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केन-बेतवा लिंक: शाब्दिक हेरफेर से जोड़े नए निर्माण के प्रावधान, न लागत बताई न पर्यावरण पर प्रभाव

दस्तावेज़ दर्शाते हैं कि केंद्र ने केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के तहत जल बंटवारे के समाधान के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की कई ऐसी शर्तों को स्वीकार किया है, जिसके चलते अतिरिक्त संरचनाओं का निर्माण करना होगा. नतीजतन कुल लागत में बढ़ोतरी होगी और सरकार ने जिस लाभ का दावा किया है, वह झूठा साबित होगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत. (फोटो साभार: पीआईबी)

(इंटरन्यूज़ के अर्थ जर्नलिज्म नेटवर्क के सहयोग से की गई यह रिपोर्ट केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना पर छह लेखों की शृंखला का पांचवा भाग है. पहला, दूसरा, तीसरा और चौथा भाग यहां पढ़ सकते हैं.)

नई दिल्ली: इस साल मार्च महीने की 22 तारीख को विश्व जल दिवस के मौके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ था, जिसमें सरकार ने अपनी बेहद महत्वाकांक्षी केन-बेतवा लिंक परियोजना के लिए दो राज्यों के बीच क़रार पर साइन करवाए।

इस कार्यक्रम को शुरू करते हुए होस्ट द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का महिमामंडन करते हुए कहा गया, ‘विकास की इमारत हम सभी लोग देखते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को ऐसा सौभाग्य प्राप्त होता है कि वे नींव का पत्थर भी देख सकें. और आज हम सभी लोगों को ये सौभाग्य मिला है कि माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गरिमामयी उपस्थिति में हम लोग उस ऐतिहासिक क्षण का साक्षात कर सकें जो आगे चलकर हम सब के लिए नींव का पत्थर बनकर विकास की इमारत बनाएगा.’

इसके बाद जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने परियोजना के उस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किया, जो पिछले कई सालों विवादों में रहाऔर जिसे विशेषज्ञों ने पर्यावरण को गंभीर खतरा बताते हुए रद्द करने की मांग की.

बहरहाल होस्ट के शब्दों के अनुसार ये प्रोजेक्ट मील का पत्थर साबित होगा या नहीं, ये तो भविष्य तय करेगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि सरकार ने इसे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ बताते हुए इसको लागू करने की जल्दबाजी में कई नियमों को दरकिनार किया है.

आलम ये है कि एग्रीमेंट में ऐसी कई नई संरचनाओं (बैराज, पिक-अप वियर इत्यादि) के निर्माण का उल्लेख किया गया है, जिसके लिए न तो पर्यावरण नियमों के तहत मंजूरी ली गई है, न इसके प्रभाव का आकलन हुआ है और न ही इस कार्य में आने वाले अतिरिक्त खर्च का कोई लेखा-जोखा पेश किया गया है.

जल शक्ति मंत्रालय ने ऐसा करते हुए बेहद चालाकी से शब्दों का हेर-फेर कर इन प्रवाधानों को जोड़ दिया है.

द वायर  द्वारा सूचना का अधिकार कानून के तहत प्राप्त किए गए दस्तावेजों से ये जानकारी सामने आई है. केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना की पर्यावरणीय एवं इकोलॉजिकल आधार पर विरोध होने के साथ-साथ इसके तहत नॉन-मानसून सीजन में जल बंटवारे को लेकर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच कई सालों तक विवाद चलता रहा था. 

साल 2005 में इस प्रोजेक्ट को लेकर साइन किए गए एमओयू (मेमोरैंडम ऑफ एग्रीमेंट) में कहा गया था कि यूपी को 1,700 मिलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) पानी दिया जाएगा.

एक क्यूबिक मीटर में 1,000 लीटर और एक एमसीएम में एक अरब लीटर पानी होता है.

