राजनीति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन और नए-पुराने वादे

75वें स्वतंत्रता दिवस पर नरेंद्र मोदी ने सौ लाख करोड़ रुपये वाली महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना का ऐलान कर विकास और रोजगार के संकट के समाधान का सब्ज़बाग दिखाया, तो भूल गए कि वे देश के सालाना बजट से भी बड़ी ऐसी ही योजना इससे पहले के स्वतंत्रता दिवस संदेशों में भी घोषित कर चुके हैं.

 

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो साभार: पीआईबी)

गत रविवार को देश के 75वें स्वतंत्रता दिवस पर नरेंद्र मोदी सरकार की ‘ऊंची उड़ान’ का भ्रम रचने की कोशिशों, जिनमें कहना कठिन है कि बदहवासी ज्यादा थी या जमीनी हकीकतों की उपेक्षा, ने बरबस ही यशस्वी कथाकार भीष्म साहनी की ‘आज़ादी का शताब्दी समारोह’ शीर्षक कहानी की याद दिला दी. खासकर उसके इस शुरुआती हिस्से की:

सन् 2047. आज़ादी के शताब्दी-समारोह की तैयारियां. सत्तारूढ़ पार्टी इस अवसर पर उपलब्धियों का घोषणा-पत्र तैयार कर रही है. सदस्यों की बैठक में आधार-पत्र पर विचार किया जा रहा है. संयोजक हाथ में आधार-पत्र उठाए हुए मेज़ के पीछे खड़े हैं.

संयोजक: इस अवसर से पूरा-पूरा लाभ उठाते हुए हमें अपनी उपलब्धियों का विशेष रूप से प्रचार-प्रसार करना होगा. मैं सबसे पहले कुछेक सांस्कृतिक उपलब्धियों की चर्चा करना चाहूंगा. आज़ादी के बाद की पहली अर्द्धशताब्दी में केवल तीन प्रमुख शहरों के नाम बदले गए थे-बंबई, मद्रास आदि. कुछ के केवल हिज्जे बदले गए थे, जैसे-कानपुर. उनके हिज्जों में से अंग्रेज़ियत निकाल दी गई थी. आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि उसके बाद अर्धशताब्दी में सत्रह नगरों के नामों का भारतीयकरण किया गया है, जैसे दिल्ली का हस्तिनापुर, पटना का पाटलिपुत्र आदि. (तालियों की गड़गड़ाहट)

एक सदस्य: माफ़ कीजिए, यह कोई उपलब्धि नहीं है. यह मात्र काग़ज़ी कार्रवाई है.
संयोजक: मुझे यह देखकर बड़ा दुख होता है, जब हमारी ही पार्टी के सदस्य इसे काग़ज़ी कार्रवाई कहते हैं. क्या नामों का भारतीयकरण मात्र काग़ज़ी कार्रवाई है? (गर्मजोशी से) हम पूर्वजों का मज़ाक नहीं उड़ा सकते.
सदस्य: आप देश की अर्थव्यवस्था की बात करें, बढ़ती आबादी की बात करें…
संयोजक: इन बातों की भी चर्चा होगी. मैंने सोचा, आरंभ में सांस्कृतिक उपलब्धियों की चर्चा की जाए.
सदस्यः नहीं-नहीं, आप मुख्य मुद्दों पर आइए. (संयोजक आधार-पत्र के पन्ने पलटते हैं.)
संयोजक: पचास साल पहले जब आज़ादी की पचासवीं सालगिरह मनाई जा रही थी, 35 लाख भारतीय नागरिक अन्य देशों में जाकर बस गए थे. आज 2047 में प्रवासियों की संख्या 15 करोड़ हो गई है. (तालियां)
सदस्यः इसमें हमारी क्या उपलब्धि है? वे लोग मजबूर होकर गए.
संयोजकः (गर्मजोशी से) हमने ऐसे हालात पैदा किए… जिनसे उन्हें बाहर जाने की प्रेरणा मिली. इससे देश की आबादी भी कम होती है और देश को आर्थिक लाभ भी होता है.
सदस्य: क्या आबादी कम करने का यही एक उपाय है?
संयोजक: यही एक उपाय नहीं है. आबादी कम करने में प्रकृति और दैवी शक्तियां ज़्यादा मददगार रही हैं…
सदस्य: कृपया विस्तार से बताइए.
संयोजक: उत्तर पूर्वी क्षेत्र में भूचाल आया, पंद्रह हजार लोग दबकर मर गए. उत्तर-दक्षिण में महामारी फूटी, कहीं-कहीं पर क़हर की नौबत आई… आपको जानकर संतोष होगा कि एड्स की बीमारी ने भारत में जड़ें जमा ली हैं, मृतकों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है. (तालियां) पर इस तथ्य की चर्चा हम अपने घोषणा-पत्र में नहीं करेंगे.

