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मुंबई के ईपीएफओ ऑफिस में आंतरिक धोखाधड़ी से करोड़ों रुपये की चोरी: रिपोर्ट

इस धोखाधड़ी के मास्टरमाइंड 37 वर्षीय चंदन कुमार सिन्हा हैं, जो मुंबई के कांदिवली स्थित ईपीएफओ ऑफिस में क्लर्क हैं. आरोप है कि इन्होंने संगठन के पांच अन्य साथियों के साथ मिलकर पीएफ का 21 करोड़ रुपये चुराया है. जुलाई की शुरुआत में धोखाधड़ी का ये मामला सामने आने के बाद से सिन्हा फ़रार हैं.

(फोटो साभार: ईपीएफओ)

नई दिल्ली: कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) कथित तौर पर धोखाधड़ी का शिकार हुआ है. संगठन के भीतर के कर्मचारियों द्वारा एक सामान्य भविष्य निधि (पीएफ) समूह से कथित तौर पर 21 करोड़ रुपये की चोरी की गई है.

इंडियन एक्सप्रेस द्वारा प्राप्त किए गए इस मामले की जांच से जुड़े दस्तावेजों से पता चलता है कि इस फ्रॉड के मास्टरमाइंड 37 वर्षीय चंदन कुमार सिन्हा हैं, जो मुंबई के कांदिवली में स्थित ईपीएफओ ऑफिस में क्लर्क हैं.

घटना सामने आने के बाद फरार सिन्हा ने ईपीएफओ के पांच अन्य कर्मचारियों के साथ कथित तौर पर पीएफ के दावे के रूप में फंड निकाल लिए और उन्हें मुख्य रूप से प्रवासी श्रमिकों के 817 बैंक खातों में जमा करा दिया. इस केस से जुड़े छह संदिग्ध कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है.

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इन खातों से 90 फीसदी फर्जी धन पहले ही हटा दिया गया है.

ये फर्जीवाड़ा एक फंड में किया गया है, जिसमें ईपीएफओ के साथ पंजीकृत संगठनों द्वारा हर महीने राशि जमा किया जाता है, आमतौर पर सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश के लिए. संगठन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि चोरी किया गया धन व्यक्तियों का नहीं था, बल्कि स्वयं संगठन का था.

ईपीएफओ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 18 लाख करोड़ रुपये का प्रबंधन करता है. यह दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक सुरक्षा संगठनों में से एक है. इस हेराफेरी के बाद यह सभी राशि निकासी को सुरक्षित करने के लिए कदम उठा रहा है.

इसने अपने आंतरिक ऑडिट के दायरे को भी विस्तृत किया है, जिसमें मार्च, 2019 से अप्रैल, 2021 तक कांदिवली कार्यालय द्वारा स्वीकृत पीएफ दावों, जो कि करीब 12 लाख दावे हैं, को शामिल किया जा रहा है. इसके अलावा ऑडिट के बाद ईपीएफओ ने कथित तौर पर मामले को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने की योजना बनाई है.

वर्क फ्रॉम होम के चलते सुरक्षा में लगी सेंध

सामाजिक सुरक्षा कार्यालय में इतने बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी का मामला कई सुरक्षा चिंताओं को जन्म देता है. संगठन में महामारी से संबंधित नौकरी में कटौती के कारण कर्मचारियों को सत्यापन और निकासी के प्रबंधन के लिए अनुमोदन से संबंधित कई जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं.

इसके अतिरिक्त लॉकडाउन के दौरान घर से काम करने का विकल्प चुनने वाले वरिष्ठ अधिकारियों ने संदिग्धों के साथ अपने पासवर्ड साझा किए थे, जिसको बदला नहीं गया था.

खास बात ये है कि केवल पांच लाख रुपये से अधिक की पीएफ निकासी के लिए दूसरे अधिकारी से मंजूरी की आवश्यकता होती है और संदिग्धों द्वारा इसी प्रावधान का फायदा उठाया गया है.

सिन्हा और उनके सहयोगी कथित तौर पर सिस्टम के भीतर के लोगों की नजर से बचने के लिए केवल एक से तीन लाख रुपये तक की निकासी करते थे.

अपने सहयोगी अभिजीत ओनेकर की मदद से सिन्हा ने बेरोजगार प्रवासी मजदूरों को 5,000 रुपये का ‘कमीशन’ देकर उनका बैंक और आधार विवरण हासिल कर लिया था. फिर इन कर्मचारियों के नाम से पीएफ खाते खोले गए, जहां उन्हें मुंबई की उन कंपनियों के कर्मचारियों के रूप में दिखाया गया, जो 15 साल पहले बंद हो गई थीं.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, बी. विजय कुमार ज्वैलर्स प्राइवेट लिमिटेड, लैंडमार्क ज्वैलरी प्राइवेट लिमिटेड, न्यू निर्मल इंडस्ट्रीज, साठी वीयर कॉर्पोरेशन और नेशनल वायर्स जैसी कंपनियों के नाम इसमें दर्ज किए गए थे. ये सभी कंपनियां साल 2006 में बंद हो गई थीं.

ईपीएफओ के एक अधिकारी ने कहा कि सिन्हा इतने बड़े घोटाले को अंजाम देने में इसलिए सफल रहे, क्योंकि उन्हें संगठन की लेखा प्रक्रिया की खामियों की समझ थी.

उदाहरण के लिए ईपीएफओ उन कंपनियों को लेकर डबल-एंट्री बहीखाता पद्धति का पालन नहीं करता है, जो अब चालू नही हैं. चूंकि ऐसा कोई नियम लागू नहीं था, इसलिए सिन्हा आसानी से इस तरह कंपनियों के फर्जी कर्मचारियों के खाते में पैसे डालने में सफल रहे थे.

यदि सिन्हा के एक रिश्तेदार की ओर से कथित तौर पर गुमनाम शिकायत न की गई होती तो यह घोटाला लंबे समय तक चलता रहता. सिन्हा इस फर्जीवाड़े के पैसे का इस्तेमाल लक्जरी कारों और मोटरसाइकिलों जैसी चीजों में कर रहे थे, जिससे उनके रिश्तेदार को जलन होने लगी.

अधिकारियों ने बताया कि सिन्हा बिहार के गया में मगध विश्वविद्यालय से 2005 के दर्शनशास्त्र में स्नातक हैं. इस साल जुलाई की शुरुआत में धोखाधड़ी का ये मामला सामने आने के तुरंत बाद उन्होंने खुद को एक स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया और फरार हो गए.

इस मामले के बाद ईपीएफओ के भीतर सुरक्षा उपायों को बढ़ा दिया गया है, जैसे कि हर 15 दिन के भीतर पासवर्ड बदलने का प्रावधान किया गया है. वरिष्ठ अधिकारियों को अपने संबंधित डोमेन में सिस्टम और प्रक्रियाओं की दोबारा जांच करने और अपने कर्मचारियों को कई भूमिकाएं सौंपने से रोकने के लिए भी कहा गया है.