प्रासंगिक

गुरुदत्त ने ‘बाज़ी’ के रूप में बॉलीवुड को पहली अपराध फिल्म देकर एक नई राह चलाई थी

क्लब, क्राइम, कैबरे का यह फॉर्मूला 1970 के दशक की फिल्मों तक बेहद लोकप्रिय बना रहा.

बाज़ी फिल्म के एक दृश्य में गुरुदत्त.

एक क्लब डांसर थिरक रही है. हीरो उसे देख रहा है. पहले उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट है, फिर वह उसके शब्दों को समझने की कोशिश कर रहा है- ‘सुनो गजर क्या गाए, समय गुजरता जाए.’ कट होता है और कैमरा एक जैकेट से बाहर निकाले जा रहे तमंचे पर जा टिकता है.

एक चुस्त शॉट में चारों तरफ देख रही एक जोड़ी आंखें नमूदार होती हैं… एक अनदेखे आदमी के माथे पर पसीने की मोतियां झिलमिला रही हैं. डांसर मानीखेज नजरों से देखती है और हम दर्शकों को पता लग जाता है कि कुछ नाटकीय होनेवाला है, भले ही हमें यह मालूम न हो कि आखिर होने वाला क्या है?

यह फिल्म के क्लाइमेक्स के दौरान अनगिनत फिल्मों का एक बेहद आम सीक्वेंस है, जब कहानियों के कई कड़ियां आपस में मिल जाती हैं और खलनायक हमारे भोले नायक को मारने की साजिश रचता है. लेकिन ठीक सत्तर साल पहले जब इसे पहली बार भारतीय परदे पर दिखाया गया, तब यह नया, असामान्य और आकर्षक था.

यह फिल्म थी बाज़ी, जिसे लिखा था इंग्लैंड से लौटकर आने वाले युवक बलराज साहनी ने; परदे पर नाच रही डांसर थीं गीता बाली, घबराई हुई आंखें राशिद खान की थी, जिस हीरो की जिंदगी खतरे में थी, वह थे देवानंद, जिन्होंने उस समय तक उम्र की तीसरी दहाई पार नहीं की थी.

इसका संगीत एसडी बर्मन ने दिया था, गीत लिखे थे साहिर लुधियानवी ने. कोरियोग्राफी थी जोहरा सहगल की. निर्देशक थे गुरुदत्त, जो इस फिल्म से बतौर निर्देशक अपनी सफर का आगाज कर रहे थे. इतने प्रतिभाशाली टीम के साथ बाज़ी का हिट होना तय था और यह हिट हुई भी और इसने अब तक संघर्ष कर रहे देवानंद के करिअर को एक तगड़ी उड़ान देने का काम किया.

इस फिल्म के साथ गुरुदत्त ने भी भारतीय परदे पर एक नई विधा की शुरुआत की- जो भारत के लिए नई थी, हालांकि हॉलीवुड और ब्रिटेन में यह तब तक पुरानी हो चुकी थी.

अपराध फिल्में या फिल्म नॉयर (हालांकि अपराध कथा वाली फिल्मों के लिए फिल्म नॉयर संज्ञा का इस्तेमाल बहुत बाद में जाकर किया गया) की शुरुआत जॉन ह्यूस्टन के करिअर का आगाज करनेवाली फिल्म द मॉल्टीज़ फाल्कन से हुई. डैशियल हैम्मेट की लालच, नैतिक भ्रष्टाचार और हत्या की कहानी में हम्फ्री बोगार्ट ने सैम स्पेड नामक एक सख्त प्राइवेट डिटेक्टिव की भूमिका निभाई थी, जो एक रंगारंग मगर संदिग्ध अपराधियों के एक समूह, जो 17वीं सदी के अंतिम वर्षों की ब्लैक बर्ड की एक छोटी सी मूर्ति चुराना चाहते हैं, जिसका एक खूनी इतिहास है, का पर्दाफाश करता है.

