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एल्गार परिषदः एनआईए को जांच सौंपे जाने के ख़िलाफ़ याचिका दायर, एजेंसी ने किया विरोध

एनआईए ने एल्गार परिषद मामले में आरोपी मानवाधिकार वकील सुरेंद्र गाडलिंग और कार्यकर्ता सुरेंद्र धावले द्वारा दायर याचिका के जवाब में बॉम्बे हाईकोर्ट में हलफनामा दायर किया है. याचिका में केंद्र सरकार के जनवरी 2020 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसके तहत महाराष्ट्र की पुणे पुलिस से मामले की जांच एनआईए को स्थानांतरित की गई थी.

बॉम्बे हाईकोर्ट (फोटो: पीटीआई)

मुंबईः राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने एल्गार परिषद मामले में आरोपी सुरेंद्र गाडलिंग और सुधीर धावले की याचिका का विरोध करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट से कहा कि यह जांच को असफल करने का प्रयास है और नक्सलवाद ने कई स्तरों पर नुकसान पहुंचाया है.

बता दें कि सुरेंद्र गाडलिंग और सुधीर धावले ने एल्गार परिषद मामले की जांच एनआईए को सौंपे जाने के फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, एनआईए ने अदालत में हलफनामा दायर कर कहा है कि एल्गार परिषद मामले में जांच को असफल करने का प्रयास किया जा रहा है.

मामले में गाडलिंग और धावले का अदालत में प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता सतीश बी. तालेकर ने जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस एनजे जामदार की पीठ को बताया कि केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार को अभी अपने जवाब दाखिल करने हैं.

एनआईए की ओर से मामले की पैरवी कर रहे अधिवक्ता संदेश पाटिल ने कहा कि वह एजेंसी द्वारा दायर किए गए हलफनामे से वाकिफ नहीं हैं.

उन्होंने कहा, ‘एनआईए का प्रतिनिधित्व कर रहे पहले के वकील को इसे दायर किया होगा. मुझे इसे देखना होगा और इसमें एक हफ्ते का समय लगेगा.’

बता दें कि एल्गार परिषद मामले में गाडलिंग और धावले आरोपी हैं और इस मामले में प्रतिबंधित माओवादी संगठन के साथ कथित तौर पर मिलकर साजिश रचने के आरोप में पुणे पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है.

मामले की जांच 24 जनवरी 2020 को एनआईए को सौंप दी गई थी. एनआईए की मुंबई ब्रांच के एसपी विक्रम खलाते की ओर से दायर किए गए हलफनामे में कहा गया कि जिन अपराधों के तहत दो व्यक्तियों पर मामला दर्ज किया गया है, इनकी जांच किसी भी समय राज्य से लेकर केंद्रीय एजेंसियों को दी जा सकती है.

हलफनामे में कहा गया कि अपराध की गंभीरता और राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए केंद्र ने स्वत: संज्ञान लेते हुए एनआईए को मामले की जांच करने का निर्देश दिया था.

गाडलिंग और धावले ने कहा था कि एफआईआर दर्ज होने के दो साल बाद मामले को एनआईए को स्थानांतरित करने के लिए कोई बाध्यकारी कारण नहीं थे और जांच पूरी होने और सुनवाई लगभग शुरू होने पर ऐसे कोई प्रावधान नहीं थे, जिससे जांच एनआईए को सौंपनी पड़े.

उन्होंने कहा कि जब महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी गठबंधन ने मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित करने का प्रस्ताव रखा था तब मामला दुर्भावनापूर्ण और राजनीतिक कारणों से स्थानांतरित किया गया था.

इस याचिका में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और हिंदुत्व नेता मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े का भी नाम शामिल है.

याचिका में कहा गया है कि एकबोटे और भिड़े को एक जनवरी 2018 में भीमा कोरेगांव स्मारक का दौरा करने के दौरान दलितों पर हमले से जुड़ी एफआईआर में नामजद होने के बावजूद राज्य से संरक्षण मिला.

एनआईए ने अपने हलफनामे में कहा कि याचिका में आरोप लापरवाही से और अदालत को गुमराह करने और एनआईए द्वारा की जा रही जांच को असफ करने के उद्देश्य से लगाए गए जबकि एनआईए देश में गैरकानूनी एवं आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए लड़ रही है, जिसमें नक्सलवाद ने कई स्तरों पर नुकसान पहुंचाया है.

हलफनामे में कहा गया कि जांच जिम्मेदारी से और सर्वाधिक पेशेवर तरीके से की जा रही है और आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वीकार किया है.

एनआईए ने कहा कि आरोपी के खिलाफ की गई कार्रवाई पूरी तरह से आपत्तिजनक सामग्री सबूतों पर आधारित है, जिससे इस मामले में उनकी संलिप्तता का पता चलता है.

हलफनामे में कहा गया, ‘मामले में किसी भी आरोपी के खिलाफ एनआईए का कोई निजी एजेंडा नहीं है जैसा कि याचिकाकर्ता पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. याचिकाकर्ताओं ने एनआईए के खिलाफ इस तरह के आरोप लगाकर आपराधिक न्याय प्रणाली पर सीधा हमला किया है. मौजूदा याचिकाकर्ता और मामले के अन्य आरोपियों ने प्रत्यक्ष तौर पर या अन्य के जरिए रिट याचिका दायर करने की परंपरा बना ली है, विशेष रूप से जब जांच जारी है.’