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फ़र्ज़ी ट्वीट कर परेश रावल ने कराई फ़ज़ीहत, मांगी माफ़ी

भाजपा सांसद ने लिखा, ‘मुंबई ताज हमले में शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन बेंगलुरु से हैं. उन्हें राज्य सरकार द्वारा 21 बंदूकों की सलामी नहीं दी गई!’

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नई दिल्ली: बॉलीवुड अभिनेता और भाजपा सांसद परेश रावल को रविवार को ट्विटर पर फजीहत का सामना करना पड़ा. दरअसल परेश रावल ने नवंबर 2008 को मुंबई हमलों के दौरान आतंकवादियों से लोहा लेते शहीद हुए संदीप उन्नीकृष्णन को लेकर एक ट्वीट किया. भाजपा सांसद ने लिखा, ‘मुंबई ताज हमले में शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन बेंगलुरु से हैं. उन्हें राज्य सरकार द्वारा 21 बंदूकों की सलामी नहीं दी गई!’

जबकि वास्तविकता इसके उलट है. मुंबई हमले में शहीद हुए सेना के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन का 29 नंवबर 2008 को पूरे राजकीय सम्मान के साथ बेंगलुरु में अंतिम संस्कार किया गया था. इस दौरान उन्हें 21 बंदूकों की सलामी भी दी गई थी और हजारों की संख्या में लोग उनकी अंतिम विदाई मेें शामिल हुए थे.

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फिलहाल ट्वीट करते वक्त भाजपा सांसद यह बात भी भूल गए कि उस समय कर्नाटक मेें वीएस येदुरप्पा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार का शासन था. वैसे माना जा रहा है कि परेश रावल के इस ट्वीट का मकसद पुलिस सैल्यूट के साथ हुए वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश केे अंतिम संस्कार पर निशाना साधना था.

गौरतलब है कि परेश रावल इससे पहले लेखिका अरुंधति रॉय को लेकर विवादित ट्वीट कर चुके हैं. काफी विवाद होने पर उन्होंने वो ट्वीट डिलीट कर लिया. उस समय परेश रावल ने कहा, ‘ट्विटर ने उस ट्वीट को डिलीट न करने पर अकाउंट डिलीट करने की धमकी दी थी.’

फिलहाल फजीहत होने के बाद परेश रावल के बाद परेश रावल ने अपनी सफाई पेश की. उन्होंने कहा, ‘नहीं’ शब्द का इस्तेमाल गलती से हो गया.

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गौरतलब है कि वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद से सोशल मीडिया पर दक्षिणपंथी धड़ा लगातार उन्हें लेकर तमाम फर्जी कहानियां गढ़ रहा है. पहले सोशल मीडिया पर तमाम लोगों ने उन्हें माओवादी बताया. बाद में लिंगायत समुदाय से होने के नाते उनके दफनाए जाने पर ईसाई होने की कहानी गढ़ी गई. बताया गया कि उनका वास्तविक धर्म ईसाई है.

बाद में पुलिस सैल्यूट का लेकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की गई. इस पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री कार्यालय ने सफाई भी दी. अंग्रेजी अखबार टाइम्स आॅफ इंडिया के मुताबिक मुख्यमंत्री कार्यालय ने कहा,’ यहां कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए. गौरी लंकेश को राजकीय सम्मान नहीं दिया गया. राष्ट्रीय ध्वज का इस्तेमाल नहीं हुआ. वह वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका थी. इसलिए उनके सम्मान में पुलिस सैल्यूट दिया गया. इससे पहले वरिष्ठ साहित्यकारों जीएस शिवरूद्रापा और यूआर अनंथमूर्ति को इस तरह का सम्मान दिया गया है.’

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