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मणिपुर: म्यांमार की दो महिलाओं की हिरासत में कोविड से मौत, पौष्टिक भोजन नहीं मिलने का आरोप

म्यांमार के 29 नागरिकों को कथित तौर पर बिना उचित दस्तावेज़ों के मणिपुर में प्रवेश करने के लिए एक महीने पहले गिरफ़्तार किया गया था. इनमें से दो महिलाओं की हिरासत के दौरान कोरोना वायरस संक्रमण मौत हो गई है. मणिपुर एडीजीपी (जेल) ने कहा है कि क़ैदियों की बेहतर तरीके से देखभाल की गई थी. एक अधिकार समूह ने मामले की जांच की मांग की है.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

इम्फालः लगभग एक महीने पहले म्यांमार के 29 नागरिकों को कथित तौर पर बिना उचित दस्तावेजों के मणिपुर में प्रवेश करने के लिए गिरफ्तार किया गया था. इनमें से दो नागरिकों की न्यायिक हिरासत के दौरान कोरोना वायरस के कारण मौत हो गई है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इम्फाल के एक अधिकार समूह ह्यूमन राइट्स अलर्ट (एचआरए) ने मणिपुर ह्यूमन राइट्स कमीशन (एमएचआरसी) के समक्ष याचिका दायर कर हिरासत में इस कथित मौत की मजिस्ट्रियल जांच शुरू करने के लिए राज्य सरकार से निर्देश मांगे थे.

मृतकों में 46 साल की महिला मा मियंत और 40 साल की मुखाई हैं, जो म्यांमार के उन 29 लोगों में शामिल थीं, जिन्हें इम्फाल के चुराचांदपुर जिले में न्यायिक हिरासत में लिया गया था.

एचआरए के कार्यकारी निदेशक बबलू लोइटोंगबाम के मुताबिक, दोनों महिलाएं पांच जून को कोरोना संक्रमित पाए गए थे और इनकी हालत अत्यंत गंभीर थी, जिस वजह से इन्हें जिला अस्पताल में भर्ती किया गया था. मा मियंत की छह जून को और मुखाई की आठ जून को मौत हो गई थी.

एमएचआरसी को लिखे पत्र में लोइटोंगबाम ने अब आरोप लगाया है कि दोनों महिलाओं की मौत पौष्टिक भोजन नहीं दिए जाने और उचित चिकित्सा नहीं मिलने की वजह से हुई है.

उन्होंने लिखा कि एचआरए ने नागरिक निकायों से शिकायत मिलने के बाद हिरासत में मौत की जांच की थी.

उन्होंने एमएचआरसी से मामले में हस्तक्षेप करने और न्यायिक मजिस्ट्रेट से मामले की जांच के लिए राज्य सरकार को निर्देश देने की मांग की.

इसके अलावा यह भी मांग की कि बिना किसी भेदभाव के यह सुनिश्चित किया जाए कि कैदियों को पर्याप्त पौष्टिक आहार मिले और नियमित तौर पर उनका मेडिकल चेकअप हो.

हालांकि मणिपुर एडीजीपी (जेल) पी. डौंगल ने कहा कि कैदियों की बेहतर तरीके से देखभाल की गई थी. उन्होंने कहा, ‘अगर एचआरए ने वहां का दौरा किया होता तो उन्हें इसके बारे में बेहतर पता होता.’

चुराचांदपुर जिला अस्पताल के सीएमओ डॉ. वी टोंसिंग ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग की ओर से किसी तरह की लापरवाही नहीं बरती गई.

उन्होंने कहा, ‘जैसे ही हमें कैदियों के स्वास्थ्य के बारे में सूचना मिली, हमने तेजी से कार्रवाई की और सभी बीमारों को अस्पताल पहुंचाया लेकिन दुर्भाग्यवश उनमें से दो की मौत हो गई. हालांकि, उनकी हालत पहले से ही गंभीर थी.’

लोइटोंगबाम ने कहा, ‘छह नाबालिग सहित म्यांमार के 29 नागरिकों को 31 मर्च को मणिपुर के नगाथल और कावनपुई गांवों से जिला पुलिस ने गिरफ्तार किया था और उन पर विदेशी अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर न्यू लामका के सद्भावना मंडप में रखा गया था.’

उसी दिन जिला अदालत ने उन्हें सात अप्रैल तक पुलिस कस्टडी में भेज दिया था. अदालत ने कहा था कि इन्होंने सैन्य तख्तापलट के परिणामस्वरूप उत्पीड़न के डर से सीमा पार की थी.

अदालत ने इसके बाद इन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया और सद्भावना मंडप को अस्थायी जेल में तब्दील कर दिया.

लोइटोंगबाम ने एमएचआरसी को लिखते हुए कहा, ‘हिरासत में कैदियों को राज्य सरकार की ओर से खाना उपलब्ध नहीं कराया गया था और ये लोग खाने के लिए पूरी तरह से नागरिक स्वैच्छिक संगठनों पर निर्भर थे.’

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि राज्य सरकार ने कैदियों को इम्फाल की अलग-अलग जेलों में ट्रांसफर करने की योजना का ऐलान किया था, जिसने उन्हें डरा दिया था, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे उनका परिवार अलग हो जाएगा.

लोइटोंगबाम ने लिखा, ‘ऐसी आबादी के बीच रहना जहां वे एक ही भाषा नहीं बोल सकते और संस्कृति को नहीं समझ सकते, इससे उन्हें काफी परेशानी हुई, इसलिए उन्होंने प्राधिकरण से उन्हें केंद्र (मंडप) में एक साथ रहने की अनुमति देने का अनुरोध किया था.’

उन्होंने कहा, ‘राज्य सरकार ने उनके आग्रह को स्वीकार कर लिया लेकिन कथित तौर पर उन्हें खाना और उचित मेडिकल केयर उपलब्ध नहीं कराई गई.’

अधिकार समिति को लिखे पत्र में लोइटोंगबाम ने कहा कि सद्भावना मंडप में पांच जून को नौ कैदी कोरोना संक्रमित पाए गए, जिनमें से मा मियंत और मुखाई की हालत गंभीर थी और उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई.

इसके बाद 13 और कैदी कोरोना संक्रमित पाए गए और उन्हें इलाज के लिए सात जून को चूराचांदपुर गवर्मेंट कॉलेज के कोविड केयर सेंटर ले जाया गया. जांच में निगेटिव पाए जाने पर इन्हें 16 जून को वापस लाया गया.

लोइटोंगबाम ने इस घटना को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीने का अधिकार के उल्लंघन का मामला बताया है. यह अधिकार गैर नागरिकों सहित सभी को दिया गया है.

एचआरए ने मृतकों के परिजनों के लिए 20-20 लाख रुपये की अंतरिम मुआवजा राशि की मांग की है.