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अफ़ग़ानिस्तान संकट: ताशकंद सम्मेलन में इमरान ख़ान की मौजूदगी में पाकिस्तान पर बरसे अशरफ़ ग़नी

अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी का जवाब देते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में उथल-पुथल से सबसे ज़्यादा प्रभावित देश पाकिस्तान है. उन्होंने कहा कि वह ग़नी की टिप्पणियों से मायूस हैं और तालिबान को बातचीत की मेज पर लाने के लिए पाकिस्तान ने जितनी कोशिशें की हैं, उतनी किसी भी मुल्क ने नहीं की हैं.

इमरान खान और अशरफ गनी. (फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने ताशकंद में हो रहे एक क्षेत्रीय सम्मेलन में अफगानिस्तान में विदेशी आतंकवादियों के प्रवेश और तालिबान को शांति वार्ता में गंभीरता से शामिल होने के लिए प्रभावित करने में नाकाम रहने को लेकर पाकिस्तान की शुक्रवार को आलोचना की.

गनी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, चीनी विदेश मंत्री वांग यी, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर, रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और कई अन्य देशों के नेताओं और प्रतिनिधियों की उपस्थिति में पाकिस्तान की कड़ी आलोचना की.

‘मध्य और दक्षिण एशिया: क्षेत्रीय संपर्क, चुनौतियां और अवसर’ पर सम्मेलन में गनी ने कहा, ‘खुफिया अनुमान संकेत देते हैं कि पिछले महीने पाकिस्तान और अन्य स्थानों से 10,000 से अधिक जिहादी लड़ाके (अफगानिस्तान में) दाखिल हुए हैं.’

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान शांति वार्ता में हिस्सा लेने के लिए तालिबान को प्रभावित करने और आतंकवादियों की सीमा पार गतिविधियों को रोकने के आश्वासन को पूरा करने में नाकाम रहा है.

तालिबान पिछले कुछ हफ्तों में पूरे अफगानिस्तान में तेजी से आगे बढ़ रहा है और देश के बड़े हिस्से पर कब्जा कर रहा है. अमेरिका ने अपने अधिकांश सुरक्षाबलों को वापस बुला लिया है और 31 अगस्त तक शेष बलों को वापस बुलाने का लक्ष्य रखा है.

गनी ने कहा कि प्रधानमंत्री खान और उनके जनरलों ने बार-बार आश्वासन दिया कि अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान का आना पाकिस्तान के हित में नहीं है.

उन्होंने कहा कि तालिबान का समर्थन करने वाले नेटवर्क और संगठन अफगान लोगों और राज्य की संपत्तियों एवं क्षमताओं के नष्ट होने का खुले तौर पर जश्न मना रहे हैं.

अफगान राष्ट्रपति ने कहा कि विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों के बीच एक आम सहमति है कि तालिबान ने आतंकवादी संगठनों के साथ अपने संबंधों को तोड़ने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है.

उन्होंने कहा, ‘हम लोग और अफगानिस्तान की सरकार पूरी तरह से मौजूदा वक्त पर ध्यान केंद्रित किए हुए है और एक राष्ट्र के रूप में अपने अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.’

गनी ने कहा, ‘हम तालिबान और उनके समर्थकों का तब तक सामना करने के लिए तैयार हैं, जब तक उन्हें यह एहसास नहीं हो जाता कि राजनीतिक समाधान ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है.’

गनी ने कहा, ‘हम तालिबान से युद्ध और विनाशकारी हालिया हमलों को रोकने के लिए अफगानिस्तान की सरकार के साथ बातचीत करने का आह्वान करते हैं. साथ ही, हम पाकिस्तान से शांति और शत्रुता की समाप्ति के लिए अपने प्रभाव का उपयोग करने की अपील करते हैं.’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, गनी को जवाब देते हुए इमरान खान ने कहा, ‘राष्ट्रपति गनी, मैं बस इतना कह दूं कि अफगानिस्तान में उथल-पुथल से सबसे ज्यादा प्रभावित देश पाकिस्तान है. पिछले 15 वर्षों में पाकिस्तान को 70,000 हताहतों का सामना करना पड़ा. आखिरी चीज जो पाकिस्तान चाहता है वह है संघर्ष.’

उन्होंने कहा कि अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के लिए एक तारीख निर्धारित करने के बाद तालिबान अब समझौता करने को तैयार नहीं था.

उन्होंने कहा, ‘जब 150,000 नाटो सैनिक थे, तब तालिबान को बातचीत के लिए कहने का समय आ गया था. एक बार बाहर निकलने की तारीख दिए जाने के बाद तालिबान समझौता क्यों करेगा. जब वे जीत का आभास कर रहे हैं तो वे हमारी क्यों सुनेंगे?’

खान ने कहा कि मुश्किल दौर से गुजरने के बाद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था आखिरकार ठीक हो रही है. उन्होंने कहा, ‘मैं दोहराता हूं, आखिरी चीज जो हम चाहते हैं वह अफगानिस्तान में अशांति है.’

खान ने दावा किया कि किसी भी देश ने तालिबान को बातचीत के लिए मेज पर लाने के लिए पाकिस्तान से ज्यादा कोशिश नहीं की.

उन्होंने कहा, ‘हमने पाकिस्तान में तालिबान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने, उन्हें वार्ता की मेज पर लाने और (अफगानिस्तान में) एक शांतिपूर्ण समझौता करने के लिए हरसंभव प्रयास किया है. अफगानिस्तान में जो हो रहा है उसके लिए पाकिस्तान को दोष देना बेहद अनुचित है.’

अपने संबोधन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा कि वह गनी की टिप्पणियों से मायूस हैं और तालिबान को बातचीत की मेज पर लाने के लिए पाकिस्तान ने जितनी कोशिशें की हैं, उतनी किसी भी मुल्क ने नहीं की हैं.

वहीं, एक टीवी चैनल के एक सवाल के जवाब में कि क्या बातचीत और आतंकवाद साथ-साथ चल सकते हैं, उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे संबंधों के लिए आरएसएस की विचारधारा को बाधा बताया.

मालूम हो कि युद्ध से जर्जर अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की रवानगी और देश के अधिकतर क्षेत्रों पर तेजी से बढ़ते तालिबान के नियंत्रण के बीच चरमपंथी समूह ने बीते दिनों दावा किया था कि देश के 85 प्रतिशत हिस्से पर अब उसका कब्जा है. हालांकि अफगानिस्तान सरकार के अधिकारियों ने इस दावे को खारिज कर दिया था कि तालिबान ने देश के अधिकांश हिस्से को नियंत्रित किया है.

इस बीच भारत ने कंधार के आसपास के नए इलाकों पर तालिबान के कब्जे के मद्देनजर अपने वाणिज्य दूतावास से करीब 50 राजनयिकों और सुरक्षाकर्मियों को वापस बुला लिया था. अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा अफगानिस्तान में वर्षों से चल रहे युद्ध को समाप्त करने की घोषणा मध्य अप्रैल में किए जाने के बाद तालिबान ने पूरे देश में अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं.

हालांकि, इस बीच भारत की चिंता तब बढ़ गई जब बीते शुक्रवार को अफगानिस्तान में अफगान बलों और तालिबानी आतंकवादियों के बीच जंग को कवर करने के दौरान समाचार एजेंसी रॉयटर्स के लिए काम करने वाले पुलित्जर पुरस्कार विजेता भारतीय फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी की मौत हो गई.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)