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गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने वाला क़ानून बने, यह मौलिक अधिकार में शामिल हो: इलाहाबाद हाईकोर्ट

गोहत्या के आरोपी की ज़मानत याचिका ख़ारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर कुमार यादव ने कहा कि जब गाय का कल्याण होगा, तभी देश का कल्याण होगा. उन्होंने यह भी कहा कि वैज्ञानिकों का मानना ​​था कि गाय एकमात्र ऐसा जानवर है, जो ऑक्सीजन लेती और छोड़ती है.

(फोटो: Monthaye/Unsplash)

इलाहाबाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोहत्या के एक मामले की सुनवाई करते हुए बीते बुधवार को कहा कि संसद को गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित करने वाला कानून बनाना चाहिए और गायों को मौलिक अधिकारों के दायरे में शामिल करना चाहिए.

जज शेखर कुमार यादव ने याचिकाकर्ता जावेद की जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की. जावेद पर आरोप है कि उन्होंने अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर वादी खिलेंद्र सिंह की गाय चुराई और उसका वध कर दिया.

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि जावेद निर्दोष हैं और उन पर लगाए गए आरोप झूठे हैं और उनके खिलाफ पुलिस से मिलकर झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया है. जावेद आठ मार्च से जेल में बंद हैं.

शासकीय अधिवक्ता ने जमानत याचिका का यह कहते हुए विरोध किया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप सही हैं और अभियुक्त को टॉर्च की रोशनी में देखा और पहचाना गया.

उन्होंने कहा कि अभियुक्त जावेद, सह अभियुक्त शुएब, रेहान, अरकान और दो-तीन अज्ञात लोगों को गाय को काटकर मांस इकट्ठा करते हुए देखा गया. ये लोग अपनी मोटरसाइकिल मौके पर छोड़कर भाग गए थे.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, गोरक्षा का कार्य केवल एक धर्म संप्रदाय का नहीं है, गाय भारत की संस्कृति है और संस्कृति को बचाने का कार्य देश में रहने वाले प्रत्येक नागरिक का है चाहे वह किसी भी धर्म का हो.

अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘जब गाय का कल्याण होगा, तभी देश का कल्याण होगा.’

जज ने दावा किया कि भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां अलग-अलग समुदायों के लोग रहते हैं, लेकिन वे सभी देश के बारे में एक ही तरह सोचते हैं.

जज ने कहा, ‘ऐसे में जब हर कोई भारत को एकजुट करने और उसकी आस्था का समर्थन करने के लिए एक कदम आगे बढ़ाता है, तो कुछ लोग जिनकी आस्था और विश्वास देश के हित में बिल्कुल भी नहीं है, वे देश में इस तरह की बात करके ही देश को कमजोर करते हैं. उपरोक्त परिस्थितियों को देखते हुए आवेदक के विरूद्ध प्रथमदृष्टया अपराध सिद्ध होता है.’

अदालत ने आगे कहा, ‘आरोपी को जमानत देने से सौहार्द बिगड़ सकता है. आवेदक का यह पहला अपराध नहीं है. इस अपराध से पहले भी उसने गोहत्या की थी, जिससे समाज में सौहार्द बिगड़ गया था. अगर जमानत पर रिहा हुआ तो आरोपी फिर से वही अपराध करेगा.’

न्यायाधीश ने यह भी कहा कि राज्य में गोशालाओं को ठीक से नहीं रखा जा रहा है. सरकार गोशालाओं का निर्माण भी करवाती है, लेकिन जिन लोगों को गाय की देखभाल करनी होती है, वे उनकी देखभाल नहीं करते हैं. इसी तरह से निजी गोशालाएं भी आज एक दिखावा बनकर रह गई हैं, जिसमें लोग गाय को बढ़ावा देने के नाम पर जनता से चंदा और सरकार से मदद लेते हैं, लेकिन अपने स्वार्थ के लिए खर्च करते हैं, गाय की परवाह नहीं करते हैं.

अदालत ने आगे कहा, ‘गाय का भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान है और गाय को भारत देश में मां के रूप में जाना जाता है. भारतीय वेद, पुराण, रामायण आदि में गाय की बड़ी महत्ता दर्शायी गई है. इसी कारण से गाय हमारी संस्कृति का आधार है.’