केन नदी. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

यूपी ने मांग की थी कि उनके लिए कुल आवंटित जल में से उन्हें नॉन-मानसून सीजन में 935 एमसीएम पानी चाहिए, जिस पर मध्य प्रदेश ने कड़ा विरोध जताते हुए कहा था कि वे इस सीजन में सिर्फ 700 एमसीएम पानी देने पर ही सहमति जता सकते हैं.

इसे लेकर दोनों राज्यों के बीच 3-4 सालों तक विवाद चलता रहा था, लेकिन इसका समाधान करने के लिए केंद्र ने जो रास्ता अपनाया है उसके चलते केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के तहत ऐसे कई अतिरिक्त संरचनाओं का भी निर्माण करना होगा,  जिसके लिए पर्यावरण संबंधी विभागों से मंजूरी नहीं ली गई है.

केंद्र ने दोनों राज्यों के बीच इस आधार पर डील साइन करवाई है कि नॉन-मानसून सीजन में उत्तर प्रदेश को जितना पानी चाहिए उसमें से 750 एमसीएम पानी केन-बेतवा प्रोजेक्ट से दिया जाएगा, वहीं बाकी की जरूरतों को महोबा जिले के खाली टैंकों को भरकर, क्षेत्र की पुरानी संरचनाओं की रिमॉडलिंग/मरम्मत/सुदृढ़करण करके और दो नए बैराजों को बनाकर किया जाएगा. जबकि प्रोजेक्ट के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआई) में इनका कोई जिक्र नहीं है.

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के पहले चरण में केन नदी के पास में स्थित दौधन गांव में एक बांध बनाया जाना है, जो 77 मीटर ऊंचा और 2,031 मीटर लंबा होगा. इसके अलावा 176 किलोमीटर लंबी केन-बेतवा लिंक नहर बनाई जाएगी, जिसके जरिये केन का पानी बेतवा बेसिन में लाया जाएगा. साथ ही 1.9 किलोमीटर और 2.5 किलोमीटर लंबी दो सुरंग भी बनाई जाएंगी.

उत्तर प्रदेश के संदर्भ में एग्रीमेंट में प्रावधान रखा गया है कि बरियारपुर पिक अप वियर, परीछा वियर और बरवा सागर डैम तथा इससे जुड़ी संरचनाओं एवं 7.1 किमी. लंबी बरवा नाले का मरम्मत/सुदृढ़करण/रिमॉडलिंग किया जाएगा. इसके अलावा दौधन बांध की निचली धारा में यूपी के क्षेत्र में दो नए बैराज बनाया जाएगा.

वहीं, मानसून सीजन में केन बेतवा लिंक नहर से महोबा जिले के टैंकों को भरने के लिए उनका नवीकरण/रेनोवेशन किया जाएगा और साथ ही इससे जुड़ी कुछ अन्य संरचना भी तैयार की जाएगी.

खास बात ये है इन सब के बीच शब्दों का काफी खेल किया है, ताकि ऐसा प्रतीत न हो कि कोई बड़ा अतिरिक्त निर्माण कार्य किया जाएगा.

बरियारपुर पिक अप वियर, परीछा वियर और बरवा सागर डैम को लेकर मरम्मत, सुदृढ़करण और रिमॉडलिंग जैसे तीन शब्दों का प्रयोग किया गया और ‘पुनर्निर्माण’ शब्द से बचा गया है, जबकि ये संरचनाएं इतनी पुरानी हो चुकी हैं कि इनके फिर से निर्माण के अलावा कोई और रास्ता नहीं है.

उत्तर प्रदेश सरकार ने भी केंद्र के इस तरीके पर आपत्ति जताई थी.

दस्तावेजों से पता चलता है कि राज्य सरकार ने जल शक्ति मंत्री के साथ बैठक के बाद 23 सितंबर 2020 को भेजे अपने पत्र में कहा था कि इन संरचनाओं के संबंध में ‘पुनर्निर्माण या इसकी जगह नया निर्माण’ शब्द जोड़ा जाना चाहिए.

