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राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के बढ़े बजट पर कांग्रेस का सवाल- क्या पेगासस खरीद थी वजह

कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय की बीते कई सालों की बजट राशि की तुलना करते हुए कहा कि साल 2017-2018 में साइबर सुरक्षा अनुसंधान और विकास नाम की एक नई श्रेणी जोड़ते हुए अनुदान आवंटन पिछले साल के 33 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 333 करोड़ रुपये किया गया. कथित तौर पर उसी साल पेगासस जासूसी शुरू हुई.

कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा (फोटो साभारः ट्विटर)

नई दिल्लीः पेगासस मामले के बीच कांग्रेस पार्टी ने शुक्रवार को दावा किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय का 2017-2018 में अनुदान आवंटन बढ़कर 333 करोड़ रुपये हो गया है जबकि इससे एक साल पहले यह 33 करोड़ रुपये था.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, खेड़ा ने पूछा कि क्या यह बढ़ोतरी इजरायली स्पायवेयर पेगासस की खरीद से संबंधित हैं?

कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि यूपीए सरकार ने 2011-2012 में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय को 17.43 करोड़ रुपये का अनुदान आवंटित किया था. यह धनराशि 2012-2013 में बढ़कर 20.33 करोड़ रुपये और 2013-2014 में बढ़कर 26.06 करोड़ रुपये हो गई.

खेड़ा ने बताया कि साल 2014-2015 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई, उस समय राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय की अनुदान धनराशि बढ़कर 44.46 करोड़ रुपये हो गई जबकि 2016-2017 में यह घटकर 33 करोड़ रुपये रह गई.

खेड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा, ‘लेकिन जिससे गंभीर संदेह होता है वह यह है कि साल 2017-2018 में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय में साइबर सुरक्षा अनुसंधान और विकास नाम की एक नई श्रेणी जोड़ी गई. दिलचस्प बात यह है कि उसी साल राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय को अनुदान आवंटन पिछले साल के 33 करोड़ रुपये से बढ़कर 2017-18 में 333 करोड़ रुपये हो गया और इससे पता चलता है कि कथित तौर पर उसी साल पेगासस जासूसी शुरू हुई.’

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय को किए गए 333 करोड़ रुपये के अनुदान में से 300 करोड़ रुपये साइबर सुरक्षा अनुसंधान और विकास पर खर्च किए जा रहे हैं.

उन्होंने कहा कि यह रुझान तब से जारी है, जब 2021-2022 में 228.72 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे. पेगासस के जरिये जासूसी के आरोप 2017 से ही लगाए गए हैं.

खेड़ा ने उन मीडिया रिपोर्टों का हवाला दिया, जिसमें बताया गया कि सीबीआई के तत्कालीन निदेशक आलोक वर्मा और उनके परिवार के सदस्यों के आठ फोन नंबर उस लीक हुई सूची में शामिल हैं, जिसे अज्ञात भारतीय एजेंसी द्वारा पेगासस स्पाइवेयर के जरिये संभावित रूप से निशाना बनाया जाना था.

उन्होंने कहा, ‘आलोक वर्मा, सीबीआई के दो अन्य वरिष्ठ अधिकारी राकेश अस्थाना और उनके सहयोगी एके शर्मा के फोन की भी जासूसी की गई. इससे रफाल सौदे से जुड़े विवाद के बीच इनके सीधे संबंध का भी पता चलता है क्योंकि अक्टूबर में तत्कालीन सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने प्रशांत भूषण और अरुण शौरी से मुलाकात की थी, जिन्होंने उन्हें निजी तौर पर रफाल सौदे से जुड़ी शिकायत की थी.’

सरकार से सवाल पूछते हुए खेड़ा ने कहा कि क्या भारत सरकार ने या इसकी किसी भी एजेंसी ने पेगासस सॉफ्टवेयर खरीदा है या नहीं?

उन्होंने कहा कि सरकार ने प्रत्यक्ष तौर पर पेगासस के इस्तेमाल से इनकार नहीं किया है. अगर सरकार ने यह सॉफ्टवेयर नहीं खरीदा तो वह कौन-सी सरकार थी, जिसने भारतीय नागरिकों की जासूसी की. क्या पेगासस खरीदने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय का बजटीय अनुदान बढ़ाया गया था.

बता दें कि रविवार को एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया कंसोर्टियम ने उजागर किया था कि दो केंद्रीय मंत्रियों, 40 से अधिक पत्रकारों, तीन विपक्षी नेताओं, एक मौजूदा जज, कई कारोबारियों और कार्यकर्ताओं सहित 300 से अधिक भारतीयों के मोबाइल नंबर उस लीक किए गए डेटाबेस में शामिल थे जिनकी पेगासस से हैकिंग की गई या वे संभावित रूप से निशाने पर थे. द वायर  भी इस कंसोर्टियम का हिस्सा है.

द वायर  ने फ्रांस की गैर-लाभकारी फॉरबिडन स्टोरीज और अधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल सहित द वॉशिंगटन पोस्ट, द गार्जियन और ल मोंद जैसे 16 अन्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों के साथ मिलकर ये रिपोर्ट्स प्रकाशित की हैं.

यह जांच दुनियाभर के 50,000 से ज्यादा लीक हुए मोबाइल नंबर पर केंद्रित थी, जिनकी इजरायल के एनएसओ समूह के पेगासस सॉफ्टेवयर के जरिये सर्विलांस की जा रही थी. इसमें से कुछ नंबरों की एमनेस्टी इंटरनेशनल ने फॉरेंसिक जांच की है, जिसमें ये साबित हुआ है कि उन पर पेगासस स्पायवेयर से हमला हुआ था.

भारत सरकार ने इस मामले में  सभी आरोपों से इनकार किया है.