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स्टेन स्वामी: अदालत ने कहा, कितने वर्षों तक लोगों को बिना सुनवाई के जेल में रखा जा सकता है

भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद मामले में यूएपीए के तहत पिछले साल आठ अक्टूबर को गिरफ़्तार किए गए 84 वर्षीय आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी का निधन ​पांच जुलाई को मेडिकल आधार पर ज़मानत का इंतज़ार करते हुए अस्पताल में हो गया था. मेडिकल आधार पर ज़मानत याचिका ख़ारिज किए जाने के विशेष अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ स्वामी ने हाईकोर्ट में अपील की थी, जिसकी अदालत उनके मरणोपरांत सुनवाई कर रही है.

बॉम्बे हाईकोर्ट (फोटो: पीटीआई)

मुंबईः बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी के काम की सराहना करते हुए सुनवाई शुरू होने के इंतजार में जेल में बंद विचाराधीन कैदियों के मामले पर प्रकाश डाला.

स्टेन स्वामी का मेडिकल आधार पर जमानत का इंतजार करते हुए बीते पांच जुलाई को न्यायिक हिरासत में निधन हो गया था.

अदालत ने कहा, ‘कितने वर्षों तक लोग बिना मुकदमे के जेल में रहने के लिए बाध्य हो सकते हैं?’

मेडिकल आधार पर जमानत याचिका खारिज किए जाने के विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ स्वामी ने हाईकोर्ट में अपील की थी, जिसकी अदालत उनके मरणोपरांत सुनवाई कर रही है.

एनआईए ने एल्गार परिषद मामले में स्टेन स्वामी की कथित भूमिका के आरोप में उन्हें आठ अक्टूबर 2020 को गिरफ्तार किया था. इस कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार के आलोचकों के खिलाफ ‘विचहंट’ करार दिया गया था.

एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार किए गए स्टेन स्वामी 16वें और सबसे उम्रदराज शख्स थे.

गिरफ्तारी के समय वह पार्किंसंस बीमारी से जूझ रहे थे और जेल में रहने के दौरान उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो चुका था.

जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस एनजे जमादार ने स्टेन स्वामी को बेहतरीन शख्स बताते हुए उनके काम के प्रति गहन सम्मान जताया.

दोनों न्यायाधीश पांच जुलाई को फादर स्टेन स्वामी की मेडिकल जमानत याचिका की सुनवाई कर रहे थे, लेकिन उसी दिन हाईकोर्ट को मुंबई के होली फैमिली अस्पताल में उनके निधन की सूचना दी गई.

जस्टिस शिंदे ने कहा, ‘हमारे पास सामान्य तौर पर समय का अभाव है. वह बहुत ही बेहतरीन इंसान थे. समाज के लिए उन्होंने जिस तरह का काम किया है, उनके काम के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान है. कानूनी तौर पर उनके खिलाफ जो भी है, वह अलग मामला है.’

पीठ ने इस दौरान उस आलोचना का भी उल्लेख किया जो राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और न्यायपालिका को स्वामी के निधन के बाद मिली थी.

उन्होंने खेद जताया कि किस तरह कई मामलों में विचाराधीन कैदी सुनवाई शुरू होने के इंतजार में सालों जेल में बंद रहते हैं.

पीठ ने यह भी कहा कि उन्होंने स्वामी की जमानत याचिका और एल्गार परिषद मामले में उनके सह आरोपियों द्वारा दायर याचिकाओं पर आदेश पारित करते समय निष्पक्ष रहने का प्रयास किया है.

अदालत ने स्वामी के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर देसाई से कहा, ‘आप 28 मई को उनकी मेडिकल जमानत याचिका के साथ हमारे पास आए थे और हमने हर बार हर आग्रह को स्वीकार किया था.’

हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि अदालत ने स्वामी के वकील द्वारा उदासीनता, लापरवाही और चिकित्सा सुविधाओं की कमी के दावों की सत्यता निर्धारित करने के लिए उनकी याचिका लंबित रखी थी.

हाईकोर्ट ने कहा, ‘बाहर, हम निशब्द हैं. सिर्फ आप (देसाई) ही स्पष्ट कर सकते हैं. आपने रिकॉर्ड में कहा है कि इस मामले में आपको इस अदालत से कोई शिकायत नहीं है.’

स्वामी के निधन के बाद मिहिर देसाई ने मामले में न्यायिक जांच की मांग की थी.