स्पेड की अपनी खुद की एक नैतिक संहिता है, हालांकि यह अलग बात है कि भविष्य के नायकों को लगभग बिना अपवाद के अनैतिक होना था, जो प्रलोभनों से बचकर रह पाने में समर्थ नहीं होते और जो लगभग हमेशा उनके पतन का कारण बनता है.

दुर्दांत अपराधियों और अपराध सरगनाओं, भ्रष्ट पुलिस और एक खलनायिका (वैंप), ऐसी फिल्मों के सामान्य किरदार हुआ करते थे. हालांकि, अपराध की दुनिया में दाखिल होने के लिए नायकों पर ज्यादा चारा फेंकने की जरूरत नहीं पड़ती थी.

इन फिल्मों को रोशनी और छाये के कुशल संयोजन के साथ फिल्माया जाता था, मानो इसका मकसद अच्छे और बुरे के बीच के संघर्ष को गहरा करना हो. इनमें से कुछ फिल्में- जिन्हें अब क्लासिक्स का दर्जा दिया जाता है- द बिग हीट और सनसेट बॉलेवॉर का निर्देशन बिली वाइल्डर और फ्रिट्ज लैंग जैसे महाद्वीप पारीय यूरोपीय निर्देशकों द्वारा किया गया था, जो नाजी जर्मनी से बचकर भागे थे.

हॉलीवुड निर्माताओं ने उन्हें जरूरत भर का पैसा दिया लेकिन उन्हेंने जर्मन प्रभाववाद (एक्सप्रेशनिज्म) के शुरुआती दिनों से अपनी कला की बारीकी सीखी थी और उन्होंने उन नुस्खों/तकनीकों का प्रयोग अपने सेटों को रोशन करने के लिए किया, हालांकि तथ्य यह भी है कि महानतम अपराध कथाओं में से दो, अ टच ऑफ डेविल (ऑर्सन वेल्स) और द थर्ड मैन (कैरोल रीड) का निर्देशन एक अमेरिकी और एक ब्रिटिश द्वारा किया गया था.

बाज़ी ने मुंबईया क्राइम फिल्मों की शुरुआत की- इसके बाद क्राइम फिल्मों का एक सिलसिला शुरू हो गया. गुरुदत्त ने जाल और आरपार बनाई और सीआईडी का निर्माण किया, जिसका निर्देशन उनके असिस्टेंट राज खोसला ने किया था.

चेतन आनंद ने टैक्सी ड्राइवर का निर्देशन किया और प्रमोद चक्रवर्ती ने 12 ओ’क्लॉक का निर्माण किया. राज कपूर ने श्री 420 बनाई, जो संभवतः उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्म है. शक्ति सामंत ने हावड़ा ब्रिज और चाइना टाउन का निर्माण किया. इनमें कलकत्ता नाममात्र का था.

और भी कई फ़िल्में बनाई गईं और लगभग सभी में जानी-पहचानी सामग्री थी- अपराध, क्लब और कैबरे. इनके गाने माहौल बनाने वाले और कहानी को आगे बढ़ाने वाले होते थे. क्लब आपराधिक गतिविधियों के अड्डे होते थे और इनमें नाचने वालियां बेहद आकर्षक होती थीं, जिनके नाम रोज़ी, एडना और लिलियन जैसे होते थे, लेकिन जिनका दिल सोने का होता था. इनमें से ज्यादातर फिल्में बंबई आधारित थीं.

परंपरागत भारी उपकरणों की जगह नए हल्के कैमरे की उपलब्धता ने फिल्म निर्देशकों के लिए शहर की सड़कों पर शूटिंग करना संभव बना दिया था. इनमें फिल्माई गई बंबई मुख्यतौर पर दक्षिणी बंबई थी, जहां समुद्र को पाटकर निकाली गई जमीन पर आधुनिक सुंदर इमारतें, एक कतार में लगे पेड़ों वाली चौड़ी सड़कें थीं और जाहिर तौर पर थी मरीन ड्राइव.

