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पर्यावरण बचाने की राह में आस्था का रोड़ा

आस्था की स्वतंत्रता की गारंटी देते वक़्त कभी संविधान निर्माताओं ने यह नहीं सोचा होगा कि लोगों की निजी आस्था पर अमल पर्यावरण को कितना बड़ा ख़ामियाज़ा भुगतने के लिए मजबूर कर सकता है.

ganesh pti

(फोटो: पीटीआई)

क्या सांप्रदायिक एव अतार्किक एवं पर्यावरण विरोधी विचारों के प्रचार-प्रसार का काम अब विश्वविद्यालयों को आउटसोर्स कर दिया गया है? और उन्हें यह निर्देश तक दिया गया है कि वह छात्रों की पाठ्येत्तर/एक्सट्राकरिक्युलर गतिविधियों पर न केवल निगाह रखें बल्कि उन्हें यह चेतावनी भी दें कि उनकी खास किस्म की गतिविधियों से ‘धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं.’

यह मसला पिछले दिनों अचानक पुणे विश्वविद्यालय के एक सर्कुलर से सुर्खियों मेें आया, जिसने छात्रों को यह सलाह दी कि वह पर्यावरण अनुकूल त्योहार मनाने के लिए लोगों को प्रेरित करने वाले ‘धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले’ कार्यक्रमों से दूर रहें और अपने आनुषंगिक शिक्षा संस्थानों तथा विभागों को निर्देश दिया अगर कोई ऐसी गतिविधि में शामिल होता है तो उन छात्रों की सूचना विद्यापीठ प्रशासन को भेजी जाए.

ऐसे वक्त में जब पर्यावरण अनुकूल त्योहार मनाने की बात-फिर चाहे वह ‘ग्रीन गणेश’ जैसे अभियान हों या ऐसे विभिन्न प्रयास हों-एक छोटे से तबके में अधिक स्वीकार्य हो चली है, फिर प्लास्टर आफ पेरिस के बजाय गीली मिटटी का प्रयोग हो या सिंथेटिक रंगों के बजाय आर्गेनिक रंगों का इस्तेमाल हो, नाटक या ऐसे ही सांस्कृतिक हस्तक्षेपों के जरिए त्योहारों के माध्यम से शेष जीव जगत को पहुंच रही हानि के बारे में बताया जाने लगा हो.

यहां तक कि नेशनल ग्रीन टिब्यूनल के निर्देश सार्वजनिक जलाशयों के पास लगा दिए गए हों कि ‘..मूर्तियों के विसर्जन की तभी अनुमति दी जा सकेगी, जब मूर्तियां बायोडिग्रेडेबल / अर्थात पानी में घुलने योग्य/ सामग्री से बनी हों न कि प्लास्टिक और प्लास्टर आॅफ पेरिस से और इस्तेमाल किए गए रंग पर्यावरण अनुकूल हों’ और ऐसा न करने वालों पर सख्त कार्रवाई की बात भी लिखी गयी हो, उस पृष्ठभूमि में विश्वविद्यालय के इस परिपत्र पर हंगामा होना लाजिम था.

बाद में पता चला कि सावित्राीबाई फुले पुणे विद्यापीठ के कर्णधार महज पुणे के शिक्षा विभाग के इस संबंध में जारी सर्कुलर को ही अमल कर रहे थे, जिसने यह निर्देश एक हिंदू जन जाग्रति समिति नामक विवादास्पद संगठन द्वारा इस संबंध में चलाई मुहिम तथा शिक्षा विभाग को सौंपे ज्ञापन के बाद दिया था.

ध्यान रहे कि यह वही संगठन है कि जिसके कार्यकर्ताओं पर ठाणे, पनवेल और मड़गांव जैसे बम धमाकों में शामिल होने के न केवल आरोप लगे हैं, यहां तक कि डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के आरोप में भी उनके एक कार्यकर्ता को पकड़ा जा चुका है और उसके बाकी साथी फरार बताए जाते हैं.

मालूम हो कि पर्यावरण अनुकूल त्योहार मनाने की बात किस तरह ‘हिंदू धर्म एवं परंपरा के खिलाफ है इसको लेकर हिंदू जन जाग्रति समिति एवं सनातन संस्था के लोग लंबे समय से प्रचार में मुब्तिला रहे हैं. उनके मुताबिक यह सब ‘नकली पर्यावरणवादियों’ और उनके ‘खोखले पर्यावरणीय सरोकारों’ का परिणाम है.

