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ट्रांसजेंडर के लिए नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था करने वाला पहला राज्य बना कर्नाटक

कर्नाटक सरकार ने सार्वजनिक नौकरियों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए एक फ़ीसदी पद आरक्षित किए हैं. पुलिस कॉन्स्टेबलों की भर्ती को चुनौती मिलने के बाद राज्य सरकार ने यह क़दम उठाया है.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: बुधवार को कर्नाटक देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जिसने सार्वजनिक नौकरियों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए आरक्षण लागू किया है.

रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार ने कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अभय श्रीनिवास ओका और जस्टिस सूरज गोविंदराज की खंडपीठ को सूचित किया कि उसने ट्रांसजेंडरों के लिए 1 फीसदी आरक्षण प्रदान करने के लिए कर्नाटक सिविल सेवा (सामान्य भर्ती) नियम, 1977 में संशोधन किया है.

13 मई को जारी एक मसौदा अधिसूचना में इस उद्देश्य के लिए नियम 9 में संशोधन करने का प्रस्ताव है.

नियम 9 उप नियम (1डी) में प्रस्तावित संशोधन राज्य सरकार द्वारा सामान्य, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की प्रत्येक श्रेणी और अन्य पिछड़ा वर्ग की प्रत्येक श्रेणी में किसी भी सेवा या पद में भरी जाने वाली रिक्तियों का 1 फीसदी ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को मुहैया कराने के लिए किया गया था.

राज्य सरकार ने बुधवार को उच्च न्यायालय को सूचित किया कि जहां तक नियम 9 में संशोधन का संबंध है, उसे प्रारूप अधिसूचना पर कोई आपत्ति प्राप्त नहीं हुई है. इसके बाद छह जुलाई को इसने संशोधन करते हुए नियमों में उप-नियम (1डी) शामिल किया.

राज्य सरकार द्वारा अपने भर्ती नियमों में संशोधन पुलिस कॉन्स्टेबलों की भर्ती के लिए एक कानूनी चुनौती का परिणाम था कि इसने पुरुषों और महिलाओं के समान ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए एक अलग श्रेणी को बाहर रखा है.

राज्य सरकार ने 2,672 पदों की भर्ती निकाली थी, जिसमें 2,420 रिक्तियां विशेष रिजर्व कॉन्स्टेबल फोर्स के पद और 252 बैंड्समेन पदों के लिए शामिल हैं.

इन पदों को भरने के लिए अधिसूचना में केवल पुरुषों और महिलाओं से संबंधित आयु, वजन और अन्य विशिष्टताओं का उल्लेख किया गया था और उसमें ट्रांसजेंडरों की पूरी तरह से अवहेलना की गई थी.

संगमा बनाम कर्नाटक राज्य मामले में चैरिटेबल ट्रस्ट जीवा ने इसको चुनौती देते हुए एक मध्यस्थ आवेदन (आईए) दायर किया. इसने राज्य सरकार को विशेष रिजर्व कॉन्स्टेबल के साथ-साथ बैंड्समेन के पद पर भर्ती में ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए आरक्षण के लिए एक योजना तैयार करने का निर्देश देने की भी मांग की थी.

तमिलनाडु में राज्य सरकार ने पिछड़े वर्ग की श्रेणी में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को शामिल किया, जिन्हें सबसे पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) के रूप में जाना जाता है, जो कर्नाटक में ओबीसी श्रेणी के बराबर है.

हालांकि, मद्रास हाईकोर्ट ने कई फैसलों में निर्देश दिया है कि एमबीसी के भीतर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को शामिल करने के बजाय प्रत्येक श्रेणी में उनके लिए पोस्ट-आधारित आरक्षण प्रदान किया जाए.