स्वामी की गिरफ्तारी के बाद से ही उनका अदालत में प्रतिनिधित्व कर रहे देसाई ने अदालत को बताया था कि उनकी होली फैमिली अस्पताल या हाईकोर्ट के खिलाफ कोई शिकायत नहीं है, लेकिन उन्होंने एनआईए और तलोजा सेंट्रल जेल को स्वामी के निधन के लिए जिम्मेदार ठहराया था.

हाईकोर्ट ने कहा था कि किसी ने भी उल्लेख नहीं किया कि यह वही अदालत है, जिसने स्वामी के सह-आरोपी वरवरा राव को जबरदस्त विरोध के बावजूद जमानत दी थी.

हाईकोर्ट ने कहा, ‘हमने राव के परिवार को उनसे मिलने दिया, क्योंकि हमें लगा कि मानवीय कोण को भी देखा जाना चाहिए. एक अन्य मामले में हेनी बाबू को उनकी पसंद के अस्पताल (ब्रीच कैंडी अस्पताल) में भेजा गया.’

हाईकोर्ट ने स्वामी की लंबित मेडिकल जमानत याचिका का उल्लेख करते हुए कहा, ‘हमने कभी उम्मीद नहीं की थी कि स्वामी का निधन हिरासत में होगा. हमारे दिमाग में जो था, हम उसे अभी नहीं कह सकते, क्योंकि हम अपना फैसला नहीं सुना सके.’

स्वामी ने अपनी जेल अवधि के दौरान सबसे अधिक समय तलोजा जेल के अस्पताल में बिताया. वह दो बार मुंबई में सरकारी जेजे अस्पताल में भी भर्ती रहे और उसके बाद 28 मई को उन्हें निजी अस्पताल होली फैमिली ले जाया गया.

वकील का जवाब

हाईकोर्ट की टिप्पणियों के बाद सोमवार को देसाई ने कहा, ‘मैं ऑन रिकॉर्ड कह दूं कि मैं इस मामले की सुनवाई करने वाली हाईकोर्ट की विभिन्न पीठों से बेहद खुश हूं.’

देसाई ने हालांकि हाईकोर्ट से स्वामी के सहायक फादर फ्रेजर मस्करेनहस को मजिस्ट्रेट जांच में शामिल करने का आग्रह किया, जो स्वामी के निधन के बाद सीआरपीसी की धारा 176 के तहत शुरू की गई.

उन्होंने हाईकोर्ट से इस तरह की जांच में यूएनएचआरसी के दिशानिर्देशों का पालन करने के लिए मजिस्ट्रेट को निर्देश देने और जांच रिपोर्ट हाईकोर्ट के समक्ष पेश करने का आग्रह किया.

देसाई स्वामी के वकील थे, जिन्होंने स्वामी को मेडिकल आधार पर जमानत देने से इनकार करने वाले विशेष अदालत के फैसले को चुनौती दी थी.

स्वामी ने अपने निधन से कुछ हफ्ते पहले हाईकोर्ट में एक याचिका भी दायर की थी, जिसमें कड़े गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) की धारा 45-डी को चुनौती दी गई थी. इसके तहत किसी भी व्यक्ति को जमानत देने पर रोक लगाने का प्रावधान है.

जेल प्रशासन भी जिम्मेदारः एनआईए

एनआईए की ओर से पेश हुए वकील संदेश पाटिल ने सोमवार को कहा कि केंद्रीय एजेंसी को देसाई के अनुरोध पर आपत्ति थी, क्योंकि जमानत आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर हाईकोर्ट सुनवाई कर रहा था और जांच से संबंधित मुद्दों को उसी याचिका में नहीं उठाया जा सकता.

पाटिल ने हाईकोर्ट को बताया, ‘समय-समय पर यह अनुमान लगाया जाता है कि जो कुछ भी हुआ है उसके लिए एनआईए जिम्मेदार है और जेल अधिकारी भी जिम्मेदार हैं.’

पीठ ने देसाई को बताया कि इस मामले पर बाहर कौन क्या कहता है, इस पर कोई नियंत्रण नहीं हो सकता.

हाईकोर्ट ने एनआईए के वकील से कहा, ‘आप निर्देश लें कि कितने गवाह हैं? मुकदमे में कितना समय लगेगा? हमें इसे देखना होगा.’

हाईकोर्ट ने कहा, ‘चिंता यह है कि लोगों को बिना मुकदमे के कितने साल तक जेल में रहने के लिए कहा जा सकता है. इस मामले में ही नहीं, बल्कि अन्य मामलों पर भी यह सवाल उठेगा.’

हाईकोर्ट इस मामले पर 23 जुलाई को सुनवाई करेगा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)