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मणिपुरः कार्यकर्ता को हिरासत में रखने के मामले में कोर्ट ने मुआवज़े पर राज्य से जवाब मांगा

मणिपुर के कार्यकर्ता एरेन्द्रो लीचोम्बाम पर कोविड-19 संक्रमण के उपचार के तौर पर गौमूत्र एवं गोबर के इस्तेमाल को लेकर भाजपा नेताओं की आलोचना करने पर एनएसए के तहत मामला दर्ज कर गिरफ़्तार किया गया था. ज़मानत मिलने के बाद भी उन्हें रिहा नहीं किया गया था. बीते सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी तत्काल रिहाई को आदेश जारी किया था.

मणिपुर के कार्यकर्ता एरेन्द्रो लीचोम्बाम. (फोटो साभारः फेसबुक)

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को मणिपुर सरकार से कल (सोमवार) ही शाम रिहा किए गए राजनीतिक कार्यकर्ता एरेन्द्रो लीचोम्बाम को मुआवजा देने के संबंध में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया.

इस कार्यकर्ता पर कोविड-19 संक्रमण के उपचार के तौर पर गौमूत्र एवं गोबर के इस्तेमाल को लेकर भाजपा नेताओं की आलोचना करने पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत मामला दर्ज किया गया था.

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि यह गंभीर मुद्दा है, क्योंकि कोई व्यक्ति मई से अपनी आजादी गंवा बैठा तथा यह कि याचिकाकर्ताओं ने हिरासत में रखे जाने को लेकर एरेन्द्रो को मुआवजा दिए जाने का अनुरोध किया है.

पीठ ने कहा कि वह राज्य सरकार को नोटिस जारी कर रही है और उसने ऐसा कहते हुए मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद करने का फैसला किया.

सुनवाई के दौरान मेहता ने कहा कि यह मामला तीन महीने पहले सामने आया और जैसे ही राज्य सरकार को चीजें पता चलीं, आरोप हटा दिए गए.

उन्होंने कहा चूंकि राज्य सरकार ने कार्यकर्ता की रिहाई की अर्जी की तरफदारी की है, इसलिए इस मामले पर यहीं पर विराम लगा दिया जाना चाहिए.

इस पर पीठ ने कहा कि एरेन्द्रो को सोमवार को अंतरिम आदेश जारी किए जाने के बाद ही रिहा किया गया और तथा एनएसए के तहत लगाए गए आरोप हटा दिए गए.

एरेन्द्रो के पिता की ओर से पेश वकील शदान फरासत ने कहा कि उनके मुवक्किल की अर्जी मुआवजे के लिए है, क्योंकि कार्यकर्ता के विरूद्ध पांच मामलों का जिक्र किया गया, जबकि इनमें से किसी में भी आरोप-पत्र दायर नहीं किया गया.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, पीठ ने कहा, ‘हम मुआवजे के पहलू पर नोटिस जारी करते हैं और आप (मेहता) इस पहलू पर जवाब दाखिल कर सकते हैं.’

मेहता ने कहा कि इसे व्यावहारिक दृष्टिकोण से टाला जा सकता था, लेकिन वह फिर से आग्रह करेंगे कि मामले को टाल दिया जाना चाहिए, क्योंकि याचिका तीन महीने बाद दायर की गई थी.

उन्होंने कहा कि राज्य को योग्यता के आधार पर आदेश को पूरा करना होगा और इसे थोड़ा व्यावहारिक दृष्टिकोण से टाला जा सकता था.

शदान फरासत ने कहा कि इस मामले में 17 मई से अवैध हिरासत के लिए जिम्मेदारी तय की जानी है.

मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एरेन्द्रो लीचोम्बाम को सोमवार शाम को रिहा कर दिया गया था. उनकी हिरासत को चुनौती देने वाली उनके पिता एल. रघुमणि सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा था कि उन्हें तुरंत रिहा किया जाए.

एरेन्द्रो को मणिपुर भाजपा अध्यक्ष एस. टिकेंद्र सिंह की कोरोना की वजह से हुई मौत के बाद 13 मई को गिरफ्तार किया गया था. 17 मई को उन्हें जमानत मिल गई थी, लेकिन उन पर एनएसए के तहत मामला दर्ज किया गया था.

कार्यकर्ता के पिता की ओर से दायर याचिका में दावा किया गया था कि उनके बेटे ने 13 मई को ‘फेसबुक’ पर एक पोस्ट में कोविड-19 के इलाज के लिए गोबर तथा गोमूत्र के इस्तेमाल की आलोचना की थी.

याचिका में कहा गया था, ‘मणिपुर भाजपा अध्यक्ष एस. टिकेंद्र सिंह के निधन के बाद भाजपा नेताओं के कोविड-19 से निपटने के लिए गोबर तथा गोमूत्र के इस्तेमाल करने जैसे अवैज्ञानिक तथ्यों तथा उनके गलत जानकारियां फैलाने की आलोचना करने के संदर्भ में वह बयान दिया गया था.’

याचिका में कहा गया था कि 13 मई को ‘पोस्ट’ करने के बाद उसे खुद ही हटा भी दिया गया था. वकील शादान फरासत ने कहा कि इस आलोचना के लिए एरेन्द्रो ने अपने खिलाफ शुरू किए गए आपराधिक मामलों के अनुसार हिरासत में कुछ दिन बिताए और उसके बाद जमानत मिलने के बाद भी वह हिरासत में हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)