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एल्गार परिषद: हाईकोर्ट ने कहा, वरवरा राव के ख़िलाफ़ छह सितंबर तक कोई दंडात्मक कार्रवाई न हो

एल्गार परिषद-माओवादी संपर्क मामले में आरोपी कवि वरवरा राव को पांच सितंबर को तालोजा जेल अधिकारियों के समक्ष समर्पण करना है. वह इस साल फरवरी में अदालत द्वारा दी गयी अंतरिम चिकित्सा ज़मानत पर हैं. उन्होंने ख़राब स्वास्थ्य और उच्च ख़र्चों का हवाला देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट से अपनी ज़मानत अवधि बढ़ाने और हैदराबाद में अपने आवास में स्थानांतरित करने की अनुमति मांगी है.

कवि वरवरा राव (फोटो: पीटीआई)

मुंबई: राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) ने शुक्रवार को एक मौखिक बयान में बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया कि वह कवि-कार्यकर्ता वरवरा राव के खिलाफ छह सितंबर तक कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करेगा. छह सितंबर को राव की चिकित्सा आधार पर जमानत बढ़ाने की अर्जी पर सुनवाई होगी.

एल्गार परिषद-माओवादी संपर्क मामले में आरोपी राव को पांच सितंबर को तालोजा जेल अधिकारियों के समक्ष समर्पण करना है. वह इस साल फरवरी में अदालत द्वारा दी गई अंतरिम चिकित्सा जमानत पर हैं.

राव के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने शुक्रवार को जस्टिस एसएस शिंदे तथा जस्टिस एनजे जामदार की पीठ से जमानत बढ़ाने का अनुरोध किया. हालांकि समय कम होने की वजह से मामले में सुनवाई नहीं हो सकी.

अदालत ने कहा कि वह राव की अर्जी पर छह सितंबर को सुनवाई करेगी. ग्रोवर ने तब अदालत से अनुरोध किया कि तब तक राव के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाए.

एनआईए की ओर से अतिरिक्त सॉलीसिटर जनरल अनिल सिंह ने एक मौखिक बयान में कहा, ‘हम अगली सुनवाई तक कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करेंगे.’

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, वरवरा राव ने खराब स्वास्थ्य और उच्च खर्चों का हवाला देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष अपनी मेडिकल जमानत की अवधि बढ़ाने और तेलंगाना में हैदराबाद में अपने आवास में स्थानांतरित करने की अनुमति मांगी है.

राव की याचिका में कहा गया है कि जमानत की छह महीने की अवधि 5 सितंबर को समाप्त हो रही है और वह विभिन्न बीमारियों से पीड़ित हैं, जिनके इलाज की आवश्यकता है.

याचिका में कहा गया है कि मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि उन्हें एसिम्प्टोमैटिक पार्किंसन डिजीज, न्यूरोलॉजिकल बीमारियां और पेट में तेज दर्द है, जो नाभि हर्निया के सबूत हैं.

याचिका में आगे कहा गया है कि वह मुंबई में एक किराए के फ्लैट में रह रहे हैं, जिससे अन्य खर्चों के साथ ही आय के रूप में सिर्फ उनके पेंशन पर निर्भर होने की वजह से शहर में रहना मुश्किल हो रहा है.

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह शर्त रखी थी कि वह शहर नहीं छोड़ सकते. याचिका में इस शर्त में संशोधन की मांग की गई है कि उन्हें तेलंगाना में अपने स्थायी घर लौटने की अनुमति दी जाए. इसमें कहा गया है कि उन्होंने अदालत द्वारा निर्धारित सभी शर्तों का पालन किया है.

याचिका में कहा गया है, ‘इस तरह की बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के साथ बुढ़ापे में तलोजा जेल में सुविधाओं की कमी को देखते हुए, यह अनिवार्य है कि उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाएगा और उनकी मृत्यु हो सकती है.’

याचिका में कहा गया है कि मुंबई में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचना बहुत मुश्किल और वहनीय नहीं है. उन्हें हैदराबाद में बेहतर और रोगी के अनुकूल सेवाएं मिलने की संभावना है.

यह भी कहा गया है कि एक नेत्र रोग विशेषज्ञ ने सिफारिश की है कि वह अपनी दृष्टि के लिए सर्जरी करवाएं, लेकिन मुंबई में इसे करवाना आर्थिक और तार्किक रूप से कठिन होगा.

याचिका में कहा गया है कि उनकी 72 वर्षीय पत्नी भी कई बीमारियों से पीड़ित हैं, जो परिवार से दूर उनके मुंबई में होने के कारण बढ़ गई हैं.

इसने आगे कहा कि राव को 50,000 रुपये की मासिक पेंशन मिलती है, लेकिन मुंबई में उनका खर्च 95,000 रुपये प्रति माह तक है, जिसमें किराया, देखरेख करने वाले का खर्च, दवाएं और अन्य खर्चें शामिल हैं, जिसे वह वहन करने में असमर्थ हैं.

एल्गार परिषद मामले में राव अकेले आरोपी हैं, जो जमानत पर बाहर हैं.

जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस मनीष पिताले की पीठ ने इस साल 22 फरवरी को 82 वर्षीय राव को मानवीय आधार पर छह महीने के लिए अंतरिम चिकित्सा जमानत दी थी. उस समय अनेक बीमारियों से जूझ रहे राव मुंबई के नानावती अस्पताल में इलाज करा रहे थे. उन्हें अदालत के हस्तक्षेप के बाद तालोजा जेल से अस्पताल लाया गया था.

एल्गार परिषद मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित एक सम्मेलन में दिए गए भड़काऊ भाषणों से संबंधित है, जिसके बारे में पुलिस ने दावा किया था कि इस भाषणों के कारण अगले दिन पश्चिमी महाराष्ट्र शहर के बाहरी इलाके में स्थित कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई.

अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि इस सम्मेलन को माओवादियों के साथ कथित रूप से संबंध रखने वाले लोगों ने आयोजित किया था.

एनआईए ने आरोप लगाया है कि एल्गार परिषद का आयोजन राज्य भर में दलित और अन्य वर्गों की सांप्रदायिक भावना का भड़काने और उन्हें जाति के नाम पर उकसा कर भीमा-कोरेगांव सहित पुणे जिले के विभिन्न स्थानों और महाराष्ट्र राज्य में हिंसा, अस्थिरता और अराजकता पैदा करने के लिए आयोजित किया गया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)