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‘नोटबंदी को लेकर सरकार शर्मिंदा थी इसलिए आरबीआई ने आंकड़े जारी करने में देरी की’

नोटबंदी को लेकर रिज़र्व बैंक के हालिया आंकड़ों पर अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार से द वायर के संस्थापक संपादक एमके वेणु की बातचीत.

Demonetisation Notenbandi Reuters

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

नोटबंदी को लेकर आंकड़े देने में रिज़र्व बैंक को इतनी देर में क्यों लगी. क्या कारण रहा?

इसका कारण ये है कि वो बहुत शर्मिंदा हैं. उनको और सरकार को ये ग़लतफ़हमी थी कि काले धन का मतलब है कैश. अगर हम कैश को निकाल देंगे तो काला धन निकल जाएगा. जबकि कैश या नकद जो होता है वो काले धन का 1% होता है. अगर उसमे से भी 2-3 लाख करोड़ रुपये वापस नहीं आता, तो हम कह सकते थे कि चलो एक-दो प्रतिशत काला धन वापस नहीं आया.

इसका मतलब है कि जो नोटबंदी है उसका असर काले धन पर नहीं पड़ा और जो काली कमाई होती थी उस पर कोई असर नहीं पड़ा. ये इतना बड़ा शर्मिंदा करने वाला तथ्य है कि आपने इतना बड़ा फैसला लिया और उसके वजह से कई लोगों को परेशानी हुई. लोग लाइनों में मरे और इसका अर्थव्यवस्था पर बुरा असर हुआ.

इसका ये मतलब है कि ये इस पर पूरी तरह फेल हो गए, लेकिन वे इसको स्वीकार नहीं करना चाहते हैं. अब अगर 99 प्रतिशत कैश वापस आ गया है, तो हमको जैसे पता है कि सहकारी सोसाइटी और बैंक हैं उनमें 8,000 करोड़ रुपये पड़ा हुआ था.

इसके अलावा नेपाल में है, भूटान में है, दुबई में है जितना पैसा था जैसे 15.44 लाख करोड़ वापस आना था, लेकिन उससे कही ज़्यादा वापस आ गया. अगर ज़्यादा नोट वापस आ गया है, तो इसका मतलब कि वो नकली नोट थे, वो भी वापस आ गए हैं और वो इसमें गिने जा चुके हैं.

क्या नोट बंदी पूरी तरह विफल रही?

बिल्कुल, नोटबंदी पूरी तरह विफल साबित हुई है. क्योंकि इसका असर नकली नोटों पर नहीं हुआ, जैसाकि वे कह रहा हैं कि 40 करोड़ नकली नोट पकड़े गए हैं. ऐसा माना जा रहा था कि कम से कम 10 से 12 हजार करोड़ के नकली नोट होगें. अब आया आतंकवाद का मसला जो पूर्वोत्तर और देश के अन्य इलाकों में चलता है.

अटॉर्नी जनरल ने यहां तक कह दिया कि 3-4 लाख करोड़ रुपये वे इस्तेमाल करते हैं. सिर्फ 40 करोड़ आया, तो इसका मतलब नोटबंदी का असर न नकली नोटों पर हुआ और न ही आतंकवाद पर हुआ.

आतंकवादी गतिविधियां जो पूर्वोत्तर में चल रही हैं या कश्मीर में, उस पर कोई असर नहीं हुआ है वो उसी तरह चल रहा है. सरकार ने नोटबंदी का जो फायदा बताया है दरअसल वो हुआ नहीं और सरकार बहुत ही शर्मिंदा है इसलिए वो बता नहीं रहे हैं.

अरुण जेटली ने नोटबंदी के बचाव में कहा कि इसे सिर्फ एक योजना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इसे जीएसटी और डिजिटलाइजेशन से जोड़ कर देखा जाना चाहिए.

डिजिटलाइजेशन की जहां तक बात है, अगर आप लोगों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाना चाहते हैं तो इसे बिना नोटबंदी के भी किया जा सकता था. जीएसटी के लिए भी नोटबंदी की ज़रूरत नहीं थी. इसलिए सरकार इन दोनों को जोड़ कर न देखे.

जब इन्होंने देखा कि बहुत भारी संख्या में नोट वापस आ रहे हैं, तो उन्होंने तुरंत कैशलेस और डिजिटलाइजेशन की बात करनी शुरू कर दी. प्रधानमंत्री ने भी यह सभी बात 27 नवंबर वाले कार्यक्रम में बोलना शुरू किया, जबकि 8 नवंबर वाले भाषण में उन्होंने इस तरह का कोई जिक्र नहीं किया था.

