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विरोध के बीच प्रॉक्सी वोटिंग के सहारे केंद्र सरकार ने बदला रक्षा थिंक-टैंक का नाम

नरेंद्र मोदी सरकार ने गुरुवार को पूर्व भाजपा नेता और पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के नाम को देश के प्रतिष्ठित थिंक-टैंक में से एक रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान में जोड़ने के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया. हालांकि कुछ समय पहले ही संस्थान के पूर्व निदेशक समेत कई सदस्यों ने इस कदम का विरोध किया था.

(फोटो: www.idsa.in)

नई दिल्ली: नरेंद्र मोदी सरकार ने गुरुवार को पूर्व भाजपा नेता और पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के नाम को देश के प्रतिष्ठित थिंक-टैंक में से एक रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान (आईडीएसए) में जोड़ने के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया.

हालांकि, कुछ समय पहले ही संस्थान के पूर्व निदेशक समेत उसके कई सदस्यों ने इस कदम का विरोध किया था.

उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल के निर्णय पर दुख और निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि आदर्श रूप से केवल कार्यकारी परिषद को यह निर्णय लेने का अधिकार था लेकिन इस मामले में इसे दरकिनार कर दिया गया.

इससे पहले द वायर ने बताया था कि पूर्व रक्षा मंत्री का नाम केंद्र सरकार द्वारा 56 साल पुरानी संस्था के नाम में बिना परामर्श या सोसायटी अधिनियम द्वारा अनिवार्य उसकी कार्यकारी परिषद की मंजूरी के बिना जोड़ा गया था.

चूंकि संस्थान रक्षा मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित होता है, इसलिए केंद्र ने पर्रिकर के निधन के बाद पिछले साल फरवरी में इसका नाम पर्रिकर के नाम पर रखने का फैसला किया था.

चूंकि कार्यकारी परिषद से परामर्श नहीं किया गया था, बाद में इसने इस मामले में अंतिम निर्णय आम सभा पर छोड़ दिया, जिसकी अब एक वर्ष से अधिक समय के बाद बैठक हुई.

चूंकि आईडीएसए के अध्यक्ष के रूप में कार्यवाही की अध्यक्षता करने वाले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अनुपस्थित थे इसलिए पूर्व केंद्रीय गृह सचिव और कार्यकारी परिषद के सदस्य जीके पिल्लई ने संचालन किया.

तीन घंटे तक सदस्यों ने नाम परिवर्तन के मुद्दे पर चर्चा की और तीन सदस्यों को परिषद में नियुक्त करने के लिए भी मतदान किया, जबकि चार अन्य निर्विरोध चुने गए.

जैसा कि पहले द वायर  द्वारा रिपोर्ट किया गया था, एजीएम के एजेंडा में मुख्य काम नाम बदलना था.

हालांकि, पूर्व में कार्यकारी परिषद के कई सदस्यों ने इस कदम पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि वे पर्रिकर का सम्मान करते हैं, लेकिन यह सबसे अच्छा है कि आईडीएसए को वैसे ही छोड़ दिया जाए.

उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि पर्रिकर के नाम पर आईडीएसए में एक कुर्सी स्थापित की जा सकती थी या फिर भी राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय का नाम पर्रिकर के नाम पर रखा जा सकता था ताकि उन्हें बेहतर सम्मान मिल सके.

यह भी तर्क दिया गया कि संस्थान एक विश्व प्रसिद्ध थिंक-टैंक है और नाम में बदलाव केवल भ्रम पैदा करेगा क्योंकि भारत के बाहर कुछ ही लोग पर्रिकर के बारे में जानते हैं.

हालांकि, एजीएम के दौरान अधिकांश सदस्यों ने यह विचार व्यक्त किया कि चूंकि नाम बदलने का निर्णय पहले ही लिया जा चुका है, इसे जारी रखा जाना चाहिए.

आईडीएसए के एक पूर्व निदेशक ने द वायर  से बात करते हुए कहा, ‘यह थोड़ी सक्रिय बैठक थी जिसमें कई वक्ताओं ने स्वायत्तता का मुद्दा उठाया. सदस्यों के विचार अलग-अलग थे जिसमें हमारे समूह का मानना था कि आईडीएसए का नाम बदलना उचित नहीं है, लेकिन अंत में नियमों का हवाला देते हुए उन्होंने मामले को आगे बढ़ाया.’

उन्होंने कहा, ‘वक्ताओं में से लगभग 7-9 ने नाम बदलने के कदम के खिलाफ बात की जबकि 12-14 ने इसके पक्ष में बात की होगी. कई लोगों ने नाम परिवर्तन पर अपनी निराशा व्यक्त की और उनकी मुख्य चिंता इस बात की थी कि यह पर्रिकर के बारे में नहीं था, बल्कि यह प्रक्रिया के बारे में था.’

