भारत

उत्तराखंड ग्लेशियर हादसे संबंधी याचिका ख़ारिज कर क्या कोर्ट ने पर्यावरण चिंताओं की उपेक्षा की?

बीते फ़रवरी माह में हुए उत्तराखंड ग्लेशियर हादसे के बाद प्रलयंकारी बाढ़ लाने वाली ऋषिगंगा नदी पर बन रही एनटीपीसी की दो जलविद्युत परियोजना को मिली वन एवं पर्यावरण मंज़ूरी रद्द करने के लिए एक याचिका दायर की गई थी. हालांकि कुछ दिन पहले हाईकोर्ट ने चमोली ज़िले के पांच याचिकाकर्ताओं की प्रमाणिकता पर ही सवाल उठाते हुए इस याचिका को ख़ारिज कर दिया और प्रत्येक पर 10-10 हज़ार रुपये का जुर्माना लगाया है.

उत्तराखंड में इस साल फरवरी में हुए ग्लेशियर हादसे के बाद आई बाढ़ में तबाह जलविद्युत परियोजना. (फाइल फोटो पीटीआई)

नई दिल्ली: उत्तराखंड की ऋषिगंगा नदी पर पनबिजली परियोजनाओं को रद्द करने की मांग वाली याचिका हाईकोर्ट में खारिज होने और अदालत द्वारा जुर्माना लगाने को लेकर याचिकाकर्ताओं ने दुख व्यक्त किया है.

उन्होंने अपनी पीड़ा बयां करते हुए कहा है कि एक तो आपदा चलते के वे पहले से ही पीड़ित थे, अब कोर्ट ने उनकी सहायता करने से इनकार करके उन्हें अतिरिक्त तकलीफ पहुंचाई है.

बीते 14 जुलाई को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इस साल फरवरी महीने में ग्लेशियर टूटने के चलते चमोली जिले में प्रलयंकारी बाढ़ लाने वाली ऋषिगंगा नदी पर बन रही एनटीपीसी की तपोवन-विष्णुगाड तथा ऋषिगंगा जलविद्युत परियोजना को मिली वन एवं पर्यावरण मंजूरी रद्द करने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया था.

नैनीताल स्थित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश राघवेंद्र सिंह चौहान और जस्टिस आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने जनहित याचिका खारिज करते हुए पांचों याचिकाकर्ताओं पर दस-दस हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था.

अदालत ने कहा कि था याचिकाकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपनी ईमानदारी दिखाने में विफल रहे हैं.

इतना ही नहीं, अपने चार पेज के फैसले में कोर्ट ने याचिका को ‘अत्यधिक प्रेरित’ (Motivated) और पांचों याचिकाकर्ताओं को ‘अज्ञात व्यक्ति की कठपुतली’ करार दिया था.

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता होने का दावा करते हैं, लेकिन उन्होंने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया है, जिससे इसकी प्रामाणिकता सिद्ध हो सके.

इसे लेकर याचिकाकर्ताओं के वकील डीके जोशी ने बताया कि याचिका के साथ ही एक हलफनामे में सभी याचिकाकर्ताओं की जानकारी पीठ के समक्ष रखी गई थी.

उन्होंने कहा, ‘याचिकाकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता हैं, यह एक तथ्य है. कोई भी व्यक्ति सामाजिक कार्यकर्ता है या नहीं, इसे साबित करने के लिए कोई प्रमाणित दस्तावेज तो नहीं हो सकता है न.’

चमोली जिले के रैणी के रहने वाले तीन याचिकाकर्ता अनुसूचित जनजाति समुदाय से आते हैं. बाकी के दो याचिकाकर्ता जोशीमठ के रहने वाले हैं.

इसमें से एक याचिकाकर्ता 44 वर्षीय संग्राम सिंह साल 2014 और 2019 के बीच खंड विकास परिषद (बीडीसी) के सदस्य थे.

उन्होंने अप्रैल 2019 में भी उत्तराखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें ऋषिगंगा परियोजना डेवलपर्स को विस्फोटकों का उपयोग करने और नदी में अवैध खनन रोकने के लिए अदालत के हस्तक्षेप की मांग की गई थी.

जब हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद विस्फोटकों का इस्तेमाल जारी रहा, तो सिंह ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) का दरवाजा खटखटाया. एनजीटी ने मामले की जांच के लिए एक टीम का गठन किया, लेकिन इसमें जिला प्रशासन के ही लोग शामिल थे, जिनकी मंशा पर याचिकाकर्ता ने सवाल उठाए थे.

सिंह कहते हैं कि अंतत: सभी प्रयास व्यर्थ साबित हुए और परियोजना का निर्माण किया गया.

इसी खंडपीठ ने इस साल 9 जून को एक और जलविद्युत परियोजना- एनटीपीसी की 171 मेगावाट की लता तपोवन- से संबंधित मामले की सुनवाई की थी, जहां सिंह भी एक याचिकाकर्ता हैं. उनका कहना है कि परियोजना की सुरंग उनकी बस्ती से होकर गुजरती है, जिससे वहां की जमीन डूब रही है.

उन्होंने सवाल उठाया, ‘9 जून को सुनवाई के दौरान मेरी पहचान पर तो कोई सवाल नहीं उठाया गया, लेकिन 14 जुलाई को मेरी विश्वसनीयता और पहचान संदिग्ध हो गई. ये कैसे संभव है?’

