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भीमा-कोरेगांव मामले के आरोपियों ने स्टेन स्वामी की ‘संस्थागत हत्या’ के ख़िलाफ़ भूख हड़ताल की

एल्गार परिषद- भीमा कोरेगांव मामले के 10 आरोपियों की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि एनआईए और तलोजा जेल के पूर्व अधीक्षक ने स्टेन स्वामी को प्रताड़ित करने का एक भी मौका नहीं छोड़ा चाहे वह जेल में भयावह बर्ताव हो, अस्पताल से उन्हें जेल में लाने की जल्दबाज़ी हो या पानी पीने के लिए सिपर जैसी छोटी सी चीज़ों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो, जिसकी स्वामी को अपने स्वास्थ्य के कारण ज़रूरत होती थी.

स्टेन स्वामी. (फोटो: रॉयटर्स)

मुंबई: एल्गार परिषद- भीमा कोरेगांव मामले के 10 आरोपियों ने नवी मुंबई में तलोजा जेल में एक दिन की भूख हड़ताल की. उन्होंने सह-आरोपी स्टेन स्वामी की ‘संस्थागत हत्या’ के विरोध में बुधवार को प्रदर्शन किया.

उन्होंने एल्गार परिषद मामले की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के अधिकारियों और तलोजा जेल के पूर्व अधीक्षक के खिलाफ कार्रवाई करने की भी मांग की.

आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी (84) को गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत अक्टूबर 2020 में रांची से एनआईए ने गिरफ्तार किया था और नवी मुंबई के तलोजा केंद्रीय कारागार में बंद रखा गया था.

उनका पांच जुलाई को मुंबई के एक अस्पताल में निधन हो गया. वह स्वास्थ्य आधार पर जमानत दिए जाने के लिए लड़ाई लड़ रहे थे. निधन के बाद उनके वकील मिहिर देसाई ने मामले में न्यायिक जांच की मांग की है.

इस मामले में अन्य आरोपियों ने स्वामी की मौत को ‘संस्थागत हत्या’ बताया और इसके लिए जेलों की लापरवाही, अदालतों की उदासीनता और जांच एजेंसियों की दुर्भावना को जिम्मेदार ठहराया.

प्रदर्शन के तौर पर मामले में सह-आरोपी रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, सुधीर धावले, महेश राउत, अरुण फेरेरा, वर्नोन गोन्साल्विस, गौतम नवलखा, आनंद तेलतुम्बडे, रमेश गाइचोर और सागर गोरखे बुधवार को तलोजा जेल में एक दिन की भूख हड़ताल पर चले गए.

उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को प्रदर्शन के बारे में सूचित किया. परिवार के सदस्यों ने एक बयान जारी कर कहा कि एल्गार मामले के सभी कैदियों ने फादर स्टेन स्वामी की मौत के लिए एनआईए और तलोजा जेल के पूर्व अधीक्षक कौस्तुभ कुर्लेकर को जिम्मेदार ठहराया है.

प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि उनका मानना है कि स्टेन स्वामी को उनसे अलग करना सोची समझी संस्थागत हत्या है.

बयान में कहा गया है कि एनआईए और कुर्लेकर ने स्टेन स्वामी को प्रताड़ित करने का एक भी मौका नहीं छोड़ा चाहे वह जेल में भयावह बर्ताव हो, अस्पताल से उन्हें जेल में लाने की जल्दबाजी हो या पानी पीने के लिए सिपर जैसी छोटी सी चीजों के खिलाफ प्रदर्शन हो, जिसकी स्वामी को अपने स्वास्थ्य के कारण जरूरत होती थी.

बयान में उनकी मौत की न्यायिक जांच की मांग करते हुए कहा गया है, ‘इन वजहों से स्टेन स्वामी की मौत हुई और अत: इस संस्थागत हत्या के लिए एनआईए अधिकारियों और कुर्लेकर पर भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के तहत मुकदमा चलना चाहिए.’

बयान में कहा गया है कि आरोपियों के परिवार के सदस्य तलोजा जेल प्रशासन के जरिये महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के समक्ष इन मांगों को रखेंगे.

इसमें यह भी कहा कि अलग-अलग बैरक में बंद होने के बावजूद ये आरोपी मंगलवार को मिले और उन्होंने फादर स्टेन स्वामी की अपनी यादों को साझा किया तथा उनकी याद में दो मिनट का मौन भी रखा.

मामले में तीन महिला आरोपी- सुधा भारद्वाज, शोमा सेन और ज्योति जगताप मुंबई में भायखला जेल में बंद हैं.

मालूम हो कि एल्गार परिषद मामले में एनआईए द्वारा गिरफ्तार किए जाने वाले स्टेन स्वामी सबसे वरिष्ठ और 16वें व्यक्ति थे. स्टेन स्वामी अक्टूबर 2020 से जेल में बंद थे.

वह पार्किंसंस बीमारी से जूझ रहे थे और उन्हें गिलास से पानी पीने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था. इसके बावजूद स्टेन स्वामी को चिकित्सा आधार पर कई बार अनुरोध के बाद भी जमानत नहीं दी गई.

इस साल मई में स्वामी ने उच्च न्यायालय की अवकाश पीठ को वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से बताया था कि तलोजा जेल में उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ता ही रहा है.

उन्होंने उच्च न्यायालय से उस वक्त अंतरिम जमानत देने का अनुरोध किया था और कहा था कि अगर चीजें वहां ऐसी ही चलती रहीं तो वह ‘बहुत जल्द मर जाएंगे.’ वे अपने आखिरी समय में रांची में अपने लोगों के साथ रहना चाहते थे.

स्टेन स्वामी की मौत को लेकर उनके करीबियों के अलावा कई राजनीतिक दलों ने भी गहरी नाराजगी जताई है और उनकी मौत के लिए केंद्र सरकार एवं जांच एजेंसियों को जिम्मेदार ठहराया है.

विपक्ष ने स्वामी के निधन को ‘हिरासत में हत्या’ बताते हुए कहा है कि वे इस मामले को संसद में उठाएंगे और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करेंगे.

गौरतलब है कि एल्गार परिषद मामले में स्वामी और सह-आरोपियों को राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) ने आरोपित किया है. एजेंसी के मुताबिक आरोपी मुखौटा संगठन के सदस्य हैं जो प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) के लिए काम करता है.

एनआईए ने पिछले महीने हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल कर स्वामी की जमानत याचिका का विरोध किया था. एजेंसी ने कहा कि उनकी बीमारी का ‘निर्णायक सबूत’ नहीं है. हलफनामे में कहा गया कि स्वामी माओवादी हैं, जिन्होंने देश में अशांति पैदा करने की साजिश रची.

एल्गार परिषद मामला पुणे में 31 दिसंबर 2017 को आयोजित संगोष्ठी में कथित भड़काऊ भाषण से जुड़ा है. पुलिस का दावा है कि इस भाषण की वजह से अगले दिन शहर के बाहरी इलाके में स्थित कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई. पुलिस का दावा है कि इस संगोष्ठी का आयोजन करने वालों का संबंध माओवादियों के साथ था.

(समाचार एजेंसी पीटीआई से इनपुट के साथ)