नोटबंदी के लिए इनको बड़ी तैयारी करनी चाहिए थी. हमने देखा किस प्रकार लोगों को दिक्कत आई और कई लोग परेशान हुए. अगर इन्होंने इसकी तैयारी की होती तो इस तरह नहीं होता जैसे उस समय हुआ था.

जो तैयारी होनी चाहिए थी, उस तरह की तैयारी है नहीं. सब जगह मशीनें हो और ग्रामीण इलाकों में अभी भी एटीएम की सुविधा नहीं है, इंटरनेट सुरक्षा पर कोई ठोस तैयारी नहीं है.

इसलिए यह सब करने के लिए बहुत बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है. यह सब एक दिन में नहीं होगा इसे वक्त लगेगा, धीरे-धीरे होगा. इसलिए नोटबंदी को कैशलेस से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए.

कैशलेस तो सरकार तैयारी करके भी कर सकती है, लेकिन नोटबंदी से बड़ी परेशानी हुई. वो जो परेशानी है आप कह रहे हैं कि उसका फायदा कैशलेस इकोनामी से होगा. दोनों को जोड़ना नहीं चाहिए क्योंकि उसका जो नुकसान हुआ है उसका अलग मसला है.

आरबीआई का आंकड़ा बताता है कि अप्रैल के महीने में जो डिजिटल लेन-देन था उसमें कमी आई थी?

ऐसा हुआ कि शुरू में बहुत तेजी से बढ़ा. लोगों ने डिजिटल लेन-देन का इस्तेमाल किया और पेटीएम पर गए, लेकिन फिर धीरे-धीरे वो कम होने लगे. इसमें बहुत उतार-चढ़ाव है और कैशलेस के लिए लोगों के पास इसको इस्तेमाल करने का ज्ञान होना चाहिए.

कैशलेस के लिए ज्ञान चाहिए और इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, क्योंकि लोगों में डर भी है कि कहीं इंटरनेट पर इस्तेमाल के कारण उनका अकाउंट या क्रेडिट कार्ड हैक न हो जाए, इसलिए हमें कैशलेस वाले मामले को नोटबंदी से एकदम अलग रखना चाहिए.

अरुण जेटली ने कहा कि हम इन सब से ज़्यादा लोगों के टैक्स के अंतर्गत ला सकेंगे. उन्होंने आंकड़ा दिया कि 93 लाख अतिरिक्त लोग आईटी रिटर्न फाइल करेंगे.

वहां यह भी देखा जाना चाहिए कि जब लोग आईटी रिटर्न फाइल करते हैं, तो बहुत कम आमदनी दिखाते हैं. अभी तो हमारे पास 2012-13 का आंकड़ा है. उसके आगे का अभी तक हमारे पास कोई आंकड़ें नहीं आए हैं और सरकार ने दिए भी नहीं है.

उसमें हम देखते हैं कि लगभग 5.2 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो टैक्स के दायरे में आते हैं. उसमें भी जो सही से टैक्स भरने वाले हैं वो महज 1.7 करोड़ लोग हैं.

हम ऐसा नहीं कह सकते कि अगर 93 लाख लोगों ने टैक्स फाइल किया है तो लोग ज्यादा टैक्स देंगे. टैक्स भरने वालों की अगर सूची देखी जाए तो उसमे सबसे अधिक शून्य टैक्स वाली फाइल है या तो 20,000 से कम टैक्स भरने वाले लोग सबसे अधिक हैं.

इन सभी से देश के जीडीपी पर भी कोई खास असर नहीं होगा. इस समय आर्थिक स्थिति बिगड़ी है. उस पर आने से पहले सरकार कहेगी कि हमने 18 लाख नोटिस दिए हैं. उनको दिए जिन्होंने 5 लाख से ऊपर बैंकों में जमा किए हैं. लेकिन यह जरूरी नहीं है कि किसी ने अगर बैंक में पैसा जमा किया है, तो काला धन होगा, क्योंकि उसे साबित करना होगा.

सरकार के पास बहुत बड़ा डेटा है. सरकार ने 2016 के सितंबर में सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट एक्सेस से बताया कि 2009 से 2016 तक उनके पास 90 लाख ऊंची रकम के लेन-देन का डेटा है. लेकिन उसमें से क्या निकला, कुछ नहीं निकला तभी तो वो ये सब कर रहे हैं.

आपने देखा पहली आमदनी डिकलरेशन योजना में 65,000 हजार करोड़ रुपये घोषित हुए और जो दूसरी योजना है उसमें 5000 करोड़ रुपये ही घोषित हुए.ये सब इसलिए हुआ, क्योंकि ये सब प्रधानमंत्री के नाम पर था. यह पहली टैक्स संबंधित योजना थी, जो प्रधानमंत्री के नाम पर चलाई गई.