परियोजना के तहत जल बंटवारे के संबंधित प्रावधान को लेकर यूपी द्वारा जताई गई आपत्ति और उस पर एनडब्ल्यूडीए की प्रतिक्रिया.

हालांकि इस प्रोजेक्ट को लागू कर रही जल शक्ति मंत्रालय की एजेंसी राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (एनडब्ल्यूडीए) ने अपने जवाब में कहा कि ‘रिमॉडलिंग’ शब्द ही रखा जाना चाहिए, क्योंकि इसका आशय जरूरत पड़ने पर पुनर्निर्माण कराना ही है.

उत्तर प्रदेश सरकार ने कई बार जोर देकर कहा है कि ये संरचनाएं अपना जीवनकाल (निर्धारित अवधि से अधिक हो चुकी है) पूरा कर चुकी हैं, इसलिए इसमें किसी भी तरह के संशोधन या मरम्मत की गुंजाइश नहीं है, इसका एकमात्र समाधान पुनर्निर्माण कराना ही है.

द वायर  ने इनमें से एक परीछा वियर की स्थिति का पता लगाने के लिए केंद्रीय मृदा एवं सामग्री अनुसंधान केंद्र (सीएसएमआरएस) के साथ एनडब्ल्यूडीए और यूपी जल विभाग के अधिकारियों के बीच हुए विचार-विमर्श की प्रति प्राप्त की है, जिसमें ये बताया गया है कि गाद जमा होने के चलते जलाशय की क्षमता घट गई है, जिसे वियर की जगह गेटों के साथ बैराज बनाकर सुधारा जा सकता है.

सीएसएमआरएस को ये काम दिया गया था कि वे इस वियर की नॉन-डिस्ट्रक्टिव टेस्टिंग करें, जिसके बाद ये निर्णय लिया जा सकेगा कि इसके नवनिर्माण की आवश्यकता है या फिर इसकी मरम्मत कर इसे मजबूत किया जाना चाहिए.

परीछा डैम अंग्रेजों के शासन में साल 1886 में बनाया गया था, जो अब 135 साल पुराना हो चुका है. इससे सिंचाई और झांसी जिले में जलापूर्ति की जाती है.

जल सचिव ने भी इस जल बंटवारे पर जताई थी आपत्ति

खास बात ये है कि खुद जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग के सचिव ने मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच जल बंटवारे के इन प्रवाधानों को स्वीकार नहीं किया था और कहा था कि यदि इस परियोजना के तहत ऐसी संरचनाओं का निर्माण करना स्वीकार किया जाता है, तो ये प्रोजेक्ट अलग ही दिशा में चला जाएगा.

दरअसल, उत्तर प्रदेश की जल मांगों की सत्यता का पता लगाने के लिए एनडब्ल्यूडीए ने राज्य के सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग के साथ बैठक की थी और क्षेत्र का दौरा किया था, जिसके आधार पर यूपी की मांगों को उचित करार दिया गया था.

लेकिन सरकारी आकलन के मुताबिक दौधन बांध में इतना पानी इकट्ठा ही नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश को नॉन-मानसून सीजन में 935 एमसीएम पानी दिया जा सके.

चूंकि ये मोदी सरकार का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ है और इसे हर हाल में लागू करने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है, इसलिए एनडब्ल्यूडीए ये रास्ता निकाला की इस सीजन में राज्य को 788/750 एमसीएम पानी दिया जाए और बाकी के 147 एमसीएम (935 एमसीएम- 788 एमसीएम) पानी की पूर्ति मानसून सीजन में महोबा जिले के खाली टैंकों को भरकर और दो नए बैराज बनाकर किया जाएगा.

इसके अलावा बरियारपुर पिक अप वियर, परीछा वियर और बरवा सागर डैम से जुड़े प्रावधानों को भी स्वीकार किया गया है.

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हालांकि इसे लेकर तत्कालीन सचिव यूपी सिंह ने कहा था कि यदि वे उत्तर प्रदेश की अन्य शर्तों जैसे कि अतिरिक्त बैराज बनाने और पुरानी संरचनाओं का पुनर्निर्माण या मरम्मत कराते हैं, तो केन-बेतवा लिंक अलग दिशा में चला जाएगा.

