भारत

भागीदारी और बहिष्कार को लेकर कोई एक नियम क्यों नहीं बना देते?

बहस-मुबाहिसा: मुक्तिबोध जन्मशती वर्ष पर आयोजित एक कार्यक्रम का प्रगतिशील लेखक संघ ने बहिष्कार किया और कार्यक्रम रद्द हो गया. इस पर सवाल उठा रहे हैं लेखक अशोक कुमार पांडेय.

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मैं अपनी बात उसी घिसे हुए वाक्य से शुरू करूंगा जो सबसे अधिक कहा और सबसे कम समझा जाता है- यह वक़्त जम्हूरियत में यक़ीन रखने वाले तरक्कीपसंद जमात के लिए सबसे मुश्किल वक़्तों में से एक है.

ऐसे मुश्किल वक़्त में जलसों में भागीदारी, मंचों की शिनाख़्त और ऐसे सवालात ज़रूरी हैं तो बस इस लिहाज से कि हमारे इन फ़ैसलों से फ़ायदा किसका हो रहा है और नुक़सान किसका. हमारी आवाज़ कहां पहुंच रही है और कितनी. तो इस नुक्ते से शुरू करने में भी मुझे कोई शर्म नहीं कि हुज़ूर-ए-आला हम आलिम-ए-वक़्त के सबसे बड़े नक़्क़ाद हो सकते हैं लेकिन हमारी आवाज़ कहीं नहीं पहुंच रही.

हम इतिहास के काम के दस्तावेज़ लिख रहे हो सकते हैं लेकिन वर्तमान की पेशानी पर न हम परेशान लक़ीरें खींच पा रहे हैं न कश्का. हम सब जो निकले थे ब्रह्मराक्षस का सजल उर शिष्य बनने, अपनी अपनी बावड़ी में चीख़ते हुए रोज़ थोड़े और जख़्मी हुए जाते हैं.

इसे भी देखें: मुक्तिबोध जन्मशती आयोजन का बहिष्कार मार्क्सवादी क्यों करने लगे?

प्रगतिशील लेखक संघ यानी सज्जाद ज़हीर साहेब और उनके कॉमरेडों की निशानी, जिसका नाम सुन के ही दिल में इज़्ज़त का भाव आता है, कॉमरेडाना लगता है. मैं ख़ुद एक दौर में उसका हिस्सा रहा हूं और आज भी उसके मुतल्लिक कोई दुश्मनाना भाव नहीं हो सकता, असहमति का हक़ तो ख़ैर है ही.

इसलिए बड़ी शाइस्तगी से यह सवाल पूछना चाहता हूं कि भारत भवन के बहिष्कार के फैसले के बाद क्या हुआ? मेरे बेहद अज़ीज़ और सीनियर कॉमरेड राजेश जोशी, कुमार अंबुज और नीलेश रघुवंशी ने कॉल दिया. मैंने इसे अपने ब्लॉग पर लगाया और आज तक भारत भवन नहीं गया. (कह सकते हैं तुम्हें बुलाता कौन. यह सच भी है.)

मुझे नहीं याद कि किसी संगठन ने उसे एंडोर्स किया या नहीं लेकिन यह ज़रूर जानता हूं कि उसके बाद न केवल दूसरे तरक्कीपसंद लोग (तरक़्क़ीपसंदगी किसी संगठन की महदूद तो नहीं ही होती है) वहां जाते रहे बल्कि प्रलेसं, जलेसं के लोगों ने भी इस कॉल को अनसुना कर दिया. थोड़ा पीछे लौटें.

देश के लेखकों ने ज्ञानोदय में मैत्रेयी पुष्पा के लिए लिखी बातों के विरोध में ज्ञानपीठ और वर्धा विश्वविद्यालय के बहिष्कार की अपील की. हस्ताक्षर हुए. फिर मैं नहीं याद कर पा रहा कि लेखक संगठनों ने क्या स्टैंड लिया, लेकिन यह ख़ूब याद है कि लेखक संगठनों से जुड़े अनेक लोग उस बहिष्कार पत्र पर हस्ताक्षर करने के बावज़ूद ज्ञानोदय में छपते रहे और वर्धा जाते रहे.

एक और वाक़या याद आ रहा है. छत्तीसगढ़ में प्रमोद वर्मा की स्मृति में हुआ आयोजन. सरकार भाजपा की ही थी. आयोजक विश्वरंजन पुलिस के आला अफ़सर थे. सुना फ़िराक़ साहब के नवासे भी थे. ख़ैर, उस आयोजन में भी लेखक संगठनों के बड़े बड़े पदाधिकारी गए थे. बाद में वबाल हुआ लेकिन कोई स्टैंड तय किया गया हो, मुझे तो नहीं याद.

