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वायुसेना ने कोविड-19 टीका लेने से इनकार करने पर एक कर्मचारी को बर्ख़ास्त किया है: केंद्र

वायुसेना से बर्ख़ास्त किए गए कर्मचारी ने हाईकोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार ने कहा था कि कोविड-19 टीका विशुद्ध रूप से स्वैच्छिक है, अनिवार्य नहीं. इसके जवाब में वायुसेना की ओर से कहा गया कि टीकाकरण एक सेवा आवश्यकता है और सशस्त्र बलों के लिए व्यक्तिगत विकल्प नहीं है, जैविक हथियारों के दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए टीके की खुराक लेना आवश्यक है.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने बीते बुधवार को गुजरात हाईकोर्ट में बताया कि भारतीय वायुसेना के एक कर्मचारी को कोविड-19 वैक्सीन लेने से इनकार करने पर बर्खास्त कर दिया गया है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, जामनगर के वायुसेना के एक कॉर्पोरल की एक याचिका का जवाब देते हुए सरकार ने इसका खुलासा किया. कॉर्पोरल ने दलील दी है कि टीकाकरण नहीं कराना उनका मौलिक अधिकार है.

समाचार एजेंसी पीटीआई ने बताया कि गुजरात हाईकोर्ट ने वायुसेना के कॉर्पोरल योगेंद्र कुमार की याचिका का निपटारा कर दिया. हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को दी गई अंतरिम राहत तब तक जारी रहेगी, जब तक कि उसके मामले पर भारतीय वायुसेना द्वारा फैसला नहीं किया जाता है.

कुमार ने 10 मई, 2021 को जारी कारण बताओ नोटिस को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उन्होंने अदालत से भारतीय वायुसेना को दंडात्मक कार्रवाई न करने का निर्देश जारी करने की भी मांग की थी.

याचिकाकर्ता योगेंद्र कुमार ने हाईकोर्ट को बताया था कि केंद्र सरकार ने कहा था कि टीका विशुद्ध रूप से स्वैच्छिक है, अनिवार्य नहीं. याचिका के जवाब में वायुसेना ने कहा था कि टीकाकरण एक सेवा आवश्यकता है और सशस्त्र बलों के लिए व्यक्तिगत विकल्प नहीं है. ‘जैविक हथियारों के दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए’ टीके की खुराक लेना आवश्यक है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में बताया गया है कि बर्खास्त कर्मचारी राजस्थान का है. इसके अलावा सरकार ने कोई और विवरण नहीं दिया.

सहायक सॉलिसिटर जनरल देवांग व्यास ने गुजरात हाईकोर्ट को बताया कि नौ वायुसेना कर्मचारी जो टीका लेने के लिए अनिच्छुक थे, उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था और ‘उन्हें यह समझाने के लिए कहा गया था कि टीकाकरण के आदेश की अवहेलना करने के लिए उनकी सेवाओं को समाप्त क्यों नहीं किया जाना चाहिए?’

उन्होंने आगे कहा कि इनमें से आठ कर्मचारियों ने नोटिस का जवाब दिया था, जो जवाब देने में विफल रहा, उसे बर्खास्त कर दिया गया.

मालूम हो कि कई अदालतें पहले ही कह चुकी हैं कि टीकाकरण को रोजगार, सरकारी लाभों से नहीं जोड़ा जा सकता है और इसका उपयोग किसी व्यक्ति को उनकी आजीविका से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता है.

मेघालय हाईकोर्ट ने जून के अंत में एक आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि दुकानदारों और टैक्सी चालकों को अपना काम फिर से शुरू करने से पहले टीका जरूर लगवा लेना चाहिए.

जुलाई में मणिपुर हाईकोर्ट ने कहा था कि रोजगार को कोविड-19 टीका लगवाने से जोड़कर लोगों को उनकी आजीविका से वंचित करने का चलन ‘अवैध’ है.

इसके अलावा जुलाई में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश सरकार के एक आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसमें कहा गया था कि सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए अनुमति केवल उन लोगों को दी जाएगी, जिन्हें कोविड-19 का टीका लगाया जा चुका है.

उच्च न्यायालय के अनुसार, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा था कि टीकाकरण अनिवार्य नहीं है, बल्कि स्वैच्छिक है. याचिकाकर्ता ने अदालत को सूचित किया था कि सरकार ने लोकसभा को बताया था कि टीकाकरण के कारण उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रकार के दुष्प्रभाव या चिकित्सा जटिलता के खिलाफ कोविड-19 टीकाकरण प्राप्त करने वालों के लिए मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है.