इस हिस्से को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले के संबोधन से मिलाकर पढ़ा जाए या उनकी पार्टी के छुटभैयों-बड़भैयों की डींगों व दर्पोक्तियों से मिलाकर, साफ लगता है कि भीष्म साहनी को जिन विडंबनाओं के आजादी के शताब्दी समारोह तक हमारे सामने उपस्थित होने का अंदेशा था, उन्हें पच्चीस साल पहले ही खींच लाया गया है.

प्रधानमंत्री द्वारा तो उन्हें सिद्धियों की संज्ञा देकर दावा किया जा रहा है कि पच्चीस साल बाद लाल किले पर तिरंगा फहराने वाले प्रधानमंत्री भी उनकी चर्चा किए बगैर नहीं रह पाएंगे.

गौर कीजिए, देश के पच्चीस साल बाद के भविष्य की कल्पना में भीष्म साहनी को ‘मात’ देने वाले प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में अपने कुछ ही साल पुराने वादे याद नहीं रख पाए. न ही उनकी ताजा हकीकत बताने का साहस कर पाए.

‘छोटे किसान, देश की शान’ का जुमला उछाला तो भी इस तथ्य से अनजान-से बने रहकर कि उनकी सरकार के तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को लेकर किसान पिछले नौ महीनों से आंदोलित हैं और अनसुनी झेलते हुए राजधानी दिल्ली की देहरी पर जाड़ा, गर्मी और बरसात झेल रहे हैं.

यह बताने से भी परहेज बरता कि अगले बरस तक उनकी आय बढा़कर दोगुनी कर देने के उनके संकल्प का क्या हुआ. यह बात तो खैर पुरानी पड़ गई है कि एमएस स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशें लागू करने के वादे को उनकी सरकार ने कितनी ‘ईमानदारी’ से निभा दिया है.

उन्होंने अपने संदेश में कोरोना ही नहीं, उससे निपटने की सरकारी कवायदों की तई देशवासियों की तकलीफों को भी तवज्जो नहीं दी, तो माना जा सकता है कि उन्होंने सोचा हो कि इस बाबत तो वे देश को पहले भी कई बार संबोधित कर चुके हैं. लेकिन यह क्या कि उन्होंने समग्र बुनियादी ढांचे के विकास के नाम पर सौ लाख करोड़ रुपये वाली महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना का ऐलान कर उससे देश के तेजी से विकास और रोजगार के संकट के समाधान का सपना (पढ़िये : सब्जबाग) दिखाया तो भूल गए कि देश के सालाना बजट से भी बड़ी ऐसी ही योजना वे थोड़े दूसरे शब्दों में अपने इससे पहले के स्वतंत्रता दिवस संदेशों में भी घोषित कर चुके हैं.

क्या आश्चर्य कि अनेक जानकार इसे लेकर उन पर ‘फूलिंग द नेशन विद सेम प्रॉमिस फ्रॉम लास्ट थ्री ईयर्स’ (तीन सालों से एक ही योजना के अलग-अलग ऐलान से देश को मूर्ख बनाने) के आरोप लगा रहे हैं.

सच कहें तो इस बदहवासी के संकेत तभी मिल गए थे, जब प्रधानमंत्री ने अपनी सत्ता के आठवें साल में देश को उसके 75वें स्वतंत्रता दिवस से एक दिन पहले हर चौदह अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ मनाने के निश्चय की जानकारी दी थी क्योंकि समझना कठिन नहीं था कि उत्तर प्रदेश के गत विधानसभा चुनाव में श्मशान व कब्रिस्तान तक जा पहुंचे प्रधानमंत्री को आठ साल के सत्ता-सुख के बाद विभाजन की विभीषिका कुछ ज्यादा ही क्यों सताने लगी है?

इसलिए कि उत्तर प्रदेश के अगले विधानसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं हैं और उसके मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस विभीषिका को तेजी से लपक लेने में कोई कोताही नहीं की है. निस्संदेह, उद्देश्य यही है कि विधानसभा चुनाव में मतदाता बूथ पर जाएं तो उन्हें खस्ताहाल होती अर्थव्यवस्था, रिकॉर्ड तोड़ती बेरोजगारी, सिकुड़ते जा रहे भाईचारे और साथ ही कोरोना की विभीषिकाएं याद न आएं.