एक हालिया वाक़या कैसे छोड़ सकते हैं? साहित्य अकादमी पुरस्कारों की वापसी शुरू हुई. उदय प्रकाश ने शुरू किया, अशोक वाजपेयी ने वापस किया, राजेश जोशी फिर मंगलेश डबराल और भी अनेक लोगों ने. इस पूरे वाक़ये में भी मुझे लेखक संगठनों का कोई स्टैंड नहीं याद. मतलब किसी ने कोई व्हिप जारी किया हो वापसी के लिए और न मानने वालों के खिलाफ़ कोई कार्यवाही की हो, ऐसा याद नहीं आता.

उदाहरणों की भीड़ लगाई जा सकती है लेकिन मैं जो पूछना चाहता हूं, वह यह कि भागीदारी/बहिष्कार को लेकर कोई एक नियम क्यों नहीं बना दिया जाता एक बार? तय हो जाए एक बार कि अमुक अमुक जगहों पर जाना है और इन इन जगहों पर नहीं जाना है. फलां का बहिष्कार करना है अलां का स्वीकार. जो प्रतिबंधित जगहों पर जाए उसे संगठन से बाहर किया जाए, न हो संगठन में तो बिरादरी में हुक्का बंद हो.

जिस आयोजन पर बहस है वह मुक्तिबोध पर था. आयोजन के संयोजक (हमें मिले प्रपत्र के अनुसार) अशोक वाजपेयी थे. आमंत्रितों में सभी लिबरल, तरक्कीपसंद जमात के लोग थे. संस्थान जवाहर कला केंद्र था, जो कि एक स्वायत्त संस्था है. सरकार का कोई मंत्री आमंत्रण पत्र पर विराजमान नहीं था. आने वालों में कोई संघ या जमात का झंडाबरदार नहीं था. फिर बहिष्कार का क्या अर्थ?

क्या ऐसी ही एक स्वायत्त संस्था साहित्य अकादमी के आयोजनों में सभी लोग अब भी जा नहीं रहे? अभी मेरे प्रिय कवि चंद्रकांत देवताले की शोक सभा साहित्य अकादमी दिल्ली में हुई थी जिसमें विष्णु खरे से लेकर मुझ अकिंचन तक शामिल हुए थे. विश्वास कीजिए सबने वही कहा जो किसी लेखक संगठन के मंच पर कहते.

मेरी शिक़ायत किसी बहिष्कार से नहीं है. बहिष्कार एक पोलिटिकल वेपन है ही. मेरी शिक़ायत सिद्धांतों को निजी पसंदगी-नापसंदगी के हिसाब से तोड़ने मोड़ने से है. मेरी शिक़ायत इस एड-हाकिज़्म से है. संगठनों की पत्रिकाओं में भाजपा शासित राज्य सरकारों के विज्ञापन छपते रहें, साहित्य अकादमी के जलसों में भागीदारी होती रहे और फिर अचानक एक दिन कहा जाए कि जवाहर कला केंद्र में हो रहे आयोजन से भाजपा सरकार को वैलिडिटी मिलेगी, तो यह कहीं से वैलिड पोलिटिकल स्टेटमेंट नहीं लगता कॉमरेड.

अंत भी उसी घिसे पिटे वाक्य से करूंगा. वक़्त वाकई बहुत मुश्किल है कॉमरेड. किस वाक्य के बाद किसे मार दिया जाएगा, कोई नहीं जानता. कितनी गौरी लंकेशों को हम कब तक खोते रहेंगे यह भी नहीं. शीतयुद्ध बीत चुका है और एक खूनी युद्ध जारी है जिसके लिए दोस्त और दुश्मन की शिनाख़्त फिर से करनी पड़ेगी. प्रैक्टिस भी बदलनी पड़ेगी, प्रैक्सिस भी और टैक्टिस भी.

अशोक वाजपेयी को मैंने कभी “सम्मानित प्रतिपक्ष” कहा था, लेकिन आज जो प्रतिपक्ष है वह न हमारा सम्मान करता है, न सम्मान को कोई मूल्य समझता है. तो पहली लड़ाई उसके खिलाफ़ है. सरशार साहब कह गए हैं- हर किसी से न एहतिराज़ करो/ दोस्त दुश्मन में इम्तियाज़ करो.

यक़ीन मानिए अगर हम जुटते जयपुर में और साथ होने का उद्घोष करते, गौरी लंकेश की हत्या के खिलाफ़ प्रस्ताव पास करते, मुक्तिबोध को फिर से पढ़ते-गुनते तो वह हमारे आंदोलन के लिए फ़ायदेमंद होता. हमने कोई ग़लती की हो या न की हो, एक मौक़ा ज़रूर खोया है.

(अशोक कुमार पाण्डेय कवि हैं और इन दिनों कश्मीर पर एक किताब लिख रहे हैं.)

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