दर्ज की जाती है.’

बोर्ड ने कहा कि किशोरों को जमानत से केवल तभी वंचित रखा जा सकता है, जब इस बात के उचित आधार हों कि ऐसे किशोरों की रिहाई से बच्चे को शारीरिक या मनोवैज्ञानिक खतरा हो सकता है या बच्चे की रिहाई न्याय के लक्ष्य को असफल कर देगी.

किशोर न्याय बोर्ड के कामकाज के लिए मंजूरीकृत दिशानिर्देशों के अनुसार आरोपी किशोरों को जांच के बाद अंतिम उपाय के रूप में संस्थागत देखभाल में रखा जाएगा.

किशोर न्याय बोर्ड का कहना है कि प्रत्यावर्तन और पुनर्वास का सिद्धांत कहता है कि किशोर न्याय प्रणाली में प्रत्येक किशोर को जल्द से जल्द अपने परिवार के साथ फिर से जुड़ने का अधिकार होगा और उसे उसी सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति में वापस लाया जाएगा, जिसमें वह पहले था.

बोर्ड ने कहा आरोपी किशोर को श्रीनगर के ऑब्जर्वेशन होम में रखना, पुनर्वास कार्यक्रम का हिस्सा है और इसे सजा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.

अभियोजन पक्ष जमानत के विरोध में

वहीं, अभियोजन पक्ष ने इस आधार पर नाबलिग की जमानत का विरोध किया कि किशोर ने जघन्य अपराध किए हैं.

आदेश में कहा गया, ‘अपर लोक अभियोजक (एपीपी) ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए यह कारण दिया कि आरोपी किशोर ने जघन्य प्रकृति के अपराध किए हैं और ये गैर जमानती हैं इसलिए अधिकार के रूप में जमानत का दावा नहीं किया जा सकता.’

अभियोजन पक्ष ने इस आधार पर भी जमानत का विरोध किया कि किशोर द्वारा किए गए अपराधों का समाज पर गंभीर प्रभाव पड़ा है.

आदेश में कहा गया, एपीपी ने यह भी कहा कि इस स्तर पर किशोर की कस्टडी में बदलाव नहीं किया जा सकता क्योंकि परिजनों का किशोर पर नियंत्रण नहीं है, मामले की जांच भी शुरुआती चरण में है, ऐसे में किशोर की रिहाई से जांच पर गंभीर प्रभाव पड़ेंगे.

किशोर की ओर से पेश वकील ने रिहाई की मांग करते हुए दायर आवेदन में कहा कि उनका मुवक्किल कानून का पालन करने वाला नागरिक है और पुलिस द्वारा उसे झूठे मामले में गिरफ्तार किया है.

आवेदन में यह भी कहा गया कि किशोर का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और उसे रिहा नहीं किया जाता है तो इससे उसका भविष्य प्रभावित होगा.

बोर्ड के आदेश में कहा गया, ‘आरोपी किशोर छात्र हैं और अगर उसे घर से बाहर रहने के लिए कहा गया तो इससे उसका भविष्य प्रभावित होगा और साथ ही उसे लंबे समय से हिरासत में रखने से उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.’

द वायर  की रिपोर्ट के मुताबिक, 28 मई को बुम्हामा के 29 साल के मोहम्मद अमीन डार को कुपवाड़ा को श्रीनगर से जोड़ने वाले गांव की मुख्य सड़क पर कार ने टक्कर मार दी थी.

पुलिस के मुताबिक, डार के जनाजे में राष्ट्रविरोधी नारे लगाए गए थे, जिसके बाद पुलिस ने किशोर सहित आठ लोगों के खिलाफ यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया था.

इन पर यूएपीए की धारा 13 के तहत मामला दर्ज किया गया, जिसके तहत सात साल तक की सजा का प्रावधान है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)