अदालत ने कहा, ‘गाय के महत्व को केवल हिंदुओं ने समझा हो, ऐसा नहीं है. मुसलमानों ने भी गाय को भारत की संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना और मुस्लिम शासकों ने अपने शासनकाल में गायों के वध पर रोक लगाई थी.’

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, जज ने कहा, ‘पांच मुस्लिम शासकों ने गायों के वध पर प्रतिबंध लगा दिया था. बाबर, हुमायूं और अकबर ने भी अपने धार्मिक त्योहारों में गायों की बलि पर रोक लगा दी थी. मैसूर के नवाब हैदर अली ने गोहत्या को दंडनीय अपराध बना दिया.’

अदालत ने कहा, ‘हमारे देश में ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं कि जब भी हम अपनी संस्कृति को भूले तो विदेशियों ने हम पर आक्रमण कर हमें गुलाम बना लिया और आज भी अगर हम नहीं जागे तो हमें तालिबान के निरंकुश आक्रमण और अफगानिस्तान पर कब्जे को नहीं भूलना चाहिए.’

अदालत ने कहा, ‘कोर्ट ने नोट किया कि कैसे संविधान सभा की बहसों के दौरान यह बहस हुई कि गोरक्षा को एक मौलिक अधिकार बनाया जाए, लेकिन ऐसा हुआ नहीं बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 में गोहत्या पर रोक को केंद्र की सूची में रखने के बजाय राज्य सूची में रख दिया गया और यही कारण है कि आज भी भारत के कई राज्य ऐसे हैं जहां गोवध पर रोक नहीं है.’

जज ने कहा, ‘गायों को संविधान के भाग-3 के तहत मौलिक अधिकारों के दायरे में लाया जाए.’

अदालत ने कहा, ‘वर्तमान वाद में गाय की चोरी करके उसका वध किया गया है, जिसका सिर अलग पड़ा हुआ था और मांस भी रखा हुआ था. मौलिक अधिकार केवल गोमांस खाने वालों का विशेषाधिकार नहीं है. जो लोग गाय की पूजा करते हैं और आर्थिक रूप से गायों पर जीवित हैं, उन्हें भी सार्थक जीवन जीने का अधिकार है. गोमांस खाने का अधिकार कभी मौलिक अधिकार नहीं हो सकता.’

अदालत ने कहा कि सच्चे मन से गाय की रक्षा और उसकी देखभाल करने की आवश्यकता है. सरकार को भी इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा.

अदालत ने कहा कि सरकार को ऐसे लोगों के खिलाफ भी कानून बनाना होगा जो छद्म रूप में गाय की रक्षा की बात गोशाला बनाकर करते तो हैं, लेकिन गोरक्षा से उनका कोई सरोकार नहीं है और उनका एकमात्र उद्देश्य गोरक्षा के नाम पर पैसा कमाने का होता है.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, जज शेखर कुमार यादव द्वारा पारित आदेश में यह भी कहा गया है कि वैज्ञानिकों का मानना ​​था कि गाय एकमात्र ऐसा जानवर है जो ऑक्सीजन लेती और छोड़ती है.

बता दें कि जून, 2020 में उत्तर प्रदेश विधानसभा ने एक अध्यादेश पारित किया था, जिसमें गोहत्या के लिए अधिकतम 10 साल के कठोर कारावास और 5 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान था.

अक्टूबर 2020 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ ने पाया था कि राज्य के गोहत्या कानून का बार-बार दुरुपयोग होने का खतरा था. कई मौकों पर अदालत ने कहा है कि एक आरोपी के कब्जे में पाए गए मांस को बिना किसी विश्लेषण के बीफ माना जाता था.

पिछले कुछ सालों में भारत के कई इलाकों में पशु व्यापार या जानवरों की खाल का काम करने वाले मुस्लिमों और वंचित जातियों के लोगों को खुद को गोरक्षक कहने वाले लोगों द्वारा गंभीर हिंसा का सामना करना पड़ा है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)