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नवगठित किसान मोर्चा ने प्रधानमंत्री से कृषि क़ानूनों में चार संशोधन पारित कराने की मांग की

किसान संगठनों के नवगठित संगठन ‘राष्ट्रीय किसान मोर्चा’ ने पत्र में संसद के मौजूद मानसून सत्र में विवादित कृषि क़ानूनों में चार संशोधनों का प्रस्ताव पारित कराने की मांग की है, जिसमें किसानों की ज़मीनों के साथ कोई समझौता न होने की गारंटी, किसानों को कोर्ट जाने की आज़ादी, एमएसपी की गारंटी और सरकारी ख़रीद केंद्रों पर फ़सल का तत्काल भुगतान की गारंटी शामिल है. उसने कहा है कि यह बातचीत के लिए पूर्व शर्त है.

(फोटो: पीटीआई)

लखनऊ: किसान संगठनों के नवगठित संयुक्त संगठन ‘राष्ट्रीय किसान मोर्चा’ ने मौजूदा संसद सत्र में विवादित कृषि कानूनों में चार संशोधनों का प्रस्ताव पारित कराने की मांग करते हुए बृहस्पतिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है.

नवगठित संगठन का दावा है कि वह 100 किसान संगठनों का संयुक्त मोर्चा है. राष्ट्रीय किसान मोर्चा के संयोजक वीएम सिंह ने कहा कि भारत भर के 20 प्रांतों के 100 से अधिक किसान संगठनों ने बीते 4 अगस्त को राष्ट्रीय किसान मोर्चा के बैनर तले दिल्ली में विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों और सरकार के बीच गतिरोध को खत्म करने के तरीकों पर चर्चा की.

सिंह ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि नए कृषि कानूनों को लेकर सरकार और किसानों के बीच पिछले करीब आठ माह से गतिरोध जारी है. इसे दूर करने के लक्ष्य से मोर्चा ने फैसला किया है कि अगर सरकार भी समाधान चाहती है और किसानों से बातचीत को इच्छुक है तो वह संसद के मौजूद मानसून सत्र में इन कानूनों में चार संशोधन प्रस्ताव पारित कराए.

उन्होंने कहा कि यह बातचीत के लिए हमारी शर्त है.

उन्होंने कहा कि पहला संशोधन यह होगा कि किसान की जमीन को गिरवी रखकर कोई भी प्रायोजक कर्ज नहीं ले सकता. उसे ऋण के लिए अपनी संपत्ति को बंधक रखना होगा. करार करने पर किसी भी कीमत पर किसान की संपत्ति न तो नीलाम होगी और न ही उस पर कोई देनदारी होगी.

इसके अलावा कानून संख्या 20/2020 की धारा 19 और अधिनियम संख्या 21/2020 की धारा 15 में दीवानी अदालत का न्याय क्षेत्र बरकरार रखा जाए.

तीसरा, न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर कोई खरीद न हो. इस बारे में विधिक प्रावधान किया जाए. चौथा, कानून संख्या 21/2020 की धारा 4(3) में किसानों को अपनी फसल का पैसा तीन कार्य दिवसों में देने की बात लिखी गई है, उसे तत्काल देने का प्रावधान किया जाए.

सिंह ने पत्र में प्रधानमंत्री से कहा कि ये संशोधन होने पर ‘राष्ट्रीय किसान मोर्चा’ की बातचीत का मुख्य बिंदु न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसलों की खरीद होगा.

उन्होंने पत्र में यह भी गुजारिश की कि संघर्ष के दौरान शहीद हुए व्यक्तियों के परिवारों को 10-10 लाख रुपये की सहायता राशि दी जाए और किसानों पर दर्ज अपराधिक मामले वापस लिए जाएं.

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, बीते 4 अगस्त को रकाबगंज गुरुद्वारा में कृषि कानूनों पर चर्चा करने के लिए विभिन्न राज्यों के लगभग 100 किसान संगठनों ने बैठक में भाग लिया.

वीएम सिंह ने कहा था, ‘हमने राष्ट्रीय किसान मोर्चा नामक एक संगठन का गठन किया है. लगभग 125 किसान संगठन यहां रकाबगंज गुरुद्वारे में आए. राजू शेट्टी, पीवी राजगोपाल, राजेंद्र सिंह और कई अन्य नेता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से विभिन्न राज्यों से हमारे साथ शामिल हुए.’

उन्होंने कहा था, ‘हम बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन संवाद बंद कमरों में नहीं होगा. यह टेलीविजन के सामने होगा. राष्ट्र को देखना होगा कि संवाद क्या चल रहा है. कल (5अगस्त) हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इन मुद्दों का उल्लेख करते हुए एक पत्र लिखेंगे और हम कहेंगे कि अगर उन्हें किसानों की चिंता है तो उन्हें जरूर दिखाना चाहिए.’

सिंह ने आगे कहा था, ‘हम देख रहे हैं कि किसानों और सरकार के बीच कोई बातचीत नहीं हो रही है. यह गतिरोध कब तक जारी रहेगा? हम यहां समस्याओं को हल करने आए हैं. यह न तो देश के लिए अच्छा है और न ही किसानों के लिए. यह बैठक नरेंद्र मोदी जी को यह बताने के लिए है कि अगर हम सीमाओं पर विरोध नहीं कर रहे हैं तो भी हम कृषि कानूनों के खिलाफ हैं.’

गौरतलब है कि केंद्र सरकार की ओर से कृषि से संबंधित तीन विधेयक- किसान उपज व्‍यापार एवं वाणिज्‍य (संवर्धन एवं सुविधा) विधेयक, 2020, किसान (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) मूल्‍य आश्‍वासन अनुबंध एवं कृषि सेवाएं विधेयक, 2020 और आवश्‍यक वस्‍तु (संशोधन) विधेयक, 2020 को बीते साल 27 सितंबर को राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी थी, जिसके विरोध में आठ महीने से अधिक समय से किसान प्रदर्शन कर रहे हैं.

किसानों को इस बात का भय है कि सरकार इन अध्यादेशों के जरिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दिलाने की स्थापित व्यवस्था को खत्म कर रही है और यदि इसे लागू किया जाता है तो किसानों को व्यापारियों के रहम पर जीना पड़ेगा.

दूसरी ओर केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली मोदी सरकार ने इन अध्यादेशों को ‘ऐतिहासिक कृषि सुधार’ का नाम दे रही है. उसका कहना है कि वे कृषि उपजों की बिक्री के लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था बना रहे हैं.

सरकार और यूनियनों के बीच आखिरी दौर की बातचीत 22 जनवरी को हुई थी. 26 जनवरी को किसानों के विरोध प्रदर्शन के तहत  ट्रैक्टर परेड के दौरान व्यापक हिंसा के बाद बातचीत फिर से शुरू नहीं हुई है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)