दूसरी ओर जानकारों के लिए यह मानना अभी भी कठिन हो रहा है कि प्रधानमंत्री ने बंगाल की स्मृतिशेष ‘ओल्ड लेडी गांधी’ मातंगिनी हाजरा को असम में जन्मी बता दिया तो इसके पीछे उनकी जीभ का फिसलना भर था. क्योंकि वे इससे पहले भी ऐसे ‘चमत्कार’ कर जता चुके हैं कि जरूरी नहीं है कि भारतमाता की पूजा करने का दावा करने वाला हर व्यक्ति उनके वास्तविक स्वरूप और संतानों के संघर्षों को ठीक से जानता पहचानता हो.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें सिकंदर को बिहार की सेनाओं से पराजित कराने और पाकिस्तान में स्थित तक्षशिला बिहार को उपहार में देने के लिए ऐसे ही धन्यवाद नहीं दिया था.

जहां तक मातंगिनी हाजरा की बात है, प्रधानमंत्री ने गत वर्ष दुर्गापूजा के दौरान 22 अक्टूबर की अपनी वर्चुअल रैली में, निस्संदेह, जिसके पीछे राजनीतिक लाभ उठाने की मंशा थी, बंगाल में स्वतंत्रता संघर्ष, समाजसेवा और संत परंपरा का जिक्र करते हुए जो 36 नाम गिनाए थे, उनमें मातंगिनी हाजरा का नाम भी शामिल था.

इससे पहले अपनी एक ‘मन की बात’ में भी उन्होंने उनका जिक्र किया था. फिर? ठीक है कि प्रधानमंत्री जिस राजनीतिक या सांस्कृतिक जमात से आते हैं, उसकी 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कोई भूमिका नहीं थी, इसलिए उनसे उसके सेनानियों के बारे में सही तथ्य बता पाने की ज्यादा उम्मीद नहीं की जाती, लेकिन इतना याद रखने की अपेक्षा तो की ही जाती है कि बंगाल के तामलुक में आठ सितंबर को हुए प्रदर्शन में बंगाल प्रांत की जिस एक फजलुलहक सरकार की पुलिस ने गोली चलाकर तीन स्वतंत्रता सेनानियों को मार डाला था, भाजपा के पूर्व रूप जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी उसमें वित्तमंत्री हुआ करते थे.

मातंगिनी ने 29 सितंबर को उक्त स्वतंत्रता सेनानियों पर पुलिस मोलीबारी के विरोध में ‘और बड़ा प्रदर्शन’ किया था. तब पुलिस ने डाकबंगले पर उस पर भी गोलियां चलाईं, जिनमें से तीन मातंगिनी के हाथों और माथे पर आ लगीं और देश ने उन्हें खो दिया था.

प्रधानमंत्री इतना भी याद नहीं रख पाए तो इस बाबत उन्होंने अपने संबोधन में जो ‘यही समय है, सही समय है’ कविता पढ़ी, उसी के शब्दों में पूछें तो कैसे कह सकते हैं कि ऐसी बदहवासी के लिए भी यही सही समय है?

क्यों प्रधानमंत्री अपने संदेश में ‘सबके प्रयास’ के बहाने उस कविता को सार्थक करने का जिम्मा देशवासियों को सौंपकर खुद अवध के स्मृतिशेष कवि चंद्रमणि त्रिपाठी ‘सहनशील’ के इस शे’र को ही ज्यादा सार्थक करते रहे: बस्ती के सभी लोग हैं ऊंची उड़ान पै, किसकी निगाह जाएगी जलते मकान पै?

सवाल है कि इस बदहवासी के लिए उन्होंने स्वतंत्रता दिवस और आजादी के अमृत महोत्सव को ही सबसे उपयुक्त समय क्यों माना?

अगर इसलिए कि अब उनका पांच अगस्त (जब उन्होंने जम्मू कश्मीर से संविधान का अनुच्छेद 370 छीन लिया व उसके अगले साल अयोध्या में राममंदिर के लिए भूमिपूजन करने गए) और चौदह अगस्त (जब विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनवाएंगे) को पंद्रह अगस्त से ज्यादा महत्वपूर्ण बनाने का इरादा है, तो यकीनन, देश को और सचेत होने की जरूरत है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)