सिंह कहते हैं, ‘एक तो आपदा ने हमको मारा, ऊपर से कोर्ट ने भी हमी को मारा.’

अन्य याचिकाकर्ता भवन सिंह (34) रैणी के वर्तमान ग्राम प्रधान हैं. तीसरे याचिकाकर्ता सोहन सिंह (38) एक किसान हैं और चिपको आंदोलन की नेता गौरा देवी के पोते हैं.

बाकी के दो याचिकाकर्ता- अतुल सती (47) और कमल रतूड़ी (49)- चमोली के जोशीमठ कस्बे के निवासी हैं.

सती सीपीआई (एमएल) के नेता हैं और रतूड़ी कांग्रेस नेता हैं. साल 2004 से ‘जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति’ के बैनर तले ये दोनों पर्यावरण, सार्वजनिक सुरक्षा और क्षतिग्रस्त तपोवन विष्णुगाड जैसी परियोजनाओं में मुआवजे और पुनर्वास के मुद्दों को सक्रिय रूप से उठा रहे हैं.

बता दें कि बीते सात फरवरी को चमोली जिले की ऋषिगंगा घाटी में पर ग्लेशियर टूटने से अचानक भीषण बाढ़ आ गई थी. बाढ़ से रैणी गांव में स्थित उत्पादनरत 13.2 मेगावाट ऋषिगंगा जलविद्युत परियोजना पूरी तरह तबाह हो गई थी, जबकि धौलीगंगा के साथ लगती एनटीपीसी की 520 मेगावाट क्षमता की निर्माणाधीन तपोवन-विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना को व्यापक नुकसान पहुंचा था.

इस आपदा में 204 लोग लापता हो गए थे, जिनमें से अब तक 83 शव और 36 मानव अंग बरामद हो चुके हैं.

फरवरी की आपदा के समय एनटीपीसी की तपोवन विष्णुगढ़ परियोजना निर्माणाधीन थी और बाढ़ में मरने वाले 139 लोग इसी परियोजना के मजदूर थे. एनटीपीसी के वकील कार्तिकेय हरि गुप्ता कहते हैं, ‘याचिका में एनटीपीसी पर किसी भी मौजूदा मानदंडों का उल्लंघन करने का कोई ठोस सबूत नहीं है. यह (एनटीपीसी) टिकाऊ विकास के लिए प्रतिबद्ध है.’

उत्तराखंड सरकार ने अभी तक फरवरी में आई बाढ़ में दो जलविद्युत परियोजनाओं की भूमिका पर टिप्पणी नहीं की है. भाजपा नेता और उत्तराखंड सरकार के प्रवक्ता सुबोध उनियाल के मुताबिक, मामले की जांच के लिए एक कमेटी का गठन किया गया था, जिसकी रिपोर्ट का इंतजार है.

वैसे तो नाजुक हिमालयी राज्य में जलविद्युत परियोजनाओं का मुद्दा नया नहीं है. उत्तराखंड हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में राज्य की विवादास्पद विभिन्न जल विद्युत परियोजनाओं को लेकर कई याचिकाएं दायर की गई हैं.

साल 2013 में उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ ने तबाही मचा दी थी. अकेले केदारनाथ घाटी में 4,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को यह आकलन करने के लिए एक विशेषज्ञ निकाय बनाने का निर्देश दिया कि क्या जलविद्युत परियोजनाओं की उपस्थिति के कारण बाढ़ से तबाही खराब हुई है.

साल 2014 में देहरादून स्थित पर्यावरणविद् रवि चोपड़ा की अध्यक्षता में विशेषज्ञ निकाय ने इस तरह की आपदा के लिए जलविद्युत परियोजनाओं को जिम्मेदार ठहराया था.

चोपड़ा ने द वायर से कहा, ‘यह निर्णय बेहद निराशाजनक है. संविधान सभी भारतीय नागरिकों से पर्यावरण की भलाई सुनिश्चित करने के लिए इस दिशा में अपना कर्तव्य निभाने की मांग करता है. इस तरह का एक निर्णय आम नागरिकों को इस संवैधानिक कर्तव्य को पूरा करने से निराश करेगा.’

याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि वे इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट का रुख करेंगे. हालांकि उन्होंने कानूनी कार्यवाही में होने वाले खर्च को लेकर चिंता जाहिर की है.

अतुल सती ने कहा, ‘हम न्याय चाहते हैं, लेकिन हमारे पास सीमित वित्तीय संसाधन हैं.’

हाईकोर्ट में याचिका दायर करने के लिए गांववालों से पैसे जुटाए गए थे. सीमित पैसे के कारण वकील जोशी को कोई फीस नहीं दिया गया था. जोशी का कहना है कि फीस तो छोड़ ही दें, याचिका पर उन्होंने जो 25,000 रुपये खर्च किए थे, उसमें से भी सिर्फ 7,000 रुपये ही उन्हें वापस मिले हैं.

सती ने कहा, ‘हम उत्तराखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर करने में हुए मूल खर्चों को भी पूरा नहीं कर पाए हैं. ऊपर से हम पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है. हम इसका भुगतान नहीं कर सकते हैं, हमने इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करने का फैसला किया है.’

उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाने के लिए एक विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) 27 जुलाई (मंगलवार) को सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)