उनके बारे में यह भी देखने में आया है कि उनके कार्यकर्ता बाकायदा झंडा-डंडा उठा कर मूर्तियों के विसर्जन के स्थलों पर उपस्थित रहते आए हैं और लोगों को इस बात के लिए प्रेरित करते आए हैं कि उन्हें बहते पानी में ही मूर्ति बहानी चाहिए न कि उन कृत्रिम टैंकों में- जो महानगरपालिका या नगरप्रशासन की तरफ से बनाए जाते रहे हैं.

एक अग्रणी अखबार से बात करते हुए अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के प्रतिनिधि ने यह बताया कि ‘यह बेहद विचलित करने वाला समाचार है कि उच्च शिक्षा विभाग ने हिंदू जनजागृति समिति के पत्र पर फुर्ती से कार्रवाई की और इससे भी अधिक आपत्तिजनक है कि पुणे विश्वविद्यालय भी विभाग इस मांग के आगे आसानी से झुक गया और उसने भी ऐसे छात्रों की सूची तैयार करवाई.’

मालूम हो कि खुद डॉ नरेंद्र दाभोलकर-जिन्होंने अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की नींव डाली और जो इन्हीं प्रयासों के चलते मार दिए गए. पर्यावरण अनुकूल त्योहारों के मसले पर अपने जीते जी लगातार सक्रिय रहते आए थे और जिस दिन उन्हें गोली मारी गई थी, उस दिन भी वह उन कार्यकर्ताओं एवं सचेत नागरिकों की एक बैठक में शामिल होने के लिए जाने वाले थे, जो उस साल आने वाले गणेशोत्सव की तैयारियों में मुब्तिला थी और यह कोशिश कर रही थी कि पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचाने वाली मूर्तियों के इस्तेमाल को लेकर अधिक जनमत किस तरह तैयार हो.

पानी में मूर्तियां बहाने का मसला कितना व्यापक है. इसके बारे में अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति का अध्ययन भी व्यापक रहा है. समिति के मुताबिक मोटे आकलन के हिसाब से अकेले महाराष्ट्र के लगभग दो करोड़ परिवारों में से एक करोड़ परिवार गणेश की मूर्ति स्थापित करते हैं. घरों में स्थापित यह छोटी मूर्तियां डेढ फुट उंचाई, डेढ़ किलो वजन की होती हैं.

इसका मतलब हर साल औसतन डेढ़ करोड़ किलो प्लास्टर आफ पेरिस सैकड़ों टन रंगों के साथ जलाशयों में पहुंचता है. और औसतन पचास लाख किलो निर्माल्य भी पानी में बहाया जाता है. और इस तरह नदियां, तालाब, नहरें, झरने, कुएं आदि विभिन्न किस्म के जलाशय प्रदूषित होते हैं.

अपने प्रचार मुहिम में वह लोगों को याद दिलाते कि आज की तारीख में अधिकतर मूर्तियां प्लास्टर आॅफ पेरिस से (जो पानी में घुलता नहीं हैं) बनी होती हैं जिन्हें पारा एवं लेड जैसे खतरनाक रासायनिक पदार्थों से बने रंगों से रंगा जाता है.

और अगर ऐसा पानी मनुष्य सेवन करें तो उसे कैंसर हो सकता है या उसका दिमागी विकास भी बाधित हो सकता है. दूसरी तरफ, पानी का विषाक्त होना वहां विचरण करने वाली मछलियों एवं अन्य प्राणियों के लिए मौत की सौगात बन कर आता है.

स्वयं केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी उत्सवों के दिनों में नदियों के ‘दम घुटने’ की बात की ताईद की है, जिसका अध्ययन नवरात्रों के बाद दिल्ली में यमुना के प्रदूषण पर केंद्रित था. बोर्ड के निष्कर्षों के मुताबिक सामान्य काल में पानी में पारे की मात्रा लगभग न के बराबर होती है, लेकिन उत्सवों के काल में वह अचानक बढ़ जाती हैं.