यह कहना कि हमारे पास इतना डेटा अगया है, इसलिए हम बहुत लोगों को पकड़ लेंगे, ये भी अपने आप में कहना सही नहीं है. दूसरी बात कि इसमें जो आपके 5.2 करोड़ रुपये जो आपके रिटर्न फाइल होते हैं, उसमें से आप सिर्फ 5 लाख को ऑडिट कर पाते हैं, यानी की सिर्फ 1 प्रतिशत से भी कम.

अभी भी जो आपके पास 93 लाख डेटा आए हैं, आप उनमें से कितने ऑडिट कर लेंगे. क्योंकि आपको पुराने वाले भी ऑडिट करने हैं और नए वाले भी. आपके पास इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी है और आप के पास टैक्स ऑफिसर की कमी है.

यह कहना कि ये जो आया है इसमें ब्लैक मनी होगा, ठीक नहीं है.

तीसरी बात आपने कही कि हमारा जो 93 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र है, जहां लगभग 93 प्रतिशत लोग काम करते हैं, उनको बहुत बड़ा धक्का लगा. वहां कैश में काम चलता है और जब उनके पास कैश की कमी आ गई, तो उनका जो लागत पूंजी थी, वो कम हो गई, जिसका असर अभी भी दिख रहा है. सीएमई ने दिखाया कि 1.50 करोड़ से 6 करोड़ लोगों का रोज़गार चला गया है.

यह तो वो बता रहे हैं, जिनका डेटा उनके पास है. असंगठित क्षेत्र में डेटा के अनुसार 60 से लेकर 80 प्रतिशत तक गिरावट थी. उसकी वजह से मनरेगा की डिमांड बढ़ी, क्योंकि लोग शहरों से गांव गए, उनके पास काम नहीं था तो उन्होंने वहां काम लिया. मनरेगा की डिमांड 4-5 गुना बढ़ गई.

सरकार ने कहा था कि जब पैसा बैंक में आएगा, तब बैंक का क्रेडिट बढ़ेगा और बैंक ज्यादा कर्ज दे पाएगी?

बैंक का जो क्रेडिट रेट है और 60 वर्षों में सब से कम पर नहीं, बल्कि जुलाई में नेगेटिव हो गई. पिछले महीने का जो आंकड़ा था कि यह 50 वर्षों में सबसे कम था. उसमें यह कहा गया कि उद्योग निवेश नहीं कर रहा है, इसलिए क्रेडिट ऑफ टेक कम हो गया.

जब नवंबर के आंकड़ें आए, तो वो 60 साल के सबसे निचले स्तर पर थे और जो जुलाई के आंकड़ें है वो दिखा रहा है कि और नीचे गिर गया. वजह यह है कि इंडस्ट्री में डिमांड कम है.

कैपेसिटी यूटीलाइजेशन पर जो आरबीआई ने आंकड़ें पेश किए हैं, उसके अनुसार कैपेसिटी यूटीलाइजेशन 70 प्रतिशत पर पहुंच चुका है. अब इतनी नीचे स्तर पर निवेश नहीं होता है, तो क्रेडिट की डिमांड कम हो जाती है. इन सभी चीजों से संगठित क्षेत्र के साथ असंगठित क्षेत्रों में भी असर पड़ा है.

आरबीआई सर्वे के अनुसार छोटे क्षेत्रों को बड़ा झटका लगा है?

बड़े संगठित क्षेत्रों में भी जो मुनाफे का स्तर है वो गिर गया है. जिसकी वजह से निवेश की क्षमता कम हो जाती है. जो सरकार पिछले साल पर कह रही थी कि विकास दर 6 प्रतिशत बढ़ी है, लेकिन मुझे लगता है कि ये आधे या एक प्रतिशत से ज्यादा नहीं बढ़ा है. असंगठित क्षेत्रों का जो डेटा होता है, वो 2 से 3 साल के बाद आता है. अभी सरकार जो डेटा दे रही है, वो सिर्फ संगठित क्षेत्रों के आधार पर दे रही है.

95 प्रतिशत ब्लैक मनी जमीन और सोने में है और जेटली का कहना है कि वो अब उस पर नकेल कसेंगे.

ऐसे ब्लैक मनी को पकड़ना बहुत मुश्किल है. सरकार के सीबीडीटी के चेयरमैन ने कहा कि 90 लाख बड़ी रकम के लेन-देन का डेटा उनके पास है. लेकिन उसमें से कुछ निकला नहीं है. एक तो आपके पास मैनपॉवर नहीं है और सिर्फ 5 लाख डेटा ही ऑडिट कर पा रहे हो.

मुझे लगता है ये जो ऐसा कह रहे हैं सिर्फ डराने के लिए, क्योंकि मुझे अभी तक ऐसा लगता है कि ऐसा कुछ निकला नहीं है कि जिससे ये लोगों को पकड़ पाए.