ये सचेत तरीके से शहरी फिल्में थीं, जिनमें गांव कहीं नहीं दिखाई देता था. ये फिल्में शहरी दर्शकों के दिल के तारों को छूने में कामयाब रहीं.ये फिल्में विदेश से प्रभावित थीं, हालांकि इनकी कहानियों और ट्रीटमेंट का भारतीयकरण किया गया था.

शराबबंदी के कारण परदे पर शराब पीते हुए नहीं दिखाया जा सकता था. सूट-बूट पहने हुए रुआबदार लोगों का क्लब में डांस देखते हुए चाय या कोका कोला पीते हुए दिखलाया जाता था, जो काफी बेमेल दिखाई पड़ता था. पुलिस अधिकारियों को कभी भ्रष्ट नहीं दिखाया जा सकता था, हालांकि इज्जतदार कारोबारियों, जो वास्तव में खतरनाक अपराधी होते हैं, के चित्रण की इजाजत थी.

जाता कहां है दीवाने  गाने पर कैंची चल गई थी, क्योंकि यह एक नाचने वाली (वहीदा रहमान) द्वारा एक ईमानदार पुलिस अफसर, देवानंद को अपने हुस्न के जाल में फंसा लेने का संकेत देता था और कथित तौर पर इसमें इस्तेमाल किए गए कुछ मेरे दिल में फीफी  जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी इसका कारण था.

मुख्य नायकों और हास्य अभिनेताओं के बीच एक रोमांटिक गाना होना जरूरी था- जॉनी वाकर मुख्य पसंद थे- हालांकि चतुर निर्देशकों ने उन्हें कहानी में शामिल कर दिया. मुख्य अभिनेता सामान्य तौर पर गरीब पृष्ठभूमि से होते थे, प्रायः एक प्रवासी, जो बस किसी भी तरह से कामयाब हो जाने की ख्वाहिश रखते थे- बाज़ी, आरपार, टैक्सी ड्राइवर, श्री 420 इसके अच्छे उदाहरण हैं.

उनका लापरवाह अंदाज और आत्मदया में डूबने से इनकार एक युवा पीढ़ी के लिए काफी ताजगीभरा था. कई दशकों के बाद भी उसमें एक ताजगी दिखाई देती है.

अभिजात्य वर्ग अपराध फिल्मों को सामान्य तौर पर नीची नजरों से देखता था, लेकिन जनता को ये खूब पसंद आती थीं और बॉक्स ऑफिस पर ये काफी हिट हुईं. इनमें से कुछ फिल्में आज भी देखने में मनोरंजक लगती हैं और इनके गाने आज भी लोकप्रिय हैं. 1960 के दशक की शुरुआत तक यह विधा फिल्मी परदे से ओझल हो गई, हालांकि क्लब डांसर्स और अपराधी सरगना का चित्रण 1970 के दशक तक सिनेमा में खूब होता रहा.

और इसे शुरू करनेवाले थे गुरुदत्त. वही गुरुदत्त जिनकी क्षोभ या नाराजगी के केंद्रीय भाव पर टिकी फिल्में प्यासा और कागज के फूल को आज 50 साल बाद भी देखकर लोगों के मुंह से एक आह निकल जाती है.

प्यासा फिल्म के एक दृश्य में गुरुदत्त.

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उनके अनुयायी- सिर्फ प्रशंसक कहना काफी नहीं है- और उन पर किताबें लिखने वाले कई विद्वान भी इन फिल्मों पर विचार ही नहीं करते. उन पर लिखी गई ज्यादातर किताबें, सिवाय नसरीन मुन्नी कबीर की ‘इन सर्च ऑफ गुरुदत्त’, जो उनके टीवी धारवाहिक पर आधारित है, प्यासा से पहले के उनके शाहकारों को नजरअंदाज कर देती हैं और सिर्फ प्यासा, कागज के फूल, साहब, बीबी और गुलाम और चौदवीं का चांद को ही तवज्जो देती हैं.