सिंह ने कहा था कि वे महोबा में ज्यादा से ज्यादा टैंकों को भरने की शर्त को स्वीकार कर सकते हैं.

खुद एनडब्ल्यूडीए के आंतरिक दस्तावेजों में लिखा है कि इन कार्यों में करीब 5,000 करोड़ रुपये का खर्चा आएगा. उसमें यह भी कहा गया है कि इसकी गहन जांच कर आकलन करने की जरूरत है, लेकिन ऐसा नहीं किया गया.

सरकार ने कहा है कि इस नदी जोड़ो परियोजना पर 35,111 करोड़ रुपये का खर्चा आएगा, लेकिन ये आकलन साल 2017-18 पर आधारित है. जाहिर है कि यूपी की शर्तों को शामिल करने के बाद इसमें काफी बढ़ोतरी होगी, लेकिन इसका अभी तक कोई लेखा-जोखा नहीं किया गया.

परियोजना की लागत बढ़ने का आशय यह होगा कि सरकार ने पर्यावरण मंत्रालय के सामने लागत पर जितना लाभ होने का दावा किया है, हकीकत में वैसा नहीं है.

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित सेंट्रल इम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) ने भी केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट की जांच करने के बाद 30 अगस्त 2019 को सौंपे अपनी रिपोर्ट में भी कहा था कि केंद्र सरकार द्वारा इसकी जितनी लागत बताई गई है, उससे कहीं अधिक ही खर्चा होगा.

इनकार के बाद भी जोड़ दिया बिजली का अंश

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के फेज-1 के तहत दो पावरहाउस बनाने का भी प्रावधान किया गया है, जिससे 78 मेगावॉट बिजली का उत्पादन होगा और इसका लाभ मध्य प्रदेश को मिलेगा.

हालांकि राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (एनबीडब्ल्यूएल) की स्थायी समिति इस परियोजना को मंजूरी देते हुए पावरहाउस बनाने पर सहमति नहीं जताई है.

इसके अलावा वन सलाहकार समिति (एफएसी) ने इस परियोजना को स्टेज-1 मंजूरी देते ये शर्त रखी थी कि पावरहाउस को पन्ना टाइगर के वन क्षेत्र से बाहर रखा जाना चाहिए.

उन्होंने कहा था, ‘राज्य सरकार और यूजर एजेंसी ये सुनिश्चित करेंगे कि 78 मेगावॉट के प्रस्तावित पावरहाउस को खाली किए जाने वाले वन भूमि में नहीं बनाया जाएगा, ताकि पन्ना टाइगर रिजर्व को निरंतर अशांति से बचाया जा सके.’

हालांकि दस्तावेज दर्शाते हैं कि सरकार ने दौधन बांध के कार्यक्षेत्र में ही 60 मेगावॉट और 18 मेगावॉट के दो पावरहाउस बनाने का प्रावधान कर रखा है. ये बांध पन्ना टाइगर रिजर्व की वन भूमि काटकर बनाया जाना है.

साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल (एसएएनडीआरपी) के कोऑर्डिनेटर हिमांशु ठक्कर ने कहा कि ये सीधे तौर पर वन सलाहकार समिति की शर्तों का उल्लंघन है.

उन्होंने कहा, ‘किसी भी सूरत में ये पावरहाउस इस क्षेत्र में नहीं बनाया जा सकता है. सरकार को पावरहाउस बनाने के लिए पूरे प्रोजेक्ट को फिर से डिजाइन करना होगा, क्योंकि उनका जो पुराना प्लान था, उसे एफएसी ने स्वीकार नहीं किया था. इसके लिए उनको फिर से पर्यावरणीय प्रभाव आकलन भी कराना होगा. वन मंजूरी की शर्तों का पालन कर पाना उनके लिए आसान नहीं होगा,’

उत्तर प्रदेश ने भी इससे अपने लिए बिजली मांगी थी, लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया गया.