पिछले साल यमुना किनारे हुए श्रीश्री रविशंकर के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पहुंचे थे. (फाइल फोटो: पीटीआई)

पिछले साल यमुना किनारे हुए श्रीश्री रविशंकर के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पहुंचे थे. (फाइल फोटो: पीटीआई)

यहां तक कि क्रोमियम, तांबा, निकेल और जस्त, लोहा और अर्सेनिक जैसे भारी धातुओं का पानी में अनुपात भी बढ़ जाता है. दिल्ली के जिन-जिन इलाकों में मूर्तियां बहाई जाती हैं वहां के पानी के सैम्पलों को लेकर अध्ययन करने के बाद बोर्ड ने पाया कि मूर्तियां बहाने से ‘ पानी की चालकता (कन्डक्टिविटी), ठोस पदार्थों की मौजूदगी, जैवरसायनिक आॅक्सीजन की मांग और घुले हुए आॅक्सीजन में कमी ’ बढ़ जाती है.

उसका निष्कर्ष था कि मूर्तियां बहाने के ‘कर्मकांड’ से नदी को कभी न भरने लायक नुकसान हो रहा है और प्रदूषण फैल रहा है. गौरतलब है कि जहां तक आला अदालत का सवाल है तो वह इस मामले में प्रोएक्टिव अर्थात सक्रिय रहा है.

इस संदर्भ में दायर एक जनहित याचिका को लेकर उसने 14 अक्टूबर वर्ष 2003 को पानी का प्रदूषण रोकने हेतु फैसला सुनाया. जब उसने पाया कि फैसले पर अमल नहीं हो रहा है तो आला अदालत के अन्तर्गत गठित निगरानी समिति ने वर्ष 2005 में सभी राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को निर्देश दिए.

अब हर साल होता यही है कि राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ऐसे त्योहारों के पहले नगरपालिकाओं आदि को एक रूटीन परिपत्र भेज कर गोया रस्मअदायगी करते हैं. जमीनी स्तर पर कोई फरक नहीं पड़ता.

अदालती सरगर्मियों का एक परिणाम यह जरूर हुआ है कि केेंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के तत्वावधान में फरवरी 2009 में एक कमेटी बनी, जिसने पर्यावरणपूरक विसर्जन को लेकर कुछ अहम सुझाव दिए.

उसके मुताबिक मूर्तियों पर ऐसे केमिकल से बने रंगों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगनी चाहिए जो जहरीले हों और नानबॉयोडिग्रेडेबल हों अर्थात घुलनशील न हों, सिर्फ प्राकृतिक तथा पानी में घुलनशील रंग ही इस्तेमाल हों, प्लास्टर आॅफ पेरिस के बजाय माटी की मूर्ति बनाने को प्रोत्साहित किया जाए, पानी में बहाने के पहले मूर्तियों पर पड़े फूल, वसा और थर्मोकोल आदि अलग किए जाएं.

यह भी सुझाव दिया गया कि ऐसे कृत्रिम तालाबनुमा गड्डे बना दिए जाएं जिनमें आसानी से विसर्जन हो सकें ताकि बहायी गयी मूर्तियां समूचे सार्वजनिक जलाशय को प्रदूषित न करें.

क्या यह कहा जा सकता है कि पुणे के शिक्षा विभाग के प्रबुद्ध अधिकारी इन तमाम सूचनाओं से वाकिफ नहीं थे, क्या इस बात पर विश्वास किया जा सकता है कि पुणे विश्वविद्यालय के अग्रणी विद्धान आस्था के नाम पर प्रदूषण फैलाने की परिघटना से परिचित नहीं थे?

निश्चित ही आस्था का तत्व जब चिन्तनप्रक्रिया पर हावी हो जाता है तब सामान्य आंखों से नज़र आने वाली चीजें भी धुंधली या उलटी लगने लगती हैै.

इस बात को दिल्ली के जन बखूबी जानते हैं, जब उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि पिछले साल आर्ट आफ लिविंग के यमुना तट पर हुए आयोजन ने किस तरह पर्यावरण को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया, जिसके लिए नेशनल ग्रीन टिब्यूनल ने उन्हें दंडित भी किया.

इस समारोह की सदारत करने प्रधानमंत्री महोदय खुद पहुंचे थे और दिल्ली में शासन कर रही केजरीवाल सरकार ने भी इस आयोजन की सफलता में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

अंत में, संविधान में आस्था की स्वतंत्रता की गारंटी देते वक्त कभी संविधान निर्माताओं ने यह नहीं सोचा होगा कि लोगों की निजी आस्था पर अमल पर्यावरण को कितना बड़ा खामियाजा भुगतने के लिए मजबूर कर सकता है. और यह ऐसा नुकसान है जिसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को ही चुकानी पड़ेगी.