विडंबना यह है कि इनमें से आखिरी दो फिल्में खुद उनके द्वारा निर्देशित नहीं की गई थीं और गुरुदत्त के समर्पित अनुयायी भी उनके निर्देशकों का नाम याद नहीं कर सकते हैं. अबरार अल्वी ने अपने जीवन के कई साल लोगों को यह यकीन दिलाने में खर्च कर दिए कि साहब बीबी और गुलाम का निर्देशन उन्होंने किया है, लेकिन किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया.

एक मशहूर डायरेक्टर से मैंने एक बार बाजी और दूसरी फिल्मों के बारे में बात करने के लिए कहा, तो उन्होंने हाथ हिलाते हुए जवाब दिया कि ‘वे सब कूड़ा हैं.’

यह रवैया समझ में आने वाला है- प्यासा और कागज के फूल इस आम समझ को मजबूत करती हैं कि गुरुदत्त उन्हें न समझ सकने और सराहने वाली एक क्रूर दुनिया में संवेदनशील कलाकार थे. कम उम्र में आत्महत्या से हुई उनकी मृत्यु ने उनकी इस छवि को पुख्ता करने का ही काम किया.

आज यह कहकर काम चला लिया जाता है कि वे हिंदी के महानतम फिल्म निर्देशकों में से एक थे. कोई भी कागज के फूल को एक अतिरिक्त विस्तार वाले, आत्ममुग्ध और कमजोर पटकथा वाली फिल्म के तौर पर गौर करने के लिए लिए तैयार नहीं है, जबकि वहीदा रहमान ने भी लगभग ऐसी ही बातें कही हैं.

दूसरी तरफ उनकी पहले की फिल्मों को सीधे खारिज कर देने का मतलब है कि उनके अनुयायी और मर्मज्ञ गुरुदत्त की शुरुआती फिल्मी यात्रा को आंखों से ओझल कर देते हैं जिनमें उन्होंने अपनी कला को साधा और अपनी बाद की फिल्मों में इस्तेमाल की जाने वाली कई तकनीकें सीखीं.

बाज़ी में कुछ रफ कट्स हैं, लेकिन यह एक अच्छी तरह से बनाई गई फिल्म है, जो एक अच्छी कहानी कहती है. हीरो को एक युवा अपराधी के तौर पर दिखलाना उस समय के हिसाब से काफी असामान्य चीज थी- देव आनंद ने यह जोखिम लिया और यह सफल रहा. इसने एक ऐसी रुपहली शख्सियत का निर्माण किया जो ताउम्र उनके साथ रही.

दत्त के कैमरामैन, प्रसिद्ध सिनेमेटाग्राफर वीके मूर्ति ने दत्त के साथ काम करते हुए सीखा और बाज़ी और जाल दोनों में ही ऐसे तत्व हैं, जो उनकी विशिष्ट शैली का हिस्सा बन गए. इन फिल्मों का फिर से मूल्यांकन किया जाना जरूरी है. इन्हें क्राइम फिल्में होने और पर्याप्त तरीके से उच्च वर्गीय नहीं होने के चलते सरसरी तौर पर खारिज कर देना, दूरदर्शिता नहीं है और इससे फिल्म उद्योग के एक महत्वपूर्ण हिस्से को हम काटकर बाहर कर देते हैं.

एफटीआइआई के छात्र और युवा निर्देशक इन फिल्मों के बड़े प्रशंसक हैं और वे अपने बाद के नव-अपराध फिल्मों में इनके तत्वों का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित होते हैं. बाज़ी या आरपार को गहराई से देखने पर गुरुदत्त की सराहना का एक नया आयाम विकसित होगा.

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