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के तहत पन्ना टाइगर रिजर्व को व्यापक स्तर पर नुकसान पहुंचाया जाएगा.

ठक्कर ने 25 अगस्त 2017 को इस परियोजना को मिली पर्यावरणीय मंजूरी को नेशनल ग्रीम ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में चुनौती दी है. उन्होंने कहा कि एक तो पहले ही इस प्रोजेक्ट का पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (ईआईए) मनमाने तरीके से किया गया था, अब इसमें नई संरचनाओं को जोड़ना और उसके प्रभाव का मूल्यांकन न कराना एक अतिरिक्त उल्लंघन है.

विशेषज्ञ ने कहा, ‘इस प्रोजेक्ट को जो पर्यावरणीय मंजूरी दी गई है वह गैरकानूनी, मनमाना और अतार्किक है. इसी पूरी तैयारी, जन सुनवाई और मंजूरी तमाम तथ्यों को दरकिनार कर दिया गया था, जो एक समावेशी विकास की अवधारणा का उल्लंघन है. अब सरकार ने जो अतिरिक्त बैराज और पुराने प्रोजेक्ट को तोड़कर नया बनाने का प्रावधान किया गया है, इसके भी गंभीर प्रभाव होंगे, लेकिन कोई आकलन नहीं कराया गया. कागज से स्पष्ट है कि सरकार अतिरिक्त संरचनाएं बनाएगी, लेकिन वे खुलकर बोलना नहीं चाह रहे हैं.’

अन्य बदलाव

यदि अप्रैल 2010 के डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) और अक्टूबर 2018 की व्यापक रिपोर्ट को देखेंगे तो उसमें भी भारी अंतर देखने को मिलता है. इसमें कुछ नई संरचनाओं को जोड़ने के साथ-साथ मंजूरी प्राप्त संरचनाओं में भी काफी फेरबदल करने के प्रावधान किए गए हैं.

उदाहरण के लिए, साल 2010 की रिपोर्ट में केन-बेतवा लिंक नहर का जिस तरह निर्माण करने का वादा किया गया था, साल 2018 की रिपोर्ट में उसकी डिजाइन वगैरह में परिवर्तन कर दिया गया और इसके तहत माइक्रो इरिगेशन कराने के लिए पंपिंग स्टेशन, पाइपलाइन, प्रेशर टैंक, ट्रांसमिशन लाइन इत्यादि जोड़े गए हैं.

पहले इस नहर के जरिये प्रवाह सिंचाई (फ्लो इरिगेशन) करने की योजना बनाई गई थी, हालांकि अब पानी को पंप करके निकालने और उसे खेतों तक पहुंचाने की तैयारी की गई है. ये सिंचाई पद्धति ज्यादा कारगर नहीं है.

इसी तरह साल 2010 की रिपोर्ट में केन लेफ्ट बैंक नहर की लंबाई 57.30 किमी. रखी गई थी, जिसे 2018 में बढ़ाकर 90 किमी कर दिया गया और यह टेलिस्कोपिक पाइपलाइन के जरिये तैयार किया जाएगा. इसके जरिये भी पंप इरिगेशन होगा और अतिरिक्त संरचनाओं का निर्माण किया जाएगा.

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खास बात ये है कि पहले इस नहर के जरिये मध्य प्रदेश में 1.72 लाख हेक्टेयर सिंचाई होने का अनुमान लगाया गया था, लेकिन बाद में इसकी लंबाई एवं लागत बढ़ाने के बाद भी इसके लक्ष्य को घटाकर 1.39 लाख हेक्टेयर करना पड़ा है, जो माइक्रो इरिगेशन/प्रेशराइज्ड इरिगेशन के जरिये होगी.

वहीं, मध्य प्रदेश के अतिरिक्त 90101 हेक्टेयर भूभाग को सींचने के लिए अक्टूबर 2018 की व्यापक रिपोर्ट में पन्ना और हट्टा (दमोह) लिफ्ट इरिगेशन सिस्टम जोड़ा गया है, जिसका जिक्र पिछली रिपोर्ट में नहीं था.

