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नेताओं के ख़िलाफ़ सीबीआई मामलों की धीमी जांच व सुनवाई से चिंतित: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट जघन्य अपराधों में दोषी पाए गए जनप्रतिनिधियों पर आजीवन प्रतिबंध लगाने और उनके मुक़दमों का शीघ्र निपटारा करने के अनुरोध संबंधी जनहित याचिका सुन रहा है. अदालत ने एजेंसी द्वारा त्वरित जांच और सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए कई निर्देश जारी किए जिनमें उच्च न्यायालयों द्वारा अतिरिक्त विशेष अदालतों की स्थापना शामिल है.

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने कानून निर्माताओं के खिलाफ सीबीआई मामलों में धीमी जांच और अभियोजन में देरी पर गहरी चिंता जताई है. इसके साथ ही न्यायालय ने एजेंसी द्वारा त्वरित जांच और सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए कई निर्देश जारी किए, जिनमें उच्च न्यायालयों द्वारा अतिरिक्त विशेष अदालतों की स्थापना शामिल है.

प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने उच्च न्यायालयों से कहा कि लंबित मुकदमों के त्वरित निपटान के लिए जहां भी ऐसी अतिरिक्त अदालतों का गठन करने की आवश्यकता हो, वहां विशेष अदालतें स्थापित करें और इस मुद्दे पर केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा किसी असहयोग से उसे अवगत कराएं.

न्यायालय ने मध्य प्रदेश में कानून निर्माताओं के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए भोपाल में एक विशेष अदालत पर न्याय मित्र की टिप्पणी से सहमति जताई और कहा कि यह न्याय का मजाक है, क्योंकि राज्य के विभिन्न हिस्सों से अभियोजन और बचाव पक्ष के लिए अदालत में उपस्थित होना भौतिक रूप से असंभव है.

पीठ ने बुधवार को कहा था कि राज्यों के पास कानून निर्माताओं के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण मामलों को वापस लेने की शक्ति है. लेकिन ऐसे मामलों पर संबंधित उच्च न्यायालयों की तरफ से गौर किया जाना चाहिए.

पीठ ने बृहस्पतिवार को न्यायालय की वेबसाइट पर अपना आदेश पोस्ट किया और वकील अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका पर पारित पहले के आदेशों के साथ आगे के निर्देश जारी किए.

शीर्ष अदालत अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें जघन्य अपराधों में दोषी ठहराए गए जनप्रतिनिधियों पर आजीवन प्रतिबंध लगाने और उनके मुकदमों का शीघ्र निपटारा करने का अनुरोध किया गया है.

पीठ ने कहा, ‘ब्योरे में जाए बिना, हम इन (सीबीआई) मामलों की वर्तमान स्थिति को लेकर काफी चिंतित हैं. सॉलिसिटर जनरल ने हमें आश्वासन दिया कि वह एजेंसी को पर्याप्त मानव संसाधन और बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने के लिए सीबीआई निदेशक के साथ मामले को उठाएंगे, ताकि लंबित जांच जल्द से जल्द पूरी हो सके.’

सीबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न सीबीआई अदालतों में मौजूदा और पूर्व सांसदों से जुड़े 121 मामले लंबित हैं वहीं मौजूदा और पूर्व विधायकों के खिलाफ 112 मामले लंबित हैं.

पीठ ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा, ‘इस रिपोर्ट के अनुसार, 37 मामले अब भी जांच के चरण में हैं, सबसे पुराना मामला 24 अक्टूबर 2013 को दर्ज किया गया था. विवरण से पता चलता है कि ऐसे कई मामले हैं, जिनमें आरोप पत्र वर्ष 2000 में दायर किया गया था. लेकिन अब भी आरोपियों की उपस्थिति, आरोप तय करने या अभियोजन साक्ष्य आदि को लेकर लंबित हैं.’

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, पीठ ने आदेश में कहा, ‘केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा किसी भी असहयोग की स्थिति में उच्च न्यायालय आगे की आवश्यक कार्रवाई के लिए इस न्यायालय को स्थिति रिपोर्ट भेजेंगे. राज्य पुलिस या अभियोजन एजेंसी द्वारा सहयोग के संबंध में उच्च न्यायालय द्वारा गठित विशेष बेंच यह सुनिश्चित करेगी कि इन एजेंसियों की ओर से कोई ढिलाई न हो. उच्च न्यायालयों द्वारा निरंतर न्यायिक निगरानी, ​​पर्यवेक्षण और सतर्कता होनी चाहिए.’

पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से पहले ही लंबित मामलों की निगरानी के लिए एक विशेष खंडपीठ का गठन करने का अनुरोध किया गया था.

पीठ ने कहा, ‘हम निर्देश देते हैं कि प्रत्येक उच्च न्यायालय लंबित मामलों को निपटाने में तेजी लाने के लिए आवश्यक कदम उठाएंगे और पिछले आदेशों द्वारा पहले से निर्धारित समय सीमा के भीतर इसे समाप्त करेंगे.’

आदेश में कहा कि जहां 100 से अधिक मामले लंबित हैं, वहां विशेष अदालतों को राज्यों के विभिन्न हिस्सों में स्थापित करने की आवश्यकता है, ताकि गवाहों की आसान पहुंच सुनिश्चित हो सके और मौजूदा बुनियादी ढांचे की भीड़भाड़ को कम किया जा सके.

आदेश में कहा, ‘इस प्रकार हम केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकारों को अतिरिक्त सीबीआई/विशेष न्यायालयों की स्थापना के प्रयोजनों के लिए उच्च न्यायालयों को आवश्यक आधारभूत सुविधाएं प्रदान करने का निर्देश देते हैं.’

पीठ ने कानून अधिकारी से कुछ मामलों के संबंध में न्याय मित्र विजय हंसारिया की रिपोर्ट पर जवाब दाखिल करने को कहा, जिसकी जांच ईडी और सीबीआई ने की थी, जिसमें जांच में देरी के कारणों का मूल्यांकन करने के लिए एक निगरानी समिति के गठन की मांग की गई थी.

राजनेताओं के खिलाफ मुकदमे वापस लेने को लेकर पीठ ने कहा कि उचित निर्देश पहले ही जारी किए जा चुके हैं, जिसमें राज्यों द्वारा मौजूदा या पूर्व सांसदों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने के लिए उच्च न्यायालय की अनुमति अनिवार्य हो गई है और आगे किसी निर्देश की आवश्यकता नहीं है.

पीठ ने कहा कि वह बाद में इस तर्क पर विचार करेगी कि एक सांसद को आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद संसद या राज्य विधानमंडल की सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए या उसे जीवन भर चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाना चाहिए.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)