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राम रहीम के ‘कुकर्मों का खुलासा’ कर रहा मीडिया अब तक क्यों उनकी गोद में बैठा था?

राम रहीम पर लगे आरोप डेढ़ दशक पुराने हैं, लेकिन मीडिया तब जागा, जब दो बहादुर बेटियों और एक जांबाज़ पत्रकार ने जान की बाज़ी लगाकर न्याय की लड़ाई जीत ली.

Gurmeet Ram Rahim

डियर हिंदी न्यूज़ चैनलों!

 जबसे माननीय कोर्ट ने गुरमीत सिंह को उसकी औक़ात का अहसास कराया है, तबसे लगातार देख रहा हूं कि हर रोज़ आप सब बाबा को लेकर नित नये खुलासे किए जा रहे हैं. बाबा के काफ़िले से लेकर बाबा की आलीशान गुफ़ा तक आपने एक-एक करके बाबा की सारी परतें उधेड़ कर रख दी हैं.

आपका ये बाबा-राग का कार्यक्रम अब भी लगातार जारी है. बाबा अय्याश पहले भी था, बाबा ढोंगी पहले भी था, बाबा के डेरे में हथियारों से लैस उसके ख़ुद के प्राइवेट कमांडों पहले भी थे. बाबा का डेरा पहले भी रहस्यमयी था.बाबा पर बलात्कार के आरोप डेढ़ दशक पहले लगे थे. बाबा पर हत्या के आरोप लगे भी लगभग इतना ही समय हो गया और डेरे में रह रहे सेवकों को नपुंसक बनाने का आरोप भी लगभग इतना ही पुराना है.

लेकिन आप लोगों की नींद तब खुली, जब दो बहादुर बेटियों और एक बहादुर बेटे ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर बाबा से न्याय के लिए चली ये लंबी लड़ाई जीत ली. आप नींद से तब जागे, जब बाबा के अंधे समर्थकों का गुस्सा आपकी संपत्ति और आपके साथियों पर फूट पड़ा.

उसके पहले तक तो आपकी पत्रकारिता बाबा के चमत्कार, बाबा के प्रोडक्ट और बाबा की फिल्मों के प्रमोशन में खर्च हो रही थी, है ना? अगस्त 2017 के पहले तक़ तो ये पाखंडी आप लोगों के लिए भी संत हुआ करता था.

तब तो आपकी पत्रकारिता बाबा की विलासिता और उसके बनाए तिलिस्म के सामने से गुज़रने में भी परहेज़ किया करती थी. तब आप सब बड़े सम्मान के साथ उस पाखंडी को संत कहकर संबोधित किया करते थे. तब आप उसके मायाजाल को समझने की कोशिश करने से भी घबराया करते थे.

याद है ना आप लोगों को कि बाबा ने किस तरह से आपकी ही बिरादरी के एक ईमानदार और सच्चे पत्रकार को गोलियों से भुनवा दिया था? आज गौरी लंकेश की मौत ने आप सबको (कुछ चमचा छाप पत्रकारों को छोड़कर) झकझोरा है. उस समय भी आप पत्रकारों की आत्मा दुखी हुई होगी.

काश कि आप लोगों ने अपनी ही बिरादरी के उस बहादुर पत्रकार की हत्या के केस का फाॅलोअप कर लिया होता तो शायद इस पाखंडी का तिलिस्म कब का टूट चुका होता. उसका पाखंड का महल आपकी सच्ची पत्रकारिता के आगे चकनाचूर हो गया होता.

अगर आप ऐसा करते तो लोगों की आस्था से खिलवाड़ करने वाले इस दरिंदे की दरिंदगी दुनिया के सामने आ गई होती. तब आपने अपनी कलम और हुनर का सही हक़ अदा कर दिया होता तो आज बाबा के अंधभक्त सड़कों पर उतरकर उपद्रव ना कर रहे होते.

आज आप दुनिया को बाबा की गाथा गा-गा कर सुना रहे हैं. बाबा के नाम पर टीआरपी का खेल खेल रहे हैं. बाबा पर स्टोरी कर-करके उस नंगे हो चुके ढोंगी को और नंगा करने की कोशिशों में जुटे हुए हैं. सोशल मीडिया पर आप सबकी हर तीसरी चौथी खबर बाबा को लेकर होती है. मानों बाबा और उसके डेरे में अवैध हथियारों विस्फोटकों के अलावा आपको अथाह टीआरपी का भंडार भी मिल गया हो.

हालांकि, आप पहले भी बाबा पर स्टोरी किया करते थे, इंटरव्यू किया करते थे, मगर तब तो आपको बाबा के अंदर सिर्फ़ टैलेंट ही टैलेंट नज़र आता था. तब आपको बाबा मल्टीटैलेन्टेड धार्मिक गुरु नज़र आता था. तब आपने एक बार भी उससे नहीं पूछा उन दो साध्वियों के बारे में, सेवकों को नपुंसक बनाने के बारे में, उस बहादुर पत्रकार की हत्या के बारे में, उसकी निजी सेना के बारे में.

आपकी पत्रकारिता हमेशा उस ढोंगी को बाबा और संत कहकर पुकारा और लिखा करती थी जबकि आप सब को पहले से उसके कारनामों का अंदाज़ा था, बावजूद इसके आपने उस समय उसके ढोंग को उजागर करने का साहस कभी नहीं दिखाया. और आज जब दो बहादुर बेटियों और एक बहादुर बेटे ने कुछ अच्छे लोगों के सहयोग से उस ढोंगी को उसकी सही जगह पहुंचा दिया है, तब आप हर आधे एक घंटे में बाबा अय्याश और बाबा दरिंदा नाम की रट लगाए जा रहे हैं.

अब आप लोग बाबा के डेरे में छिपे रहस्यों से पर्दा हटा रहे हैं. क्यों भाई इतना साहस कहां से आ गया अचानक से? रहने दीजिए, आप नहीं बता पाएंगे क्योंकि मैं जानता हूं कि आपका साहस उधार का है.

खैर छोड़िए और अब अगर थोड़ी सी भी गैरत बची हुई हो तो कम से कम उन बहादुर साध्वियों पर भी प्राइम टाइम में एकाध कार्यक्रम दिखा दीजिएगा जिनकी बहादुरी की वजह से आज बाबा को अय्याश और दरिंदा कहने का साहस जुटा पाए हो. वर्ना आने वाली नस्लें आपकी इस टीआरपी पत्रकारिता का मज़ाक उड़ाएंगी.

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं.)