ये बहुत अच्छा है कि ये कह रहे हैं कि हम पकड़ेंगे शेल कम्पनीज को और प्रधानमंत्री ने भी कहा कि हमने एक लाख से ज्यादा शेल कंपनीज को बंद कर दिया है.

अच्छा है पर उनमें भी प्रतिस्पर्धा है. कितने स्टॉक एक्सचेंज में जा रहे हैं, कितनों के हर साल लेन-देन हो रहा है. हम कैसे शेल कम्पनीज का लेखा-जोखा कर रहे हैं, वो तभी हो सकता है, जब आप उसकी जांच करे.

ऐसे किसी भी शेल कंपनी को बंद नहीं कर सकते, उसके लिए जांच होनी चाहिए और जिसका सरकार के पास प्रबंध और मैनपावर नहीं है. मुझे वहां से कुछ ज्यादा निकलने की उम्मीद नहीं है.

जेटली ने कहा नोटबंदी को अकेले न देख कर पैकेज के रूप में देखे और राजनीतिक पार्टी पर भी कड़ा नियम बनाएंगे?

सबसे पहली बात है कि जो इलेक्शन फाइनेंस है और पार्टी फाइनेंस है वो हमारे पूरे जीडीपी का 0.1 प्रतिशत होता है. ऐसा नहीं है कि बहुत बड़ा फंडिंग है. उसका महत्व इसलिए है कि वो व्यवस्था को नियंत्रित करता है.

यह कहना है कि हम ब्लैक मनी को रोक लेंगे तो राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग पर भी रोक लगा देंगे, ये दोनों अलग-अलग बात है. आप उसको नियंत्रित कर भी लेंगे तो वो जीडीपी का 0.1 प्रतिशत है, तो वो जाता रहेगा.

उसके लिए हमे पारदर्शिता की ज़रूरत है, लेकिन हम उसे और ज्यादा अपारदर्शी बना रहे हैं. हालंकि कह रहे हैं कि पहले 20,000 रुपये का ब्योरा देना पड़ता था, लेकिन अब कह रहे हैं कि उसे 2,000 रुपये कर दिया है लेकिन उसे 1,900 कर सकते हैं या 1,919 कर सकते हैं. तो वो अपने आप में पर्याप्त नहीं है. सब से बड़ी समस्या बेनामी का है. कोई बता नहीं सकता कि किसने कौन सी पार्टी को पैसे दिए हैं. ये 2,000 रुपये से कम वाले मामले में है.

दूसरा जो इन्होंने कहा है कि जो सीएसआर की फंडिंग है जो कॉर्पोरेट करते हैं. वहां हम अनुमति दे देंगे बॉण्ड इशू करे. ये सिर्फ सरकार को पता चलेगा और किसी को नहीं चलेगा, तो वहां भी अपारदर्शिता है.

इसमें ऐसा होगा कि जिसे आपका समर्थन करना है वो दे देगा और जिसे नहीं करना है वो नहीं देगा. ये सब समस्या इसलिए आ रही है, क्योंकि हमारे यहां दरअसल राजनीतिक पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं है और जब तक ये नहीं होगा तब तक कोई भी नियम के बदलाव का असर सकारात्मक रूप से नहीं होगा.

हमारे चुनाव आयोग ने भी कहा कि ये जो इलेक्ट्रोरल बॉन्ड है वो सही नहीं है. सरकार को नोटबंदी का राजनीतिक फायदा तो मिला क्योंकि सरकार ने आपने आप को समाज में रॉबिनहुड की तरह स्थापित कर दिया.

आरबीआई के आंकड़ों से असर तो होगा, क्योंकि इतने लोग बेरोजगार हैं, किसान है, मजदूर हैं. मार्केट में कैश कम था और डिमांड कम हो रही है और उत्पादन ज्यादा हो गया. ट्रेडर्स सबसे ज्यादा असंतोष है और प्रदर्शन कर रहे हैं, किसान कर रहे हैं, युवा कर रहे हैं, क्योंकि इसका असर रोजगार पर हुआ.

मोदी अपना नरेटिव नहीं चला पाएंगे, क्योकि अब ये थोड़ा मुश्किल हो गया है. अब जैसे जीएसटी आया और उसका सबसे ज्यादा असर असंगठित क्षेत्र पर हुआ और ये नोटबंदी और जीएसटी दोनों मिलकर व्यापक असर करेगी राजनीतिक तौर पर. इसमें समय लगेगा आर्थिक समस्या धीरे-धीरे राजनीतिक समस्या बनती हैं. असंगठित क्षेत्र को एक साथ नहीं लाया गया तो इसका व्यापक असर होगा.