उन्होंने यह भी कहा कि आईडीएसए के कम से कम तीन पूर्व निदेशकों ने इस पूरे मामले में निराशा व्यक्ति की.

प्रॉक्सी वोटों की गिनती से प्रस्ताव पर उठे सवाल

प्रस्ताव पर मतदान के लिए पहली बार प्रॉक्सी सिस्टम की अनुमति दी गई थी. अंत में अधिकांश वोट प्रॉक्सी वोट थे जो मतपत्र पर मतदाता के नाम पर थे.

एक निवर्तमान ईसी सदस्य और जेएनयू में प्रोफेसर एमेरिटस एसडी मुनि ने कहा, एजीएम में उन्होंने (केंद्र सरकार) लगभग 100 वोटों के साथ नाम में परिवर्तन कराया. प्रस्ताव के खिलाफ केवल 30 वोट पड़े क्योंकि उन्होंने सब कुछ अपने पक्ष में कर लिया था.

हालांकि, उन्होंने कहा कि जबकि बहस विरोध में थी, लेकिन लगभग 70-80 प्रॉक्सी वोट ने प्रस्ताव को पारित कर दिया. मुनि ने कहा, ‘और फिर नाम परिवर्तन के पक्ष में कुछ वोट जोड़े गए क्योंकि उन्होंने मतदाताओं को लामबंद किया था. जो लोग कभी बैठक में नहीं आए वे इसके लिए आए. इस संबंध में उन्हें आदेश दिए गए थे. हम जानते थे कि ऐसा होगा.’

कार्यकारी परिषद की सदस्यता के मुद्दे पर भी प्रोफेसर ने कहा, ‘एक बहस हुई और यह स्पष्ट हो गया कि केंद्र सरकार कुछ सदस्यों को बाहर करना चाहती है.’

उन्होंने जोर देकर कहा कि मतदान सबसे बड़ा छलावा था. उन्होंने कहा, ‘एक प्रॉक्सी वोट में आपको मतपत्र को बॉक्स में डालने से पहले उस पर हस्ताक्षर करना होता है. इससे सबको पता चल जाता है और फिर जब सरकार आपको बुलाती है और आपको एक विशेष तरीके से वोट देने के लिए कहती है, तो कुछ ऐसे होते हैं जो अलग तरह से कार्य करते हैं.’

कार्यकारी परिषद के एक अन्य सदस्य ने बताया कि आम तौर पर यह परंपरा रही है कि हमारे यहां इस प्रकार के चुनाव नहीं होते हैं.

तीन पदों के लिए चुनाव हुए, तो चार निर्विरोध चुने गए

मीडिया के एक व्यक्ति के लिए निर्धारित पद पूर्व भाजपा सांसद तरुण विजय ने जीता था. वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिंदी साप्ताहिक पांच्यजन्य के पूर्व संपादक भी हैं. उन्होंने जाने-माने अर्थशास्त्री जी. बालचंद्रन को हराया, जो आईडीएसए में सलाहकार और अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के चाचा भी हैं.

वहीं, एक शिक्षाविद वर्ग में पिछले 14 सालों में पहली बार एक महिला जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की प्रोफेसर केपी विजयलक्ष्मी चुनी गईं. उनका मुकाबला दूसरा कार्यकाल चाहने वाले प्रोफेसर मुनि से था.

आईडीएसए की कार्यकारी परिषद में भी रक्षा सेवाओं के लिए तीन पद रखे गए हैं. तो इस श्रेणी में एडमिरल शेखर सिन्हा और एयर मार्शल वीके ‘जिमी’ भाटिया दूसरा कार्यकाल चाह रहे थे. वे दोनों निर्विरोध चुने गए.

सेना पद के लिए लेफ्टिनेंट जनरल राकेश शर्मा को निर्विरोध चुना गया क्योंकि लेफ्टिनेंट जनरल सतीश दुआ ने नाम वापस ले लिया. शर्मा ने लेफ्टिनेंट जनरल प्रकाश मेनन की जगह ली, जिनका कार्यकाल समाप्त हो गया.

भारतीय विदेश सेवा श्रेणी में, भारत के उपराष्ट्रपति के पूर्व सचिव स्वशपवन सिंह की जगह कजाकिस्तान, स्वीडन और लातविया में भारत के पूर्व राजदूत अशोक सज्जनहार ने ली.

वहीं, ‘अन्य’ श्रेणी में जिसका प्रतिनिधित्व पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई, नए पदाधिकारी भारतीय राजस्व सेवा से जयंत मिश्रा हैं जिन्होंने पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई की जगह ली है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)