जाहिर है इन सब संरचनाओं को जोड़ने से परियोजना की कुल लागत में वृद्धि होगी. पहले इसका लागत-लाभ अनुपात 1.70:1 था, यानी कि एक रुपये खर्च करने पर 70 पैसे का लाभ होता. लेकिन 2018 की रिपोर्ट में ये घटकर 1.58:1 हो गया है.

दस्तावेज दर्शाते हैं कि प्रोजेक्ट के तहत फ्लो इरिगेशन की जगह प्रेशराइज्ड या माइक्रो इरिगेशन का रास्ता अपनाने के कारण पंपिंग सिस्टम, ट्रांसमिशन लाइन्स, बीपीटी टैंक इत्यादि का प्रावधान करने से लागत में करीब 5,835 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है.

इसके अलावा पानी के वितरण माध्यमों (यू-डिस्ट्रीब्यूटरीज) में परिवर्तन करने से लागत में 1,668 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है. वैसे भी ये आंकड़े अक्टूबर 2018 तक के हैं, इसलिए यदि वर्तमान स्थिति के आधार पर इसका आकलन किया जाता है तो पूरी संभावना है कि इसमें और बढ़ोतरी होगी.

‘प्रोजेक्ट से विशेष फायदा नहीं होने का खतरा’

मोदी सरकार की ये परियोजना इस परिकल्पना पर आधारित है कि केन नदी में पानी की मात्रा ज्यादा है, इसलिए यहां के पानी को बेतवा बेसिन में पहुंचाकर वहां पर सिंचाई एवं पेयजल की सुविधा की जा सकती है.

इस संबंध में 75% डिपेंडीबिलिटी के फार्मूले पर 1982 से लेकर 2010 बीच कई अध्ययन किए गए हैं जिसमें न्यूनतम 4,490 एमसीएम से लेकर अधिकतम 6,590 एमसीएम पानी होने का दावा किया गया है.

साल 2010 में एनडब्ल्यूडीए द्वारा किए गए एक अध्ययन में बताया गया था कि दौधन बांध वाले स्थान पर 100% डिपेंडीबिलिटी पर केवल 3,830.1 एमसीएम ही पानी इकट्ठा होगा.

75% या 100% डिपेंडेबल यील्ड [Dependable Yield] का मतलब है कि नदी में पानी की मात्रा को जानने के लिए जितने सालों का अध्ययन कराया गया है, उसमें से 75 फीसदी या 100 फीसदी समय नदी में इतना पानी था.

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट पर साइन किए गए एग्रीमेंट और इसके ड्राफ्ट में भी काफी विरोधाभास है. एग्रीमेंट में कहा गया है कि दौधन बांध में 6,590 एमसीएम पानी इकट्ठा होगा, जबकि इसके ड्राफ्ट में लिखा है कि यहां 6,188 एमसीएम पानी जमा होगा. यह परियोजना की उपयोगिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

केन नदी से पीने के लिए पानी भरतीं दौधन गांव की महिलाएं. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

ये सभी अध्ययन सरकारी विभागों द्वारा ही किए गए हैं और इसकी किसी स्वतंत्र विशेषज्ञों की टीम से जांच नहीं कराई गई है. इसे लेकर सीईसी ने भी सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी.

उन्होंने कहा था कि केन और बेतवा नदी के कैचमेंट (जल क्षेत्र) में औसतन सिर्फ 90 सेंटीमीटर ही बारिश होती है. इसके काफी गंभीर परिणाम हो सकते हैं क्योंकि सूखे के दौरान दोनों नदियों के बेसिन में अनुमान से काफी कम पानी इकट्ठा होगा. 