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक हैं)

 

  • Brajesh Patel

    “वसुधैव कुटुम्बकम” – ये विश्व, इसमें रहने वाले वन्य जीव, प्राणी, पशु, पक्षी, पेड़, नदी, पहाड़, वायु, जल, आकाश, धरती आदि सभी एक ही कुटुंब यानी परिवार के सदस्य हैं। ऐसा कहा और सुना जाता है।

    गणेश जी हो या दुर्गा जी – विसर्जन के दूसरे दिन सुबह कोई जाये और देखे कि क्या हाल हो गया है उन मूर्तियों का जिनके सामने हमने 10 दिनों तक शाष्टांग प्रणाम करके अपना सब कुछ अर्पण करने की प्रार्थना की थी।

    कहीं हाथ पड़ा मिलता है, तो कहीं गर्दन, तो कहीं टांग। बस ऐसा ही कुछ हाल आज आदमी का हो रहा है। कहीं सड़कों पर एक्सीडेंट में किसी की लाश पड़ी होती है तो कहीं ट्रैन एक्सीडेंट में लाशों का ढेर देखने आये दिन मिल जाते हैं।

    कहीं बाढ़ के आतंक से तो कहीं आतंकवाद के प्रकोप से, कहीं बलात्कार करके तो कहीं छोटे बच्चे को मारकर, कहीं गौ-रक्षा के नाम पर तो कहीं पत्थरबाजी से, कहीं हिन्दू-मुस्लिम दंगे के कारण तो कहीं ब्लू वेल गेम आदि ऐसे अनेकानेक अस्त व्यस्त पड़ी लाशें 24 घंटे हमारे सामने दिख जाती हैं जहाँ हम सिर्फ फोटो और वीडियो बनाकर उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक फॉरवर्ड करने की अपील करते रहते हैं ताकी पीड़ितों के परिवार को जल्द से जल्द खबर मिल जाये। और ऐसा करके हम खुद को शाबासी दे देते हैं सोचते हुए की हमने मानवता के लिए बहुत बड़ा काम कर दिया।

    हमें हमारे बीच इंसानों की लाशें जब विचलित और संवेदनशील नहीं बना पाती तो गणेश भगवान या दुर्गा माता की मिट्टी से बनी विसर्जन के पश्चात तितर बितर पड़े हाथ, पैर, गर्दन, पैर आदि क्या सोचने पर मजबूर करेंगे!

    हमारी सारी आस्था, पूजा पाठ, धर्म आज ढकोसले और दिखावे की चरम सीमा पर पहुँच चुका है। सिर्फ कर्म कांड ही धर्म हो चला है। हमारी आस्था और भगवान पर श्रद्धा इतनी कमज़ोर है कि कुछ लोगों की आस्था यह बातें पढ़कर ही डगमगा जायेगी।

    धर्म सिर्फ एक प्रतियोगिता रह गया है। मस्जिद में 5 वक़्त लाउड स्पीकर से अजान कही जाती है तो हम भी हर गणेश पूजा, दुर्गा उत्सव, अखण्ड रामायण पाठ, भागवद कथा आदि में उनसे ज्यादा तेज़ आवाज़ में उन्हें बताएँगे कि हमारी संख्या ज्यादा है।

    बकरीद में हजारों लाखों बकरों को काटा जाता है तब पर्यावरण नष्ट नहीं होता तो हम क्यों सोचें कि गणेश भगवान और दुर्गा माँ की मूर्ती नदियों में न बहायें।

    अहंकारों के टकराव में हम सब धर्म के नाम पर सिर्फ दिखावा और ढकोसला कर रहे हैं।

    सब ओर सोच यही है कि हमारे जीते जी कौन सा जल का इतना घोर संकट आने वाला है, कौन सा प्रदुषण उतना भयानक होने वाला है कि जीना दूभर हो जाये। जब होगा तब होगा। तब तक तो हम अपनी जिंदगी जी चुके होंगे।

    जारी रखो।

    जो हाल हम अपने देवी देवताओं की मूर्तियों का करते हैं वही हश्र वे हमारे साथ कर रहे हैं। भले ही हमें नज़र न आ रहा हो। या हम जानबूझकर उसे देख न रहे हों। कब तक इस भीड़ की आड़ में बचे रहेंगे?