हालांकि सरकार महज इतने ही पानी (बारिश) को इकट्ठा कर पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र के जल संकट को खत्म करने का दावा कर रही है. केंद्र ने कहा है कि दौधन बांध में एक अक्टूबर तक पानी की मात्रा 2,584 एमसीएम होगी, जिसमें से नॉन-मानसून (अक्टूबर से मई) सीजन में मध्य प्रदेश को 1,834 एमसीएम और उत्तर प्रदेश को 750 एमसीएम पानी दिया जाएगा.

इन दलीलों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट कमेटी ने कहा था कि डीपीआर के मुताबिक अपर बेतवा बेसिन में अनुमानित 384 एमसीएम पानी की कमी इसी वजह से है क्योंकि बेतवा बेसिन में बनाए गए पूर्ववर्ती सिंचाई परियोजनाओं के तहत यही वादा किया गया था कि बेतवा बेसिन में इकट्ठा होने वाले पूरे पानी को इसके निचले क्षेत्रों में भेजा जाएगा. 

सीईसी ने कहा कि अपर बेतवा बेसिन की कीमत पर निचले बेतवा बेसिन में सिंचाई व्यवस्था करने की त्रुटिपूर्ण प्लानिंग से सबक लेकर इस परियोजना के तहत ऐसी किसी गुंजाइश को खत्म करने पर विचार किया जाना चाहिए.

समिति ने कहा कि सरकार केन नदी के पानी को इसके लोवर बेसिन और बेतवा के अपर बेसिन में भेजने का जो दावा कर रही है, उसके चलते अपर केन बेसिन के किसान जल से जरूर वंचित हो जाएगा, नतीजन इस प्रोजेक्ट की उन्हें भारी कीमत चुकानी होगी.

इसलिए केन बेसिन के ऊपरी क्षेत्रों में सिंचाई की बेहतर सुविधा करने की संभावनाओं को तलाशे बिना ये कहना कि केन बेसिन के ‘अतिरिक्त’ पानी को बेतवा बेसिन में भेजा जा सकता है, अपरिपक्व प्रतीत होता है जबकि इस परियोजना के तहत करदाताओं के बेतहाशा पैसे खर्च होने वाले हैं.

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के तहत दौधन बांध बनाने के चलते 9,000 हेक्टेयर का क्षेत्र डूबेगा, जिसमें से सबसे ज्यादा 5,803 हेक्टेयर पन्ना टाइगर रिजर्व का होगा, जो बाघों के रहवास का प्रमुख क्षेत्र माना जाता है.

इसके अलावा 6,017 हेक्टेयर वन भूमि को खत्म किया जाएगा, जिसके चलते कम से कम 23 लाख पेड़ काटे जाएंगे. इसके साथ-साथ घड़ियाल अभयारण्य और गिद्धों का प्रजनन केंद्र भी गंभीर रूप से प्रभावित होंगे.

पन्ना टाइगर रिजर्व में कई ऐसे वन्यजीव पाए जाते हैं जो विलुप्त होने की कगार पर हैं. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

जब इसे लेकर द वायर  ने एनडब्ल्यूडीए के महानिदेशक भोपाल सिंह से सवाल किया तो उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड के विकास के लिए इससे अच्छी कोई और परियोजना नहीं हो सकती है.

सिंह ने कहा, ‘बुलदेलखंड क्षेत्र बार-बार बाढ़ और सूखे की चपेट में रहा है. चूंकि अधिकांश वर्षा मानसून की अवधि के दौरान कुछ दिनों में ही हो जाती है और नॉन-मानसून अवधि के दौरान पानी की उपलब्धता बहुत कम होती है, इसलिए क्षेत्र में नॉन-मानसून अवधि के दौरान पानी की बार-बार कमी होती रहती है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘इसलिए बड़े पैमाने पर एक ऐसी परियोजना की आवश्यकता है जो मानसून की अवधि के दौरान बाढ़ के पानी को इकट्ठा करने में मदद करेगी और विशेष रूप से सूखे के वर्षों के दौरान क्षेत्र में पानी की उपलब्धता को स्थिर करेगी. केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट इसमें सबसे ज्यादा कारगर है.’